भारतीय क्रिकेट टीम के लगातार व्यस्त होते इंटरनेशनल कैलेंडर, खिलाड़ियों की बढ़ती चोटों और बड़े विदेशी दौरों में तैयारी के लिए कम समय मिलने की समस्या को लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी BCCI अब अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। बोर्ड चाहता है कि अगले Future Tours Programme यानी FTP में भारतीय खिलाड़ियों को एक सीरीज खत्म होने और दूसरी बड़ी सीरीज शुरू होने के बीच पर्याप्त आराम, रिकवरी और तैयारी का समय मिले। खास तौर पर South Africa, England, New Zealand और Australia जैसे SENA देशों के दौरे से पहले खिलाड़ियों को सीधे मुकाबले में उतारने के बजाय उन्हें वहां की परिस्थितियों में ढलने का मौका देने पर जोर दिया जा रहा है। BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने हालिया समीक्षा बैठक के बाद साफ तौर पर कहा कि मौजूदा समय में खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती साल में बहुत ज्यादा मैच खेलना है और अगले FTP में इससे निपटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
BCCI की यह सोच ऐसे समय में सामने आई है जब भारतीय क्रिकेट में लगातार खिलाड़ियों की फिटनेस और चोटों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ समय में कई अहम खिलाड़ी अलग-अलग कारणों से मैचों से बाहर रहे हैं और बोर्ड को यह महसूस हुआ है कि सिर्फ मेडिकल या रिहैबिलिटेशन व्यवस्था को मजबूत करना ही पर्याप्त नहीं है। खिलाड़ियों को चोट से बचाने के लिए मैचों की संख्या, उनके बीच का अंतर और यात्रा कार्यक्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देवजीत सैकिया ने बताया कि खिलाड़ियों की चोटों के पीछे लगातार मैच खेलना एक बड़ा कारण हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इंग्लैंड दौरे पर गई 15 सदस्यीय वनडे टीम में कई खिलाड़ी चोटिल हुए, जबकि उससे पहले खिलाड़ी लगभग दो महीने IPL में व्यस्त रहे थे।
यही वजह है कि BCCI अब केवल खिलाड़ियों को ज्यादा आराम देने की बात नहीं कर रहा, बल्कि पूरे Future Tours Programme को ज्यादा व्यावहारिक तरीके से तैयार करने पर विचार कर रहा है। FTP अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लंबे समय के कार्यक्रम को तय करने वाला ढांचा है, जिसमें अलग-अलग देशों के दौरे, द्विपक्षीय सीरीज और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों की योजना बनाई जाती है। मौजूदा FTP 2027 तक चल रहा है, इसलिए अगले चक्र में BCCI के पास शेड्यूल को खिलाड़ी-केंद्रित तरीके से प्रभावित करने का बड़ा अवसर होगा। बोर्ड का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि महत्वपूर्ण सीरीज से पहले खिलाड़ी मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से पूरी तरह तैयार रहें।
सबसे ज्यादा ध्यान SENA दौरों पर दिया जा रहा है। SENA का मतलब South Africa, England, New Zealand और Australia है। इन चारों देशों में क्रिकेट की परिस्थितियां भारतीय उपमहाद्वीप से काफी अलग होती हैं। वहां की पिच, मौसम, गेंद की मूवमेंट, उछाल और तेज हवाओं जैसी परिस्थितियां भारतीय खिलाड़ियों के सामने अलग तरह की चुनौती पेश करती हैं। खास तौर पर टेस्ट क्रिकेट में इन देशों में सफल होने के लिए सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं होती, बल्कि खिलाड़ियों को परिस्थितियों के अनुरूप ढलने के लिए समय भी चाहिए। BCCI अब इसी तैयारी को अपने अगले FTP में ज्यादा महत्व देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
बोर्ड की योजना के अनुसार किसी बड़े SENA दौरे से ठीक पहले खिलाड़ियों को बिना तैयारी के मैदान पर नहीं उतारा जाएगा। उनके लिए पर्याप्त acclimatisation यानी स्थानीय परिस्थितियों में ढलने का समय रखा जा सकता है। इसके अलावा practice या warm-up games को भी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसका मतलब यह होगा कि भारतीय टीम किसी विदेशी देश में पहुंचने के बाद सीधे इंटरनेशनल सीरीज शुरू करने के बजाय वहां की पिच और वातावरण को समझने के लिए अभ्यास मैच खेले। इससे बल्लेबाजों को उछाल और गेंद की गति को समझने में मदद मिलेगी, जबकि गेंदबाज वहां की परिस्थितियों के हिसाब से अपनी लाइन और लेंथ पर काम कर सकेंगे।
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा टेस्ट क्रिकेट को मिल सकता है। विदेशी टेस्ट दौरे अक्सर कई सप्ताह तक चलते हैं और इस दौरान खिलाड़ियों पर शारीरिक तथा मानसिक दबाव काफी बढ़ जाता है। यदि टीम किसी विदेशी दौरे पर पहुंचते ही लगातार मैच खेलने लगे तो खिलाड़ियों के लिए परिस्थितियों में ढलना मुश्किल हो सकता है। इसके उलट अगर शुरुआती दिनों में अभ्यास, आराम और warm-up games के लिए समय मिलता है तो खिलाड़ी बेहतर तैयारी के साथ सीरीज में उतर सकते हैं। BCCI का नया विचार इसी अंतर को कम करने की कोशिश है।
भारतीय क्रिकेट में यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट, IPL और घरेलू क्रिकेट के कारण खिलाड़ियों का कैलेंडर बेहद व्यस्त हो गया है। एक खिलाड़ी अगर तीनों फॉर्मेट में टीम का हिस्सा है तो उसके लिए सालभर लगातार क्रिकेट खेलना सामान्य बात बन चुकी है। इसके साथ यात्रा और अलग-अलग परिस्थितियों में खेलने का दबाव भी जुड़ जाता है। BCCI सचिव ने खुद माना कि साल में बहुत ज्यादा मैच खेलना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में बोर्ड को अब यह देखना होगा कि खिलाड़ियों को आराम देने और व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
IPL भी इस पूरी चर्चा का अहम हिस्सा है। IPL भारतीय खिलाड़ियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण टूर्नामेंट है, लेकिन इसकी लंबी अवधि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कार्यक्रम पर भी प्रभाव डालती है। यदि कोई खिलाड़ी IPL में लगभग दो महीने लगातार खेलता है और उसके तुरंत बाद विदेशी दौरे पर पहुंच जाता है, तो उसके शरीर को पर्याप्त रिकवरी का समय नहीं मिल पाता। BCCI के सामने चुनौती यह है कि घरेलू और फ्रेंचाइजी क्रिकेट की लोकप्रियता तथा आर्थिक महत्व को बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का workload कैसे नियंत्रित किया जाए। यही वजह है कि अगले FTP में केवल मैचों की संख्या नहीं बल्कि उनके बीच के गैप पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
हालिया BCCI समीक्षा बैठक में इसी व्यापक मुद्दे पर चर्चा हुई। बैठक में भारतीय टेस्ट और वनडे कप्तान शुभमन गिल, T20I कप्तान श्रेयस अय्यर, मुख्य कोच गौतम गंभीर और Centre of Excellence के प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण सहित बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में हालिया विदेशी दौरों के प्रदर्शन, खिलाड़ियों की चोट, fitness management और भविष्य की रणनीति पर विचार किया गया। मुख्य चयनकर्ता अजित अगरकर बैठक में शामिल नहीं हुए, लेकिन सैकिया ने स्पष्ट किया कि बैठक का फोकस किसी एक खिलाड़ी के भविष्य से ज्यादा भारतीय क्रिकेट की व्यापक योजना पर था।
इस बैठक के बाद BCCI ने यह भी संकेत दिया कि injury management के लिए पहले से protocols मौजूद हैं। चोट लगने के बाद खिलाड़ी को अपनी मेडिकल टीम या Centre of Excellence के rehabilitation programme से गुजरना पड़ता है और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी से पहले कुछ निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। लेकिन बोर्ड अब इस पूरी प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने पर विचार कर रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि खिलाड़ी पूरी तरह फिट हुए बिना मैदान पर वापस न आए और एक बार फिट होने के बाद लगातार मैचों के दबाव से दोबारा चोटिल भी न हो।
BCCI की सोच में एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि केवल fitness को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा। बोर्ड अब schedule को भी injury prevention का हिस्सा मान रहा है। अगर किसी खिलाड़ी को पर्याप्त आराम नहीं मिलेगा, लगातार यात्रा करनी पड़ेगी और एक के बाद एक अलग-अलग फॉर्मेट के मैच खेलने होंगे, तो चोट का खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इसलिए आने वाले FTP में खिलाड़ियों के लिए rest window बनाना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत कम क्रिकेट खेलेगा, बल्कि मैचों को ज्यादा समझदारी से व्यवस्थित करने की कोशिश होगी।
इसी संदर्भ में 22 और 23 सितंबर को दुबई में होने वाली वर्कशॉप/बैठक का भी उल्लेख सामने आया है, जहां क्रिकेट से जुड़े कार्यक्रम और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की जा सकती है। हालांकि इस तारीख की BCCI workshop का विस्तृत आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक स्रोतों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे अभी अंतिम कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि BCCI अंतरराष्ट्रीय स्तर पर FTP और भविष्य के क्रिकेट कैलेंडर को लेकर दूसरे क्रिकेट बोर्डों तथा संबंधित संस्थाओं के साथ बातचीत करेगा। BCCI सचिव ने भी कहा है कि FTP से जुड़े लोग जल्द ही विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बैठकें करेंगे।
दुबई क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय प्रशासन का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है क्योंकि ICC का मुख्यालय वहीं है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कार्यक्रम, द्विपक्षीय सीरीज और लंबे समय के क्रिकेट ढांचे को लेकर वहां होने वाली चर्चाएं स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण होती हैं। हालांकि किसी भी workshop के बारे में आधिकारिक पुष्टि और उसके एजेंडे को अंतिम रूप से सामने आने के बाद ही निश्चित जानकारी मानी जानी चाहिए।
BCCI के सामने सबसे बड़ा सवाल यह भी रहेगा कि आराम के लिए कितना गैप रखा जाए। बहुत ज्यादा गैप से खिलाड़ियों की मैच प्रैक्टिस प्रभावित हो सकती है, जबकि बहुत कम गैप से workload और injury का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बोर्ड को ऐसा संतुलन बनाना होगा जिसमें खिलाड़ी आराम भी कर सकें और लगातार क्रिकेट से पूरी तरह बाहर भी न हों। इसी कारण warm-up matches का विचार महत्वपूर्ण है। ये मुकाबले खिलाड़ियों को competitive environment में अभ्यास करने का मौका देंगे, लेकिन इन पर इंटरनेशनल सीरीज जैसा दबाव नहीं होगा।
उदाहरण के लिए अगर भारत को ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज खेलनी है तो टीम के वहां पहुंचने के बाद कुछ दिन आराम और acclimatisation के लिए रखे जा सकते हैं। इसके बाद अभ्यास सत्र और warm-up match आयोजित किया जा सकता है। बल्लेबाज तेज और उछाल वाली पिच पर अपना फुटवर्क सुधार सकते हैं और गेंदबाज स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से गेंदबाजी की योजना बना सकते हैं। इसी तरह इंग्लैंड में ड्यूक गेंद और स्विंग की परिस्थितियों को समझने के लिए अतिरिक्त अभ्यास उपयोगी हो सकता है। South Africa में उछाल और तेज गेंदबाजी तथा New Zealand में मौसम और सीम मूवमेंट जैसी चुनौतियों के लिए तैयारी की जा सकती है।
इस रणनीति का फायदा युवा खिलाड़ियों को भी मिलेगा। अगर किसी खिलाड़ी को अचानक बड़े विदेशी दौरे पर टीम में शामिल किया जाता है तो उसके पास परिस्थितियों को समझने का समय कम होता है। लेकिन अगर टीम के साथ practice matches और acclimatisation camp होंगे तो युवा खिलाड़ियों को इंटरनेशनल स्तर के दबाव से पहले खुद को तैयार करने का मौका मिलेगा। इससे भविष्य में भारतीय टीम की bench strength भी मजबूत हो सकती है।
BCCI के लिए यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत को अगले कुछ वर्षों में लगातार बड़े टूर्नामेंट और विदेशी दौरों का सामना करना है। 2027 ODI World Cup की तैयारी भी धीरे-धीरे तेज होनी है। बोर्ड अब केवल अगले मैच के बारे में नहीं बल्कि अगले कई वर्षों की टीम संरचना और workload planning के बारे में सोच रहा है। हालिया बैठक में 2027 विश्व कप की दिशा में roadmap पर भी चर्चा हुई।
हालांकि इस पूरे बदलाव के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का कैलेंडर केवल BCCI अपने स्तर पर तय नहीं कर सकता। ICC का कार्यक्रम, दूसरे देशों के क्रिकेट बोर्ड, प्रसारण अधिकार, bilateral commitments और IPL जैसे घरेलू टूर्नामेंट सभी को ध्यान में रखना पड़ता है। इसलिए हर सीरीज के बीच लंबा गैप बनाना आसान नहीं होगा। BCCI को दूसरे बोर्डों के साथ तालमेल बनाकर ही ऐसा FTP तैयार करना होगा जिसमें खिलाड़ियों की जरूरत और क्रिकेट की व्यावसायिक जरूरत दोनों का संतुलन हो।
इसके बावजूद बोर्ड का यह कदम भारतीय क्रिकेट के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में टीम इंडिया ने कई बार खिलाड़ियों की चोट और availability की समस्या का सामना किया है। किसी बड़े दौरे से पहले प्रमुख खिलाड़ी फिट न हों तो पूरी टीम का संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए बेहतर scheduling को केवल आराम की नीति नहीं बल्कि performance strategy के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
देवजीत सैकिया ने यह भी स्पष्ट किया कि BCCI के अलग-अलग विभागों के बीच coordination को लेकर कोई बड़ी समस्या नहीं है। उनके मुताबिक बोर्ड, टीम मैनेजमेंट, coaches, Centre of Excellence और अन्य संबंधित विभागों के बीच तालमेल है। उनके अनुसार मौजूदा चुनौती मुख्य रूप से बहुत ज्यादा मैचों की है। यही वजह है कि अगला FTP बनाते समय workload को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
कुल मिलाकर BCCI की नई सोच का सीधा संदेश यही है कि भारतीय खिलाड़ियों को हर बड़ी सीरीज से पहले सिर्फ मैदान पर पहुंचना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें आराम, रिकवरी, स्थानीय परिस्थितियों में ढलने और practice matches का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। SENA देशों के दौरे को लेकर यह बदलाव खास तौर पर अहम हो सकता है क्योंकि इन देशों में परिस्थितियां भारत से काफी अलग होती हैं। अगर अगला FTP इसी सोच के आधार पर तैयार होता है तो आने वाले वर्षों में भारतीय टीम को विदेशी दौरों पर बेहतर तैयारी के साथ उतरने का मौका मिल सकता है।
यह बदलाव खिलाड़ियों के लिए राहत की खबर हो सकता है, लेकिन इसका असली असर तब दिखाई देगा जब नए FTP में इन बातों को वास्तविक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। केवल घोषणा या योजना पर्याप्त नहीं होगी। आराम के दिनों, warm-up games, acclimatisation camps और खिलाड़ियों की recovery को वास्तविक शेड्यूल में जगह देनी होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी खिलाड़ी को एक फॉर्मेट से दूसरे फॉर्मेट में जाने के दौरान पर्याप्त transition time मिले।
भारतीय क्रिकेट में अब यह समझ तेजी से मजबूत हो रही है कि ज्यादा मैच हमेशा बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं देते। सही तैयारी, सही workload और सही समय पर आराम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। BCCI यदि अगले FTP में इन सभी चीजों को प्रभावी ढंग से लागू करता है तो इसका फायदा सिर्फ मौजूदा खिलाड़ियों को नहीं बल्कि आने वाली पूरी भारतीय क्रिकेट पीढ़ी को मिल सकता है। SENA दौरों से पहले पर्याप्त तैयारी का मौका मिलने से टीम विदेशी परिस्थितियों में ज्यादा आत्मविश्वास के साथ उतर सकती है और चोटों के जोखिम को भी कम किया जा सकता है। फिलहाल BCCI का फोकस इसी दिशा में दिखाई दे रहा है कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य सिर्फ ज्यादा क्रिकेट खेलने पर नहीं, बल्कि सही समय पर सही क्रिकेट खेलने और खिलाड़ियों को पर्याप्त आराम देने पर आधारित हो।
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