ऑस्ट्रेलिया में मौजूद कुछ झीलें अपनी अनोखी बनावट और रंगों के कारण दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। इन झीलों की सबसे खास बात यह है कि इनका रंग हर साल बदलता रहता है और ऊपर से देखने पर ये बिल्कुल ऐसे दिखाई देती हैं जैसे किसी प्लेट में टूटे हुए अंडे रखे हों। इन झीलों का यह अनोखा दृश्य न केवल देखने में अद्भुत लगता है बल्कि इसके पीछे छिपा वैज्ञानिक कारण भी काफी दिलचस्प है।
ये झीलें पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के उस क्षेत्र में स्थित हैं जहां विशाल कृषि भूमि और नमक से भरपूर इलाके पाए जाते हैं। इस क्षेत्र को क्लेटनबेल्ट कहा जाता है, जो करीब 1.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया में गेहूं उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। इसी इलाके में दर्जनों छोटी-बड़ी झीलें मौजूद हैं जो ऊपर से देखने पर अंडे जैसी आकृति बनाती हुई दिखाई देती हैं।
जब इन झीलों की तस्वीरें हवाई जहाज या ड्रोन से ली जाती हैं तो यह दृश्य और भी अद्भुत दिखाई देता है। झीलों के बीच का पानी नारंगी, गुलाबी या लाल रंग का दिखाई देता है जबकि किनारों पर सफेद रंग की परत नजर आती है। यही वजह है कि दूर से देखने पर यह बिल्कुल अंडे की जर्दी और सफेद हिस्से जैसा लगता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इन झीलों के रंग बदलने का मुख्य कारण वहां मौजूद सूक्ष्म जीव और शैवाल हैं। दरअसल इन झीलों का पानी बहुत अधिक खारा होता है और उसमें नमक की मात्रा काफी ज्यादा पाई जाती है। ऐसे वातावरण में कुछ खास प्रकार के सूक्ष्म जीव पनपते हैं जो सूर्य की तेज रोशनी और गर्मी से बचने के लिए विशेष प्रकार के रंगद्रव्य पैदा करते हैं।
इन सूक्ष्म जीवों में बीटा-कैरोटीन नामक पदार्थ पाया जाता है, जो पानी को गुलाबी या नारंगी रंग देने में मदद करता है। जब इन जीवों की संख्या बढ़ती है तो झील का रंग अधिक गहरा दिखाई देने लगता है। मौसम बदलने के साथ-साथ इन जीवों की संख्या भी बदलती रहती है, जिससे झील का रंग भी बदलता रहता है।
इस इलाके में हजारों साल पहले बड़ी-बड़ी नदियां बहती थीं। समय के साथ जब जलवायु में बदलाव आया तो ये नदियां सूख गईं और उनकी जगह गहरे गड्ढे बन गए। बाद में बारिश का पानी इन गड्ढों में जमा होने लगा और धीरे-धीरे ये झीलों में बदल गए। चूंकि इन क्षेत्रों में पानी का बहाव सीमित है, इसलिए नमक की मात्रा लगातार बढ़ती गई।
झीलों के किनारों पर जो सफेद परत दिखाई देती है वह दरअसल नमक की मोटी परत होती है। गर्मी के मौसम में पानी सूखने लगता है और नमक सतह पर जमा होकर सफेद रंग की परत बना देता है। यही वजह है कि झील के किनारे सफेद दिखाई देते हैं जबकि बीच का पानी रंगीन नजर आता है।
दिसंबर से मार्च के बीच इन झीलों का दृश्य सबसे अधिक आकर्षक होता है। इस समय सूर्य की रोशनी और तापमान अधिक होने के कारण सूक्ष्म जीव तेजी से सक्रिय हो जाते हैं और पानी का रंग गहरा गुलाबी या नारंगी दिखाई देता है। इसी दौरान पर्यटक और फोटोग्राफर बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि इन झीलों की वजह से पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। यहां आने वाले पर्यटक न केवल इन झीलों को देखने के लिए आते हैं बल्कि आसपास के प्राकृतिक दृश्य और वन्यजीवन का भी आनंद लेते हैं।
वैज्ञानिक इन झीलों का अध्ययन लगातार कर रहे हैं क्योंकि यह पृथ्वी पर मौजूद अत्यधिक खारे जल वाले वातावरण का एक अनोखा उदाहरण हैं। इन झीलों से प्राप्त जानकारी भविष्य में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कई वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी झीलों का अध्ययन अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं को समझने में भी मदद कर सकता है। क्योंकि यदि अत्यधिक खारे और कठिन वातावरण में सूक्ष्म जीव जीवित रह सकते हैं तो संभव है कि इसी प्रकार के जीव अन्य ग्रहों पर भी मौजूद हों।
इस तरह ऑस्ट्रेलिया की ये रंग बदलने वाली झीलें केवल प्राकृतिक सौंदर्य का उदाहरण नहीं हैं बल्कि वैज्ञानिक शोध और पर्यटन दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
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