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महाराष्ट्र सरकार ने माना: प्रदूषण से कैंसर बढ़ा, 57% मरीजों के फेफड़े प्रभावित

महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में बढ़ते प्रदूषण और उससे जुड़ी बीमारियों को लेकर बड़ा स्वीकार किया है। विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य के कई शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का स्तर स्वास्थ्य मानकों से ऊपर दर्ज किया गया है और कैंसर के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि कैंसर के कुल मरीजों में लगभग 57 प्रतिशत मामलों में फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्याएं सामने आई हैं। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा साझा की गई रिपोर्ट में कहा गया कि महानगरों में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से अधिक पाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों पर गहरा असर पड़ता है, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछले कुछ वर्षों में श्वसन रोगों के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

राज्य सरकार के अनुसार, प्रदूषण के प्रमुख कारणों में वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरा जलाने की घटनाएं शामिल हैं। मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में निर्माण परियोजनाओं की वजह से धूलकणों का स्तर बढ़ा है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन नियंत्रण मानकों का पूरी तरह पालन नहीं होने की शिकायतें भी सामने आई हैं। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों ने यह स्पष्ट किया कि समस्या केवल मौसमी नहीं बल्कि संरचनात्मक बन चुकी है।

कैंसर रजिस्ट्रियों के आंकड़ों के आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि तंबाकू सेवन को भी एक बड़ा कारण माना जाता है, लेकिन प्रदूषण को अब एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में देखा जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि जो लोग धूम्रपान नहीं करते, उनमें भी फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियां देखी जा रही हैं, जिसका एक कारण लंबे समय तक खराब वायु गुणवत्ता में रहना हो सकता है।

सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि प्रदूषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध को लेकर व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है। पर्यावरण विभाग और स्वास्थ्य विभाग मिलकर एक संयुक्त कार्ययोजना तैयार कर रहे हैं, जिसमें वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के उपाय शामिल होंगे। राज्य सरकार ने यह संकेत भी दिया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अधिक सख्ती से नियम लागू करने के निर्देश दिए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों को कम करने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है। केवल सरकारी नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि नागरिकों की भागीदारी भी आवश्यक है। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देना और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण उपाय लागू करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। इसके अलावा, अस्पतालों में कैंसर स्क्रीनिंग सुविधाओं का विस्तार भी समय की मांग है।

मुंबई में हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई बार ‘खराब’ और ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार खराब हवा में रहना लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव अधिक देखा गया है। स्कूलों में भी वायु गुणवत्ता को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

राज्य सरकार ने विधानसभा में यह भी कहा कि प्रदूषण और कैंसर के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए और शोध की आवश्यकता है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। स्वास्थ्य बजट में वृद्धि और कैंसर उपचार केंद्रों की संख्या बढ़ाने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को विस्तार देने की बात कही गई है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल आंकड़े स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस कार्रवाई की जरूरत है। उन्होंने औद्योगिक इकाइयों की नियमित जांच और नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही, शहरों में हरित पट्टियों और वृक्षारोपण कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए शहरी नियोजन में पर्यावरणीय दृष्टिकोण को शामिल करना अनिवार्य है।

कुल मिलाकर महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रदूषण और कैंसर के बढ़ते मामलों को स्वीकार करना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह स्वीकारोक्ति नीति निर्माण और जनजागरूकता दोनों के लिए आधार तैयार कर सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार द्वारा घोषित कार्ययोजना किस हद तक लागू होती है और क्या इससे प्रदूषण के स्तर में वास्तविक कमी आती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

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