राजधानी दिल्ली में रविवार को एक बड़ा हादसा सामने आया। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक करीब 40 से 50 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। यह इमारत छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट यानी PG के रूप में इस्तेमाल हो रही थी। हादसे के समय इमारत के अंदर बड़ी संख्या में छात्र मौजूद होने की बात सामने आई है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक हादसे में कम से कम दो लोगों की मौत हुई है, जबकि कई लोग घायल हुए हैं और कई अन्य के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है।
घटना रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे की बताई जा रही है। दिल्ली पुलिस को दोपहर करीब 1:34 बजे बिल्डिंग गिरने की सूचना मिली, जिसके बाद पुलिस, दिल्ली फायर सर्विस, NDRF और दूसरी आपदा राहत एजेंसियों की टीमें मौके पर पहुंचीं। घटनास्थल दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के आसपास के उस इलाके में है, जहां बड़ी संख्या में छात्र PG और हॉस्टल में रहते हैं। संकरी गलियों और आसपास मौजूद घनी आबादी के कारण राहत एवं बचाव टीमों को शुरुआत में मलबे तक पहुंचने और भारी मशीनरी लगाने में भी चुनौती का सामना करना पड़ा।
जिस इमारत में हादसा हुआ, उसे स्थानीय स्तर पर ‘Hostel Daze’ नाम के PG के रूप में बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक इमारत काफी पुरानी थी और इसमें बड़ी संख्या में छात्र किराए पर रह रहे थे। रिपोर्टों में इमारत की उम्र को लेकर करीब 20 साल से लेकर 40-50 साल तक के अलग-अलग दावे सामने आए हैं। दिल्ली पुलिस की स्थानीय पूछताछ से जुड़ी जानकारी में इसे करीब 40-50 साल पुरानी बिल्डिंग बताया गया है। इसलिए फिलहाल इसे करीब 50 साल पुरानी इमारत कहे जाने की बात स्थानीय और पुलिस-आधारित रिपोर्टिंग से जुड़ी है।
हादसे को लेकर सबसे गंभीर सवाल बेसमेंट में चल रहे निर्माण या खुदाई के काम को लेकर उठ रहे हैं। अधिकारियों और स्थानीय लोगों के अनुसार, बिल्डिंग के बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था। स्थानीय लोगों ने यह भी दावा किया कि बेसमेंट में पानी जमा हो रहा था और इमारत की नींव कमजोर थी। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि केवल बेसमेंट में चल रहे काम की वजह से ही पूरी इमारत गिरी। हादसे की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
घटना के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उन्हें अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे जमीन हिल गई हो। कुछ लोगों ने इसे हल्के भूकंप या तेज कंपन जैसा बताया। इसके तुरंत बाद तेज आवाज हुई और पांच मंजिला इमारत मलबे के ढेर में बदल गई। आसपास रहने वाले लोग जब घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्हें चीख-पुकार सुनाई दी। कुछ लोगों ने बिना किसी विशेष उपकरण के अपने हाथों और उपलब्ध औजारों से मलबा हटाना शुरू कर दिया।
हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इमारत के अंदर उस समय कितने लोग मौजूद थे। स्थानीय लोगों के अलग-अलग दावों के मुताबिक करीब 30 से 50 या 40 से 50 लोग मलबे में फंसे हो सकते हैं। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने यह संख्या 50 से 60 तक बताई है। हालांकि प्रशासन की ओर से फंसे लोगों की अंतिम संख्या तत्काल स्पष्ट नहीं की गई थी। इसलिए 50 से ज्यादा लोगों के अंदर होने की बात को फिलहाल स्थानीय लोगों का दावा माना जाना चाहिए, आधिकारिक अंतिम आंकड़ा नहीं।
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक हादसे के बाद मलबे के अंदर फंसे लोगों ने मोबाइल फोन के जरिए बाहर मौजूद लोगों और अपने परिचितों से संपर्क करने की कोशिश की। इससे बचाव दल को संभावित जीवित लोगों की लोकेशन पता लगाने में मदद मिलने की उम्मीद बनी। एक स्थानीय विधायक ने भी बताया कि मलबे में फंसे कुछ लोगों से फोन पर संपर्क होने की जानकारी सामने आई थी। ऐसी स्थिति में बचाव अभियान में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि भारी मलबे के नीचे फंसे लोगों को चोटों के साथ-साथ सांस लेने, पानी और अन्य जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
बचाव दलों ने मलबे को हटाने का काम बेहद सावधानी से शुरू किया। किसी भी बड़े कंक्रीट स्लैब को अचानक हटाने से उसके नीचे फंसे लोगों को अतिरिक्त नुकसान हो सकता है। इसलिए ऐसे हादसों में राहत दल पहले संभावित जीवित लोगों की आवाज, मोबाइल सिग्नल, कैमरा और विशेष खोज उपकरणों के जरिए लोकेशन का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। इसके बाद मलबे को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाता है। NDRF की मानक शहरी खोज एवं बचाव प्रक्रिया में भी घटनास्थल को सुरक्षित करने, तकनीकी खोज और प्रशिक्षित टीमों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।
सत्य निकेतन में भी NDRF और अन्य एजेंसियों की टीमें बचाव अभियान में जुटी हैं। रिपोर्टों के अनुसार खोज अभियान में प्रशिक्षित कर्मियों और तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ घायलों को मलबे से बाहर निकालकर AIIMS Trauma Centre भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। शुरुआती अपडेट में कई घायलों की हालत गंभीर बताई गई थी।
यह इलाका दिल्ली के उन हिस्सों में शामिल है जहां छात्रों के लिए बड़ी संख्या में निजी PG और हॉस्टल चलते हैं। आसपास कई खाने-पीने की दुकानें, छोटे व्यवसाय और किराए के कमरे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के नजदीक होने की वजह से यहां दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों की संख्या भी काफी रहती है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कई मकानों को समय के साथ PG में बदल दिया गया है और एक ही इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रहने लगते हैं।
यही वजह है कि इस हादसे ने दिल्ली में छात्र PG की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर किसी सामान्य आवासीय इमारत में अचानक बड़ी संख्या में छात्रों को ठहराया जाता है तो उस इमारत पर अतिरिक्त भार, पानी की व्यवस्था, बिजली, निकासी मार्ग, फायर सेफ्टी और संरचनात्मक सुरक्षा जैसे कई पहलुओं का महत्व बढ़ जाता है। खासतौर पर पुरानी इमारतों में यदि अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई हों या बेसमेंट में संरचनात्मक बदलाव किए गए हों, तो उनकी इंजीनियरिंग जांच जरूरी हो सकती है।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इलाके की कई पुरानी इमारतों में नियमित रखरखाव नहीं होता। कुछ लोगों ने दावा किया कि कई मकानों में बेसमेंट बनाए गए हैं और पांच-छह मंजिल तक निर्माण किया गया है। अब यह जांच का विषय है कि हादसे वाली इमारत में निर्माण किस अनुमति के तहत हुआ था, बेसमेंट में किस तरह का काम चल रहा था और क्या उसके लिए संबंधित विभाग से अनुमति ली गई थी।
बेसमेंट में खुदाई या निर्माण का काम किसी पुरानी इमारत के लिए संवेदनशील हो सकता है। किसी भवन की नींव के आसपास मिट्टी हटाने, पानी जमा होने या संरचनात्मक हिस्सों में बदलाव से जमीन और नींव पर असर पड़ सकता है। हालांकि हर बेसमेंट निर्माण खतरनाक नहीं होता और किसी एक हादसे को देखकर सामान्य निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। सत्य निकेतन मामले में भी इंजीनियरिंग जांच से ही पता चलेगा कि क्या बेसमेंट के काम का भवन के ढहने से सीधा संबंध था।
घटना के समय बारिश और मौसम की स्थिति को लेकर भी स्थानीय लोगों ने चिंता जताई। मानसून के दौरान पुरानी इमारतों में सीलन, जलभराव और मिट्टी की नमी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। लेकिन इस मामले में बारिश को दुर्घटना का कारण मानने के लिए अभी पर्याप्त आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिलहाल बेसमेंट में चल रहे काम, भवन की संरचनात्मक स्थिति और नींव से जुड़े सवाल जांच का मुख्य हिस्सा बन सकते हैं।
हादसे के बाद आसपास की दूसरी इमारतों को लेकर भी चिंता बढ़ गई। कुछ स्थानीय लोगों ने दावा किया कि पास की एक इमारत हल्की झुकी हुई दिखाई दे रही थी। अगर किसी एक भवन के गिरने से आसपास के ढांचे की स्थिरता प्रभावित होती है तो बचाव अभियान और मुश्किल हो जाता है, क्योंकि मलबा हटाने वाली भारी मशीनों को बेहद सावधानी से इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में पहले आसपास के भवनों की सुरक्षा का आकलन किया जाता है।
घटनास्थल पर लोगों की भीड़ भी बड़ी चुनौती बन सकती है। हादसे के तुरंत बाद स्थानीय निवासी अपने परिचितों और PG में रहने वाले छात्रों की तलाश में पहुंच गए। कुछ लोगों ने खुद मलबा हटाने में मदद की। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे हादसों में बिना सुरक्षा उपकरण मलबे के ऊपर जाना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि ऊपर का ढांचा अस्थिर हो सकता है और अचानक दूसरा हिस्सा गिर सकता है। इसलिए बचाव कार्य को प्रशिक्षित टीमों के निर्देश में करना जरूरी होता है।
इस घटना ने दिल्ली में पुरानी इमारतों की संरचनात्मक जांच को लेकर भी बहस तेज कर दी है। राजधानी में कई ऐसे इलाके हैं जहां पुराने मकानों को समय के साथ अलग-अलग उपयोग में लाया गया है। एक मकान पहले परिवार के रहने के लिए बना हो सकता है, लेकिन बाद में उसमें कई कमरों का PG या हॉस्टल चलने लगे। इस बदलाव के दौरान इमारत की क्षमता, फायर सेफ्टी और निकासी व्यवस्था का पर्याप्त मूल्यांकन हुआ या नहीं, यह महत्वपूर्ण सवाल है।
सत्य निकेतन जैसे छात्र इलाकों में यह मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है। एक इमारत में कई छात्रों के रहने के कारण किसी भी आपदा की स्थिति में संभावित प्रभावित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। अगर सीढ़ियां संकरी हों, आपातकालीन निकास उपलब्ध न हो या आसपास की गलियां बहुत संकरी हों, तो बचाव कार्य में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसलिए केवल इमारत की उम्र नहीं, बल्कि उसके वर्तमान उपयोग और उसमें किए गए बदलाव भी सुरक्षा जांच का हिस्सा होने चाहिए।
इस हादसे के बाद प्रशासन के सामने दो तत्काल प्राथमिकताएं हैं। पहली, मलबे के नीचे फंसे लोगों को जल्द से जल्द सुरक्षित निकालना और घायलों को अस्पताल पहुंचाना। दूसरी, यह पता लगाना कि इमारत कैसे गिरी और क्या इसके पीछे किसी तरह की लापरवाही या नियमों का उल्लंघन था। अगर जांच में किसी व्यक्ति, बिल्डर, मकान मालिक या निर्माण एजेंसी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल मौतों की संख्या कम से कम दो बताई जा रही है और बचाव अभियान जारी है। अलग-अलग समय पर जारी रिपोर्टों में मृतकों, घायलों और फंसे लोगों की संख्या बदलती रही है क्योंकि मलबे से लोगों को निकालने का काम लगातार चल रहा है। इसलिए शुरुआती आंकड़ों को अंतिम मानना उचित नहीं होगा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अगर स्थानीय लोगों का 50 से ज्यादा लोगों के अंदर मौजूद होने का दावा सही साबित होता है, तो हादसे का पैमाना काफी बड़ा हो सकता है। वहीं कुछ रिपोर्टों में 30 से 50 लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका बताई गई है। प्रशासन द्वारा PG के रजिस्टर और वहां रहने वाले लोगों की जानकारी जुटाकर वास्तविक संख्या निर्धारित करने की कोशिश की जा रही है।
फिलहाल राहत और बचाव टीमों की कोशिश यही है कि मलबे के अंदर मौजूद हर संभावित व्यक्ति तक पहुंचा जाए। ऐसी घटनाओं में किसी व्यक्ति की आवाज, मोबाइल कॉल या छोटी सी हलचल भी बचाव दल के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन सकती है। इसी कारण भारी मशीनरी चलाने से पहले तकनीकी और मानवीय खोज की जाती है और मलबे को धीरे-धीरे हटाया जाता है।
दिल्ली की यह घटना सिर्फ एक पुरानी बिल्डिंग गिरने की खबर नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि राजधानी में छात्र PG और पुरानी इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा कितनी नियमित रूप से जांची जाती है। खासकर उन इलाकों में जहां एक ही इमारत में दर्जनों युवा रहते हैं, वहां भवन की मजबूती, बेसमेंट निर्माण, बिजली, फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकासी और अधिकृत उपयोग की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
जब तक आधिकारिक जांच पूरी नहीं होती, हादसे की वजह को लेकर किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। बेसमेंट में चल रहा काम, पानी का जमा होना, नींव की स्थिति, इमारत की उम्र और संभावित संरचनात्मक बदलाव जैसे सभी पहलुओं की जांच की जरूरत है। स्थानीय लोगों के दावों को जांच के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं।
सत्य निकेतन हादसे में फिलहाल सबसे बड़ा फोकस बचाव अभियान पर है। दो लोगों की मौत की पुष्टि के बाद भी कई परिवार और छात्र अपने साथियों तथा रिश्तेदारों की जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। प्रशासन के सामने चुनौती है कि मलबे को सुरक्षित तरीके से हटाते हुए अधिक से अधिक लोगों को जीवित बाहर निकाला जाए। इसके साथ ही आसपास की इमारतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है, ताकि बचावकर्मी और स्थानीय लोग किसी दूसरे हादसे का शिकार न हों।
जैसे-जैसे बचाव अभियान आगे बढ़ेगा, मृतकों और घायलों की संख्या तथा मलबे में फंसे लोगों को लेकर तस्वीर और स्पष्ट होगी। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना तय है कि दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला पुरानी PG इमारत के अचानक गिरने से बड़ा हादसा हुआ है, जिसमें कम से कम दो लोगों की जान गई है और कई लोग प्रभावित हुए हैं। बेसमेंट में चल रहे काम को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और इस पूरी घटना की वास्तविक वजह प्रशासनिक और तकनीकी जांच के बाद ही सामने आएगी।
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