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Iran-US News: ईरान बोला- अमेरिका से सीधी बातचीत नहीं होगी, दोहा में फंसे फंड पर होगी चर्चा

मध्य पूर्व की कूटनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसका प्रतिनिधिमंडल कतर की राजधानी दोहा जाएगा, लेकिन इस यात्रा का उद्देश्य अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष वार्ता करना नहीं है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह दौरा मुख्य रूप से ईरान के विदेशों में फंसे वित्तीय संसाधनों (Frozen Funds) से जुड़े मामलों पर केंद्रित रहेगा। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि अमेरिका के साथ कोई संदेश साझा करना होगा, तो वह कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों के माध्यम से किया जाएगा।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने प्रेस वार्ता में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष वार्ता की कोई योजना नहीं है। उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच मौजूद राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेदों के कारण फिलहाल सीधी बातचीत संभव नहीं है।

ईरान का दावा है कि विभिन्न देशों में उसके अरबों डॉलर के वित्तीय संसाधन प्रतिबंधों और अन्य कारणों से लंबे समय से अटके हुए हैं। तेहरान लगातार इन फंड्स तक पहुंच बहाल करने की मांग करता रहा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि इन पैसों का उपयोग मानवीय जरूरतों, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के लिए किया जाना चाहिए।

दोहा लंबे समय से क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बातचीत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। कतर ने अतीत में भी कई देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। यही कारण है कि ईरान का प्रतिनिधिमंडल वहां पहुंचकर विभिन्न पक्षों के साथ अलग-अलग स्तर पर चर्चा कर सकता है।

इस बीच ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई संदेश भेजने की जरूरत हुई, तो वह सीधे संपर्क के बजाय मध्यस्थ देशों के जरिए भेजा जा सकता है। मीडिया रिपोर्टों में कतर और पाकिस्तान की संभावित भूमिका का उल्लेख किया गया है।

हालांकि ईरान ने दोहराया कि इस यात्रा को अमेरिका के साथ औपचारिक वार्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अधिकारियों ने कहा कि यह दौरा सीमित उद्देश्यों और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कई वर्षों से अमेरिका और ईरान के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियां दोनों देशों के संबंधों को लगातार प्रभावित करती रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे समय में मध्यस्थ देशों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। कई बार जब प्रत्यक्ष बातचीत संभव नहीं होती, तब तीसरे देशों के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है ताकि संवाद पूरी तरह समाप्त न हो।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि ईरान अपने फंसे हुए कुछ वित्तीय संसाधनों तक पहुंच बनाने में सफल होता है, तो इससे उसकी अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय नियमों, प्रतिबंधों और संबंधित देशों की नीतियों पर निर्भर करेगी।

कतर ने पिछले कुछ वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय विवादों और वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। इसी कारण दोहा को क्षेत्रीय कूटनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

पाकिस्तान का नाम भी संभावित मध्यस्थ देशों में सामने आने के बाद दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की कूटनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों की दिलचस्पी बढ़ गई है। हालांकि इस भूमिका को लेकर संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जानकारी का इंतजार है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इस तरह की अप्रत्यक्ष बातचीत कई बार भविष्य में प्रत्यक्ष वार्ता का आधार भी बन सकती है। वहीं कई बार यह केवल सीमित मुद्दों तक ही सीमित रहती है।

फिलहाल अमेरिका की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। यदि दोनों देशों या मध्यस्थ देशों की ओर से कोई नया बयान जारी होता है, तो क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में कई भू-राजनीतिक चुनौतियां एक साथ मौजूद हैं। ऐसे में किसी भी कूटनीतिक पहल या आर्थिक समझौते का असर व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल ईरान का रुख स्पष्ट है कि दोहा की यात्रा का उद्देश्य फंसे हुए वित्तीय संसाधनों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना है, जबकि अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष बातचीत की संभावना से उसने इनकार किया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर होने वाले आधिकारिक बयानों और कूटनीतिक गतिविधियों पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।


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