भारत, मध्य-पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाले महत्वाकांक्षी इंडिया–मिडिल ईस्ट–यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को अब एक नया आयाम मिलने जा रहा है। इस परियोजना में मिस्र को जोड़ने पर सहमति बनने से यह कॉरिडोर अफ्रीका तक विस्तारित हो सकता है। इससे न केवल व्यापार मार्ग मजबूत होगा, बल्कि भारत के लिए अफ्रीकी बाजारों तक पहुंच आसान हो जाएगी।
यह परियोजना पहली बार 2023 में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आई थी। इसका उद्देश्य भारत से यूरोप तक माल ढुलाई के लिए एक वैकल्पिक और तेज मार्ग तैयार करना है, जिससे पारंपरिक समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम हो सके।
क्या है इंडिया–मिडिल ईस्ट–यूरोप कॉरिडोर?
G20 शिखर सम्मेलन में घोषित इस कॉरिडोर का लक्ष्य भारत को मध्य-पूर्व के जरिए यूरोप से जोड़ना है। इसमें समुद्री और रेल मार्ग दोनों शामिल होंगे। भारत से माल पहले समुद्री मार्ग से यूएई या सऊदी अरब पहुंचेगा, वहां से रेल नेटवर्क के जरिए जॉर्डन और इजराइल होते हुए यूरोप तक भेजा जाएगा।
अब मिस्र के जुड़ने से यह नेटवर्क अफ्रीकी महाद्वीप तक फैल सकता है। मिस्र का पोर्ट सईद और स्वेज नहर क्षेत्र इस परियोजना के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं।
कितना समय और लागत बचेगी?
विश्लेषकों के अनुसार, इस कॉरिडोर से भारत से यूरोप तक सामान पहुंचाने में लगभग 40% समय की बचत हो सकती है। लागत में भी करीब 30% तक कमी आने की संभावना जताई जा रही है। इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा फायदा मिलेगा।
अभी अधिकांश व्यापार स्वेज नहर से होकर गुजरता है। हालांकि यह मार्ग महत्वपूर्ण है, लेकिन वैश्विक संकट या भू-राजनीतिक तनाव के समय इसमें बाधाएं आती रही हैं। नया कॉरिडोर वैकल्पिक और सुरक्षित मार्ग प्रदान करेगा।
मिस्र क्यों है अहम?
Egypt भौगोलिक रूप से अफ्रीका, एशिया और यूरोप के बीच स्थित है। स्वेज नहर विश्व व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि IMEC में मिस्र शामिल होता है, तो यह अफ्रीकी देशों के लिए प्रवेश द्वार बन सकता है।
अफ्रीका में केन्या, इथियोपिया, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश तेजी से उभरते बाजार हैं। भारत के लिए इन देशों तक आसान कनेक्टिविटी का मतलब है नए व्यापार अवसर।
भारत के लिए क्या फायदे?
भारत लंबे समय से अपने निर्यात नेटवर्क को विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम एशिया और यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ अफ्रीकी बाजार में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करना उसकी रणनीति का हिस्सा है।
इस कॉरिडोर के जरिए भारत कृषि उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे सामान तेजी से यूरोप और अफ्रीका तक भेज सकेगा। साथ ही अफ्रीका से रेयर अर्थ मेटल और कच्चे माल का आयात भी आसान हो सकता है।
भू-राजनीतिक महत्व
IMEC को चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। यह परियोजना भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को दर्शाती है।
Saudi Arabia और United Arab Emirates जैसे देशों की भागीदारी इसे और मजबूत बनाती है। पश्चिम एशिया में स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
हालांकि परियोजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। राजनीतिक स्थिरता, सुरक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे का विकास महत्वपूर्ण कारक होंगे। इसके अलावा, विभिन्न देशों के बीच समन्वय और निवेश सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहभागी देश कितनी तेजी से रेल और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करते हैं।
यदि यह कॉरिडोर सफल होता है, तो यह वैश्विक व्यापार मानचित्र को बदल सकता है। भारत के लिए यह न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगा।
अफ्रीका के साथ बढ़ता सहयोग भारत की ‘ग्लोबल साउथ’ नीति को भी मजबूती देगा। आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर भारत को यूरोप और अफ्रीका के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक कड़ी बना सकता है।
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