जब अधिकतर लोग कांच की खाली बोतल को बेकार समझकर फेंक देते हैं, तब माधुरी बालोदी ने उसी बोतल को अपनी सोच, कविता और सामाजिक बदलाव का माध्यम बना लिया। कविता और आर्ट के ज़रिये शुरू हुआ उनका यह सफर आज न सिर्फ एक सफल कारोबार बन चुका है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक चेतना का भी मजबूत संदेश दे रहा है।
माधुरी बालोदी द्वारा शुरू किया गया ‘कवि – द पोएट्री आर्ट प्रोजेक्ट (Kavi – The Poetry Art Project)’ यह दिखाता है कि कबाड़ भी अगर सोच के साथ जुड़ जाए, तो वह कचरा नहीं, अवसर बन सकता है।
कविता से कारोबार तक का सफर
माधुरी बालोदी का मानना है कि कविता सिर्फ किताबों या मंचों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। 2012 में उन्होंने अपने साथी कलाकारों के साथ मिलकर एक ऐसा प्रयोग शुरू किया, जिसमें कविता, कला और रोजमर्रा की वस्तुएं एक साथ जुड़ सकें। शुरुआत में उन्होंने कांच की खाली बोतलों पर कविताएं लिखनी शुरू कीं।
यह प्रयोग धीरे-धीरे लोगों का ध्यान खींचने लगा। कबाड़ में पड़ी बोतलें अब भावनाओं, संदेशों और रचनात्मकता का कैनवास बन चुकी थीं। यहीं से जन्म हुआ ‘कवि – द पोएट्री आर्ट प्रोजेक्ट’ का।
कबाड़ नहीं, विचार है हर बोतल
माधुरी कहती हैं कि हर बोतल सिर्फ कांच का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक कहानी है। अगर उसे तोड़कर फेंक दिया जाए, तो वह सिर्फ प्रदूषण बढ़ाती है। लेकिन अगर उसी बोतल को नया रूप दिया जाए, तो वह न सिर्फ उपयोगी बनती है, बल्कि लोगों को सोचने पर भी मजबूर करती है।
इसी सोच के साथ उनकी टीम कांच की कबाड़ बोतलों को इकट्ठा करती है, उन्हें साफ करती है और फिर उन पर कविताएं, संदेश और आर्ट डिजाइन उकेरती है। ये बोतलें बाद में डेकोर आइटम, बोतल लैंप, गिफ्ट आइटम, ग्लासवेयर और कस्टम आर्ट पीस के रूप में बिकती हैं।
सामाजिक बदलाव का संदेश
यह प्रोजेक्ट सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं है। माधुरी का उद्देश्य साफ है—
हर बोतल का दोबारा इस्तेमाल हो, ताकि कचरा कम हो और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़े।
उनका मानना है कि भारत जैसे देश में जहां रोज़ लाखों टन कचरा पैदा होता है, वहां रीसाइक्लिंग सिर्फ ज़रूरत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। ‘कवि’ इसी जिम्मेदारी को रचनात्मक रूप में निभा रहा है।
स्टार्टअप का सफर: संघर्ष से सफलता तक
इस स्टार्टअप का औपचारिक पंजीकरण 2018 में हुआ। शुरुआत बेहद छोटी थी—
लगभग 5,000 रुपये की पूंजी से।
माधुरी और उनकी टीम ने बिना किसी बड़ी फंडिंग के, अपने काम और क्रिएटिविटी पर भरोसा रखा। धीरे-धीरे सोशल मीडिया और वर्ड ऑफ माउथ के जरिए उनके प्रोडक्ट्स की पहचान बनने लगी।
आज ‘कवि’ का टर्नओवर 5 हजार से बढ़कर 40 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह सफर आसान नहीं था। कई साल तक टीम ने बिना सैलरी काम किया, लेकिन अपने विजन से समझौता नहीं किया।
200 से ज्यादा कबाड़ीवालों का नेटवर्क
इस प्रोजेक्ट की एक बड़ी खासियत यह है कि यह स्थानीय लोगों को भी रोजगार देता है। ‘कवि’ ने देश के अलग-अलग हिस्सों में 200 से अधिक कबाड़ीवालों का नेटवर्क तैयार किया है।
ये लोग कांच की खाली बोतलें इकट्ठा करते हैं, जिससे उन्हें नियमित आमदनी मिलती है और कचरा भी कम होता है। इस तरह यह स्टार्टअप पर्यावरण के साथ-साथ आजीविका का साधन भी बन रहा है।
ग्लोबल मार्केट पर नजर
अब ‘कवि’ सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहना चाहता। कंपनी का फोकस धीरे-धीरे ग्लोबल मार्केट की ओर बढ़ रहा है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में पहले ही इनके उत्पादों की अच्छी मांग है।
अब यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इन रीसाइक्ल्ड आर्ट प्रोडक्ट्स को ले जाने की योजना है। कंपनी मानती है कि सस्टेनेबल और हैंडमेड प्रोडक्ट्स की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है।
मार्केटिंग और प्रोडक्ट रणनीति
‘कवि’ का मार्केटिंग मॉडल पारंपरिक विज्ञापन पर नहीं, बल्कि कहानी और भावना पर आधारित है। हर प्रोडक्ट के साथ उसकी कहानी जुड़ी होती है—कहां से बोतल आई, कैसे बदली गई और उसका संदेश क्या है।
प्रोडक्ट लाइन में शामिल हैं:
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रीसाइक्ल्ड बोतल लैंप
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डिज़ाइनर ड्रिंकिंग ग्लास
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सस्टेनेबल कटलरी
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कस्टमाइज्ड गिफ्ट आइटम (कॉरपोरेट और पर्सनल दोनों के लिए)
टीम, ट्रेनिंग और टैलेंट
आज ‘कवि’ के साथ 7–8 साल से जुड़े कारीगर और कलाकार काम कर रहे हैं। इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि हर बोतल न सिर्फ सुंदर दिखे, बल्कि टिकाऊ भी हो।
माधुरी खुद हर नए डिजाइन में शामिल रहती हैं। उनका मानना है कि जब तक संस्थापक खुद क्रिएटिव प्रक्रिया से जुड़ा रहता है, तब तक ब्रांड की आत्मा ज़िंदा रहती है।
शार्क टैंक इंडिया से मिली पहचान
‘कवि – द पोएट्री आर्ट प्रोजेक्ट’ को शार्क टैंक इंडिया में भी मौका मिला। वहां इसे सिर्फ एक स्टार्टअप नहीं, बल्कि एक सामाजिक पहल के रूप में सराहा गया।
हालांकि निवेश तुरंत नहीं मिला, लेकिन इस प्लेटफॉर्म से ब्रांड को देशभर में पहचान जरूर मिली। इससे कॉरपोरेट सहयोग और नए अवसरों के दरवाजे खुले।
नई पीढ़ी के लिए संदेश
माधुरी बालोदी मानती हैं कि अगर किसी के पास आइडिया है, तो उसे सिर्फ प्रॉफिट के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। अगर आइडिया समाज और पर्यावरण से जुड़ा हो, तो उसका असर कहीं ज्यादा बड़ा होता है।
उनका संदेश साफ है—
“स्टार्टअप सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं होता। अगर आप बदलाव लाना चाहते हैं, तो संघर्ष से डरना नहीं चाहिए।”
कचरे से क्रिएशन की मिसाल
आज जब दुनिया सस्टेनेबिलिटी की बात कर रही है, ‘कवि’ जैसे स्टार्टअप यह साबित करते हैं कि भारत में भी कबाड़ से कमाल किया जा सकता है। कांच की बोतल, जो कभी बेकार समझी जाती थी, अब कविता, कला और कारोबार का प्रतीक बन चुकी है।
माधुरी बालोदी की यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस स्टोरी नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि सोच बदले तो कचरा भी अवसर बन सकता है।