abworldnews

अफगानिस्तान में तालिबान के 5 साल: महिलाओं की आजादी पर पाबंदी, प्रेस पर दबाव और सार्वजनिक सजा

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के पांच साल पूरे हो गए हैं। 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर अफगानिस्तान की पिछली सरकार को सत्ता से हटा दिया था। पांच साल बाद 15 अगस्त 2026 को तालिबान अपने शासन की वर्षगांठ मना रहा है, लेकिन देश की तस्वीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में गंभीर चिंताएं सामने आती रही हैं। महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार, आवाजाही और सार्वजनिक जीवन पर व्यापक पाबंदियां, मीडिया की स्वतंत्रता में कमी, आलोचकों पर कार्रवाई और सार्वजनिक दंड की वापसी अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति की प्रमुख विशेषताएं बन गई हैं।

तालिबान सत्ता में वापसी के पांच साल बाद खुद को अफगानिस्तान का स्थिर शासक बताता है। 15 अगस्त को काबुल में शासन की पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और तालिबान ने 2021 में अमेरिकी नेतृत्व वाली विदेशी सेनाओं की वापसी को अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश किया। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र और मानवीय सहायता संगठनों का कहना है कि सुरक्षा स्थिति में कुछ बदलावों के बावजूद आम अफगानों के सामने गरीबी, बेरोजगारी, मानवीय संकट और अधिकारों से जुड़ी गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं।

इस पूरे पांच साल के दौर की सबसे बड़ी कहानी महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों से जुड़ी रही है। तालिबान के सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर रोक लगाई गई और बाद में महिलाओं के विश्वविद्यालयों में पढ़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। 2026 तक अफगानिस्तान दुनिया का ऐसा एकमात्र देश बना हुआ है जहां लड़कियों और महिलाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा पर इस तरह की व्यापक रोक जारी है। Human Rights Watch के अनुसार महिलाओं और लड़कियों को रोजगार, आवाजाही, सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

महिलाओं के लिए समस्या सिर्फ स्कूल या विश्वविद्यालय बंद होने तक सीमित नहीं रही। समय के साथ नियमों का दायरा बढ़ता गया। महिलाओं के काम करने, सार्वजनिक जगहों पर जाने, यात्रा करने और सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने पर कई तरह की पाबंदियां लागू हुईं। संयुक्त राष्ट्र ने इन प्रतिबंधों को महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर अत्यंत कठोर हमला बताया है। 2023 में UNAMA ने कहा था कि तालिबान के नियम महिलाओं और लड़कियों को सार्वजनिक जीवन से व्यवस्थित रूप से बाहर कर रहे हैं।

2026 में भी स्थिति में कोई बड़ा सुधार दिखाई नहीं दिया है। Equality Now के मुताबिक 15 अगस्त 2026 तक तालिबान के de facto authorities महिलाओं और लड़कियों के जीवन को प्रभावित करने वाले करीब 100 edicts, decrees और directives जारी कर चुके हैं। इनमें शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक उपस्थिति और महिलाओं की आवाज तक से जुड़े प्रतिबंध शामिल हैं।

इसका असर अफगान समाज की अगली पीढ़ी पर भी पड़ रहा है। जब लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से बाहर रखा जाता है तो इसका असर केवल वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर नहीं पड़ता, बल्कि भविष्य के डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, पत्रकार और अन्य पेशेवर तैयार होने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध का असर स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अफगानिस्तान जैसे देश में महिला स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई महिलाएं पुरुष डॉक्टरों के सामने इलाज कराने में सहज नहीं होतीं और कुछ परिस्थितियों में धार्मिक या सामाजिक नियमों के कारण महिला स्वास्थ्यकर्मी तक पहुंच आवश्यक होती है। इसलिए महिलाओं को शिक्षा और रोजगार से दूर रखने का असर पूरे समाज की स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ता है।

महिलाओं की आवाजाही को लेकर भी कई नियम बनाए गए हैं। कई मामलों में महिलाओं को लंबी दूरी की यात्रा या कुछ सार्वजनिक स्थानों पर जाने के लिए पुरुष रिश्तेदार यानी मह्रम की आवश्यकता होती है। इससे स्वतंत्र रूप से काम, शिक्षा, इलाज या अन्य जरूरी गतिविधियों के लिए यात्रा करना मुश्किल हो सकता है।

महिलाओं के सार्वजनिक जीवन से पीछे हटने का असर अफगान अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। आधी आबादी की आर्थिक भागीदारी सीमित होने से देश की productive capacity प्रभावित होती है। ऐसे समय में जब अफगानिस्तान पहले से आर्थिक संकट और मानवीय जरूरतों का सामना कर रहा है, महिलाओं को रोजगार से दूर रखने से परिवारों की आय के अवसर भी कम हो सकते हैं।

तालिबान के पांच साल के शासन की दूसरी बड़ी कहानी प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी है। 2021 के बाद अफगान मीडिया sector पर दबाव बढ़ने की रिपोर्टें लगातार सामने आती रही हैं। पत्रकारों को गिरफ्तार किए जाने, मीडिया संस्थानों पर प्रतिबंध और आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए कार्रवाई की शिकायतें अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने दर्ज की हैं। Human Rights Watch ने कहा है कि तालिबान ने पत्रकारों और आलोचकों को हिरासत में लिया तथा मीडिया पर गंभीर प्रतिबंध लगाए।

2026 की Amnesty International रिपोर्ट में भी independent और critical media पर कार्रवाई की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों को गिरफ्तार करने और आलोचनात्मक मीडिया को दबाने की घटनाएं जारी रहीं। कुछ इलाकों में जीवित लोगों की तस्वीरें या images प्रसारित करने पर भी प्रतिबंध लगाए गए। इससे अफगान मीडिया के लिए स्वतंत्र तरीके से काम करना और भी मुश्किल हो गया है।

मीडिया पर पाबंदियों का असर केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं होता। जब किसी देश में स्वतंत्र मीडिया कमजोर होता है तो जनता के लिए सरकार की नीतियों, स्थानीय घटनाओं और मानवाधिकारों से जुड़ी जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। इससे समाज में information gap बढ़ता है।

पत्रकारों के सामने एक और समस्या self-censorship की होती है। अगर आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के कारण गिरफ्तारी, पूछताछ या अन्य कार्रवाई का खतरा हो तो पत्रकार संवेदनशील विषयों पर रिपोर्ट करने से बच सकते हैं। परिणामस्वरूप जनता को कई महत्वपूर्ण मुद्दों की पूरी तस्वीर नहीं मिल पाती।

तालिबान के शासन में सार्वजनिक दंड और शारीरिक सजा भी एक बड़ा विवादित मुद्दा बना है। संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों के मुताबिक 2025 के पहले आठ महीनों में सार्वजनिक फांसी और corporal punishment में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई। UN के आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी से 31 अगस्त 2025 के बीच कम से कम 681 लोगों को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने की सजा दी गई थी, जिनमें 552 पुरुष और 129 महिलाएं शामिल थीं।

इन सजाओं में कई बार दर्जनों कोड़े मारना शामिल रहा। संयुक्त राष्ट्र ने इस तरह के दंड को लेकर गंभीर चिंता जताई है। सार्वजनिक रूप से सजा देना किसी व्यक्ति को केवल दंडित करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरे लोगों के लिए भी डर पैदा करता है।

2025 में सार्वजनिक executions की घटनाएं भी सामने आईं। संयुक्त राष्ट्र के Special Rapporteur के दस्तावेज के अनुसार 11 अप्रैल 2025 को बदगीस, फराह और निमरोज प्रांतों में चार लोगों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी। दस्तावेज में कहा गया कि अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से कम से कम 10 लोगों को सार्वजनिक रूप से फांसी दिए जाने की रिपोर्ट थी।

यहां यह समझना जरूरी है कि तालिबान अपनी न्याय व्यवस्था को इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या के आधार पर संचालित करने की बात करता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि कई दंड अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं हैं।

2026 में न्यायिक व्यवस्था से जुड़े नियमों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय चिंता बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक में बताया गया कि जनवरी 2026 में लागू किए गए नए criminal procedure code में आलोचना, महिलाओं के अधिकार और सजा से जुड़े कई कठोर प्रावधान शामिल हैं। UN transcript में यह भी कहा गया कि आलोचना के लिए lashings, imprisonment और कुछ मामलों में death penalty जैसी सजाओं का खतरा है।

तालिबान शासन के पांच वर्षों को समझने के लिए केवल मानवाधिकारों की स्थिति देखना पर्याप्त नहीं है। देश की आर्थिक और मानवीय स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद Afghanistan international financial system से अलग-थलग पड़ा और विदेशी सहायता में भारी बदलाव आया। इससे पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा।

आज भी लाखों अफगान लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य aid organisations लगातार भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और विस्थापित लोगों के लिए सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाएं, सूखा, भूकंप और पड़ोसी देशों से लौटने वाले अफगान नागरिकों की संख्या संकट को और बढ़ा रही है। Reuters के अनुसार 2021 के बाद जरूरतमंद लोगों की संख्या में लाखों की वृद्धि हुई है।

तालिबान इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का दावा करता है। 2021 के बाद बड़े पैमाने पर अमेरिका और NATO की सैन्य मौजूदगी समाप्त हो गई और देश में पहले की तरह व्यापक युद्ध नहीं रहा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि Afghanistan पूरी तरह सुरक्षित हो गया है।

इस्लामिक स्टेट-खुरासान यानी ISKP जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियां अब भी सुरक्षा चुनौती बनी हुई हैं। 2026 में भी अफगानिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में हमलों और हाई-प्रोफाइल हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। Reuters ने भी पांच साल पूरे होने के मौके पर सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों और IS से जुड़े हमलों का उल्लेख किया है।

तालिबान के लिए पाकिस्तान के साथ संबंध भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। दोनों देशों के बीच सीमा और आतंकवाद से जुड़े विवाद समय-समय पर तनाव बढ़ाते हैं। पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान सरकार पर अफगान जमीन से पाकिस्तान विरोधी militants की गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहने का आरोप लगाता रहा है। दूसरी तरफ तालिबान ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं करता।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तालिबान की स्थिति जटिल है। पांच साल बाद भी अधिकांश देश तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देते। Reuters के अनुसार रूस 2026 तक तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाला एकमात्र देश है। हालांकि कई देश तालिबान के साथ सीमित राजनयिक और आर्थिक संपर्क बनाए हुए हैं।

यह स्थिति पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे बदली है। कई देशों ने शुरुआत में तालिबान से दूरी बनाई थी, लेकिन बाद में आतंकवाद, migration, regional security और व्यापार जैसे मुद्दों पर बातचीत शुरू हुई। इसका मतलब यह नहीं है कि उन देशों ने तालिबान की मानवाधिकार नीतियों को स्वीकार कर लिया है।

यूरोपीय देशों और अन्य सरकारों के सामने एक कठिन संतुलन है। एक तरफ उन्हें Afghanistan में आतंकवाद, migration और humanitarian assistance जैसे मुद्दों पर Taliban authorities से बातचीत करनी पड़ती है, दूसरी तरफ महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों पर दबाव बनाए रखना होता है।

इसी वजह से पिछले पांच सालों में Afghanistan के प्रति international policy में “पूर्ण अलगाव” से “सीमित engagement” की ओर बदलाव देखा गया है। लेकिन recognition और normal diplomatic relations का मुद्दा अभी भी human rights concerns से जुड़ा हुआ है।

तालिबान के समर्थक यह तर्क देते हैं कि 2021 के बाद देश में बड़े पैमाने का युद्ध कम हुआ है, प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत हुआ है और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप समाप्त हुआ है। तालिबान ने अपने पांच साल के शासन को विदेशी प्रभाव के अंत और राष्ट्रीय संप्रभुता की बहाली के रूप में पेश किया है। 15 अगस्त 2026 की उसकी anniversary celebrations में भी यही narrative प्रमुख रहा।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि सिर्फ सत्ता पर नियंत्रण और युद्ध में कमी को स्थिरता नहीं कहा जा सकता। किसी देश की स्थिरता में नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून का शासन और मौलिक अधिकार भी शामिल होते हैं।

महिलाओं के अनुभव इस अंतर को सबसे ज्यादा दिखाते हैं। पांच साल पहले तालिबान की वापसी के बाद कुछ महिलाओं को शुरुआत में उम्मीद थी कि इस बार नियम पहले शासनकाल की तुलना में अलग होंगे। लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन पर restrictions बढ़ते गए। 2026 में कई महिलाओं का कहना है कि उनके जीवन का दायरा घर तक सीमित हो गया है।

हालिया रिपोर्टों में अफगान महिलाओं की व्यक्तिगत कहानियां भी सामने आई हैं। कुछ महिलाएं अपना रोजगार खो चुकी हैं, कुछ शिक्षा जारी नहीं रख पाईं और कुछ अपने परिवारों की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए छिपकर या घर से काम करने की कोशिश करती हैं। कई महिलाओं ने सुरक्षा कारणों से अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं की।

इन कहानियों से पता चलता है कि सरकारी नियमों का वास्तविक असर रोजमर्रा की जिंदगी में कितना व्यापक है। किसी महिला के लिए स्कूल जाना बंद होना सिर्फ पढ़ाई बंद होना नहीं है। इससे उसका करियर, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक नेटवर्क और भविष्य की decision-making capacity भी प्रभावित होती है।

लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध का असर और भी लंबा हो सकता है। अगर कई साल तक एक पूरी पीढ़ी की लड़कियां secondary school और university education से बाहर रहती हैं तो भविष्य में skilled female workforce की कमी हो सकती है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सेवाओं में इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है।

तालिबान शासन की पांचवीं वर्षगांठ इसलिए सिर्फ एक राजनीतिक anniversary नहीं है। यह इस बात का भी मौका है कि पिछले पांच वर्षों में Afghanistan के आम नागरिकों की जिंदगी किस दिशा में गई है, इसका मूल्यांकन किया जाए।

एक तरफ तालिबान अपने शासन को स्थिरता और विदेशी प्रभाव से स्वतंत्रता की सफलता के रूप में पेश कर रहा है। दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें महिलाओं के अधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता, corporal punishment और humanitarian crisis को लेकर गंभीर चिंताएं सामने रख रही हैं।

आने वाले वर्षों में तालिबान के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ता बनाए रखना नहीं बल्कि Afghanistan को एक ऐसा देश बनाना होगी जहां आर्थिक विकास और मानवीय सुरक्षा के साथ नागरिकों के अधिकार भी सुनिश्चित हों।

अगर महिलाओं को शिक्षा और रोजगार से बाहर रखा जाता है, मीडिया को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति नहीं मिलती और आलोचना के लिए कठोर दंड का डर बना रहता है, तो international recognition और economic integration की राह मुश्किल बनी रह सकती है।

दूसरी ओर, अगर Taliban authorities महिलाओं की शिक्षा और रोजगार पर restrictions कम करते हैं, independent media के लिए जगह बनाते हैं और न्यायिक प्रक्रिया को international human rights standards के अनुरूप सुधारते हैं तो Afghanistan के लिए international engagement के रास्ते अधिक खुल सकते हैं।

फिलहाल पांच साल पूरे होने पर स्थिति यही दिखाती है कि तालिबान ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, लेकिन शासन की वैधता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। Russia की recognition के बावजूद अधिकांश दुनिया Taliban के साथ पूर्ण diplomatic normalization से अभी दूर है।

अफगानिस्तान के आम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल इससे अलग है—क्या आने वाले वर्षों में उन्हें बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वतंत्रता मिलेगी?

विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों के लिए यह सवाल और गंभीर है। पांच साल में लगाए गए प्रतिबंधों ने उनकी जिंदगी को जिस तरह बदला है, उसे वापस सामान्य करना आसान नहीं होगा। शिक्षा से बाहर हुई लड़कियों के लिए हर गुजरता साल उनके भविष्य पर असर डालता है।

कुल मिलाकर, 15 अगस्त 2026 को तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के पांच साल पूरे हो गए हैं। तालिबान इस दिन को अपनी सत्ता और विदेशी सेनाओं की वापसी की जीत के रूप में देखता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र, Human Rights Watch और अन्य मानवाधिकार संगठनों के आकलन में तस्वीर काफी अलग है। महिलाओं और लड़कियों पर शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी पाबंदियां, मीडिया की स्वतंत्रता पर दबाव और सार्वजनिक कोड़े जैसी सजाओं का इस्तेमाल अफगानिस्तान की मानवाधिकार स्थिति को गंभीर बनाता है।

पांच साल बाद Afghanistan में युद्ध का स्वरूप जरूर बदला है, लेकिन देश के सामने मानवीय संकट और अधिकारों की चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। तालिबान के लिए अब असली परीक्षा केवल शासन चलाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें देश की आधी आबादी यानी महिलाओं और लड़कियों को भी शिक्षा, काम और सार्वजनिक जीवन में सम्मानजनक जगह मिले।


अफगानिस्तान टेस्ट के लिए भारत की संभावित प्लेइंग-11, पडिक्कल को मौका; हर्ष दुबे या मानव सुथार कर सकते हैं डेब्यू

http://अफगानिस्तान में तालिबान शासन के पांच साल पूरे होने पर काबुल का दृश्य

Exit mobile version