आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के सुरक्षित, समावेशी और मानव-केंद्रित उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिका सहित 86 देशों ने ‘दिल्ली घोषणा’ को अपनाया। यह निर्णय एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के समापन सत्र में लिया गया, जहां वैश्विक नेताओं, नीति-निर्माताओं, तकनीकी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भाग लिया। ‘दिल्ली घोषणा’ को एआई गवर्नेंस, पारदर्शिता और साझा वैश्विक जिम्मेदारी की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
‘दिल्ली घोषणा’ का मूल उद्देश्य एआई तकनीक के विकास और उपयोग को मानव कल्याण, लोकतांत्रिक मूल्यों और वैश्विक समानता के अनुरूप सुनिश्चित करना है। घोषणा में स्पष्ट किया गया है कि एआई के लाभ पूरी मानवता तक समान रूप से पहुंचें, न कि केवल चुनिंदा देशों या कंपनियों तक सीमित रहें। इसमें सात प्रमुख स्तंभों पर जोर दिया गया है:
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एआई संसाधनों का लोकतंत्रीकरण
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आर्थिक वृद्धि और सामाजिक कल्याण
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सुरक्षित और भरोसेमंद एआई सिस्टम
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विज्ञान और नवाचार के लिए खुला सहयोग
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सामाजिक सशक्तिकरण और कौशल विकास
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मानव संसाधन और डिजिटल शिक्षा का विस्तार
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लचीली, पारदर्शी और जवाबदेह एआई नीतियां
इन स्तंभों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई का विकास केवल तकनीकी उपलब्धि न रहे, बल्कि सामाजिक प्रगति का साधन बने।
किन देशों ने किया समर्थन?
इस पहल को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा सहित 86 देशों का समर्थन मिला। कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इसे समर्थन दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने व्यापक स्तर पर सहमति मिलना यह दर्शाता है कि एआई के वैश्विक नियमन की आवश्यकता को अब सभी देश गंभीरता से समझ रहे है
भारत ने इस समिट की मेजबानी करते हुए खुद को ग्लोबल एआई हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। भारत पहले से ही डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—जैसे आधार, यूपीआई और डिजिटल स्वास्थ्य मिशन—के माध्यम से टेक्नोलॉजी आधारित जनसेवा का मॉडल प्रस्तुत कर चुका है। अब एआई के क्षेत्र में भी भारत समावेशी मॉडल पर जोर दे रहा है।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि एआई का भविष्य केवल कोड और एल्गोरिद्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवता के साझा मूल्यों से जुड़ा है। उन्होंने विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहयोग, डेटा साझाकरण और कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत-ब्राजील साझेदारी पर फोकस
समिट के दौरान भारत और ब्राजील के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हुई। दोनों देशों ने 2030 तक व्यापार को 20-30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा। डिजिटल सहयोग, हरित ऊर्जा, रक्षा और एआई अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनी। यह साझेदारी दर्शाती है कि एआई केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक सहयोग का भी माध्यम बन रहा है।
एआई गवर्नेंस: क्यों जरूरी?
एआई तकनीक तेजी से विकसित हो रही है। चैटबॉट्स, स्वचालित वाहन, हेल्थकेयर डायग्नोस्टिक्स और फाइनेंस सेक्टर में एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, गलत सूचना और रोजगार पर प्रभाव जैसी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।
‘दिल्ली घोषणा’ इन चुनौतियों से निपटने के लिए साझा नीति ढांचा तैयार करने की बात करती है। इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मानकों को प्राथमिकता दी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वैश्विक स्तर पर नियम और मानक तय नहीं किए गए, तो एआई का दुरुपयोग सामाजिक असमानता और सुरक्षा जोखिम बढ़ा सकता है।
विकासशील देशों के लिए अवसर
घोषणा में विशेष रूप से विकासशील और निम्न-आय वाले देशों के लिए तकनीकी सहायता और निवेश बढ़ाने की बात कही गई है। भारत ने प्रस्ताव रखा कि एआई रिसर्च और डेटा सेट्स तक खुली पहुंच सुनिश्चित की जाए, ताकि छोटे देश भी नवाचार में भागीदारी कर सकें।
यह पहल डिजिटल डिवाइड को कम करने में मददगार हो सकती है। यदि एआई के लाभ शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन तक पहुंचते हैं, तो यह करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
निजी क्षेत्र और स्टार्टअप की भूमिका
समिट में बड़ी टेक कंपनियों और स्टार्टअप प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। उन्होंने एआई में निवेश, रिसर्च और जिम्मेदार नवाचार पर अपने विचार साझा किए। भारत के उभरते स्टार्टअप इकोसिस्टम को इससे बड़ा अवसर मिल सकता है। एआई आधारित हेल्थटेक, एग्रीटेक और फिनटेक स्टार्टअप के लिए वैश्विक बाजार खुलने की संभावना है।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि ‘दिल्ली घोषणा’ को व्यापक समर्थन मिला है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा। प्रत्येक देश की अपनी कानूनी और आर्थिक प्राथमिकताएं हैं। डेटा लोकलाइजेशन, बौद्धिक संपदा अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं। फिर भी, यह पहल एक साझा मंच तैयार करती है जहां संवाद और सहयोग जारी रह सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख चालक बनेगा। ऐसे में यह जरूरी है कि तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक और सामाजिक संतुलन भी बना रहे।
वैश्विक राजनीति पर प्रभाव
एआई को अब केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ पहले से ही एआई नेतृत्व की होड़ में हैं। ‘दिल्ली घोषणा’ इस प्रतिस्पर्धा को सहयोग में बदलने की दिशा में एक प्रयास है। यदि देश साझा मानकों पर सहमत होते हैं, तो यह वैश्विक स्थिरता को मजबूत कर सकता है।
अमेरिका सहित 86 देशों द्वारा ‘दिल्ली घोषणा’ को अपनाना इस बात का संकेत है कि दुनिया एआई के भविष्य को लेकर गंभीर है। यह पहल तकनीक को मानवता के हित में उपयोग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारत की सक्रिय भूमिका इसे और भी प्रासंगिक बनाती है। अब चुनौती यह है कि घोषणाओं को जमीनी स्तर पर लागू किया जाए और एआई को सचमुच समावेशी, सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जाए।
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