पारे से सोना बनाने का दावा: क्या लैब में गोल्ड होगा सस्ता?

अमेरिका की स्टार्टअप कंपनी Marathon Fusion ने दावा किया है कि उसने परमाणु संलयन यानी न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक की मदद से पारे को सोने में बदलने का तरीका प्रदर्शित किया है। कंपनी के मुताबिक, उसकी तकनीक से सोना बनाने की दर CERN के पहले दर्ज किए गए प्रयोग की तुलना में 10 गुना ज्यादा है। इस दावे ने वैज्ञानिकों, निवेशकों और सोने के बाजार में नई चर्चा शुरू कर दी है।

लेकिन इस खबर का सबसे जरूरी पहलू यह है कि कंपनी के दावे की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। कंपनी ने सार्वजनिक तौर पर यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि प्रयोग में कुल कितना सोना बना, उसे अलग करने में कितना खर्च आया और व्यावसायिक स्तर पर इसे बनाना कितना संभव है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि लैब में बनने वाला सोना जल्द ही बाजार में सस्ता मिलना शुरू हो जाएगा।

अमेरिकी स्टार्टअप Marathon Fusion ने क्या दावा किया?

सैन फ्रांसिस्को स्थित Marathon Fusion एक फ्यूजन एनर्जी स्टार्टअप है। कंपनी का मुख्य उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिससे परमाणु संलयन की मदद से ऊर्जा बनाई जा सके। अब कंपनी ने अपनी तकनीक से जुड़े एक दूसरे संभावित उपयोग की जानकारी दी है—पारे से सोना बनाना।

कंपनी ने 21 अक्टूबर 2026 को अपने दावे की जानकारी सार्वजनिक की। उसके मुताबिक, उसने फ्यूजन प्रक्रिया से निकलने वाले तेज न्यूट्रॉन का उपयोग करके पारे के एक विशेष समस्थानिक को सोने में बदलने की प्रक्रिया प्रदर्शित की। कंपनी का दावा है कि उसकी सोना बनाने की दर CERN के प्रयोग में दर्ज आंकड़े से लगभग 10 गुना ज्यादा रही।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। कंपनी का कहना है कि उसने यह उपलब्धि हासिल की है, लेकिन सार्वजनिक जानकारी के आधार पर इसकी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि अभी बाकी है। साथ ही, CERN के प्रयोग और Marathon Fusion की प्रस्तावित प्रक्रिया एक जैसी नहीं हैं। दोनों के परिणामों की तुलना करते समय उत्पादन की दर, प्रयोग की अवधि, तैयार पदार्थ की मात्रा और उसकी स्थिरता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।

इसलिए इस खबर को फिलहाल एक संभावित वैज्ञानिक प्रगति और कंपनी के दावे के रूप में देखना चाहिए, न कि इस प्रमाण के रूप में कि बड़े पैमाने पर सस्ता सोना बनाना शुरू हो गया है।

पारे से सोना कैसे बनाया जा सकता है?

आम तौर पर हम जानते हैं कि पारा और सोना दो अलग-अलग रासायनिक तत्व हैं। पारा एक चमकीली, चांदी जैसी दिखने वाली धातु है, जो सामान्य तापमान पर तरल रहती है। दूसरी ओर, सोना एक पीली धातु है, जिसका इस्तेमाल आभूषण, निवेश और इलेक्ट्रॉनिक्स सहित कई क्षेत्रों में किया जाता है।

सामान्य रासायनिक प्रक्रियाओं से पारे को सोने में बदलना संभव नहीं है। इसकी वजह यह है कि किसी तत्व की पहचान उसके परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या से तय होती है। सोने के परमाणु में 79 प्रोटॉन होते हैं, जबकि पारे के परमाणु में 80 प्रोटॉन होते हैं।

किसी तत्व को दूसरे तत्व में बदलने के लिए उसके परमाणु के नाभिक में बदलाव करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण कहा जाता है।

Marathon Fusion की प्रस्तावित प्रक्रिया में पारे के समस्थानिक Mercury-198 को तेज न्यूट्रॉन के संपर्क में लाया जाता है। कंपनी के बताए गए रास्ते के अनुसार, इससे Mercury-197 बनता है। यह रेडियोधर्मी समस्थानिक बाद में रेडियोधर्मी क्षय की प्रक्रिया से Gold-197 में बदल सकता है। Gold-197 सोने का स्थिर समस्थानिक है।

यह प्रक्रिया साधारण रसायन विज्ञान से अलग है। इसमें किसी धातु को गर्म करके, पिघलाकर या उसमें कोई रसायन मिलाकर सोना नहीं बनाया जाता। परमाणु के नाभिक में परिवर्तन के कारण एक तत्व दूसरे तत्व में बदलता है।

हालांकि, वैज्ञानिक रूप से किसी तत्व को दूसरे तत्व में बदलना संभव होने का अर्थ यह नहीं है कि उस प्रक्रिया से बड़ी मात्रा में धातु कम लागत पर तैयार की जा सकती है। असली चुनौती उत्पादन की मात्रा, ऊर्जा की जरूरत, रेडियोधर्मी पदार्थों से सुरक्षा और अंतिम उत्पाद की शुद्धता है।

न्यूक्लियर फ्यूजन क्या होता है?

न्यूक्लियर फ्यूजन वह प्रक्रिया है, जिसमें हल्के परमाणुओं के नाभिक मिलकर भारी नाभिक बनाते हैं और इस दौरान ऊर्जा निकलती है। सूर्य और दूसरे तारों में ऊर्जा बनने का प्रमुख कारण भी फ्यूजन है।

वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे पृथ्वी पर नियंत्रित फ्यूजन के जरिए बिजली बनाई जा सके। यदि इसे व्यावसायिक रूप से सफल बनाया जाता है, तो इससे भविष्य में ऊर्जा उत्पादन के नए विकल्प मिल सकते हैं।

Marathon Fusion भी फ्यूजन ऊर्जा से जुड़ी तकनीक पर काम करती है। कंपनी का विचार है कि फ्यूजन प्रक्रिया से निकलने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि कुछ उपयोगी परमाणु रूपांतरणों के लिए भी किया जा सकता है।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि फ्यूजन रिएक्टर में न्यूट्रॉन उत्पन्न करना, उनसे नियंत्रित तरीके से पारे का रूपांतरण कराना और फिर तैयार सोने को सुरक्षित रूप से अलग करना अलग-अलग तकनीकी चुनौतियां हैं।

किसी प्रस्तावित प्रक्रिया का कंप्यूटर सिमुलेशन सफल होना और वास्तविक औद्योगिक संयंत्र में उसका लगातार सफलतापूर्वक काम करना दो अलग बातें हैं। इसी तरह, किसी प्रयोग में कुछ सोने के परमाणु बनना और बाजार में बेचने लायक मात्रा तैयार करना भी अलग उपलब्धियां हैं।

पहले भी लैब में सोना बनाने के प्रयोग हुए हैं

पारे से सोना बनाने का विचार नया नहीं है। सदियों से वैज्ञानिकों और रसायनविदों ने एक तत्व को दूसरे तत्व में बदलने की संभावना पर काम किया है। पुराने समय में इसे कीमियागिरी कहा जाता था। आधुनिक विज्ञान ने परमाणु संरचना को समझने के बाद यह स्पष्ट कर दिया कि सही परमाणु प्रतिक्रिया के जरिए एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जा सकता है।

लेकिन इस प्रक्रिया को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाना बहुत मुश्किल रहा है। पहले भी प्रयोगशालाओं में सोने के परमाणु या बेहद छोटी मात्रा में सोना तैयार किया जा चुका है।

1. 1941 में पारे से सोना बनाने की रिपोर्ट

1941 में वैज्ञानिकों ने पारे को सोने में बदलने से जुड़ी परमाणु प्रक्रियाओं पर प्रयोग किए थे। परमाणु विज्ञान के शुरुआती दौर में यह समझने की कोशिश की जा रही थी कि अलग-अलग परमाणु नाभिकों पर कणों की बमबारी करने से किस तरह नए तत्व बन सकते हैं।

ऐसे प्रयोगों ने यह दिखाने में मदद की कि तत्वों का रूपांतरण केवल कल्पना नहीं, बल्कि परमाणु प्रतिक्रियाओं के जरिए संभव है। हालांकि, उस समय की तकनीक और प्रयोगों की सीमाओं के कारण इससे व्यावसायिक स्तर पर सोना बनाने का रास्ता नहीं खुला।

इस तरह के प्रयोगों से वैज्ञानिक ज्ञान तो बढ़ा, लेकिन बाजार में सस्ता सोना उपलब्ध कराने की समस्या हल नहीं हुई।

2. CERN और पार्टिकल एक्सीलरेटर के प्रयोग

दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण CERN का है, जो यूरोप की प्रमुख कण भौतिकी अनुसंधान संस्था है। CERN के वैज्ञानिकों ने Large Hadron Collider यानी LHC में सीसे के परमाणु नाभिकों की टक्कर से सोने के नाभिक बनने की प्रक्रिया का अध्ययन किया।

CERN ने 2025 में प्रकाशित जानकारी में बताया कि 2015 से 2018 के दौरान किए गए प्रयोगों में लगभग 29 पिकोग्राम सोने के बराबर मात्रा में सोने के नाभिक बने थे। एक पिकोग्राम एक ग्राम का एक खरबवां हिस्सा होता है। यानी 29 पिकोग्राम भी बेहद छोटी मात्रा है।

इन प्रयोगों में बने सोने के नाभिक बहुत कम समय तक मौजूद रहे और फिर आगे की टक्करों में नष्ट हो गए। इसलिए यह सोना आभूषण बनाने या बाजार में बेचने के लिए उपयोगी नहीं था।

CERN का उद्देश्य सोना बनाकर कमाई करना नहीं था। वैज्ञानिक इन प्रयोगों के जरिए परमाणु नाभिकों की प्रतिक्रियाओं और उच्च ऊर्जा वाले कणों के व्यवहार को समझना चाहते थे।

Marathon Fusion का दावा इसी वजह से चर्चा में आया है कि वह फ्यूजन रिएक्टर के साथ जुड़ी प्रक्रिया से सोना बनाने की संभावना पर काम कर रही है। लेकिन दोनों तकनीकों में अंतर होने के कारण केवल उत्पादन दर के दावे से यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन-सी तकनीक व्यावसायिक रूप से बेहतर होगी।

क्या लैब में बनने वाला सोना हीरे की तरह सस्ता होगा?

इस खबर के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भविष्य में सोना भी लैब में बनने वाले हीरों की तरह सस्ता हो जाएगा।

लैब में तैयार हीरों ने ज्वेलरी उद्योग में बड़ा बदलाव किया है। इन हीरों को नियंत्रित परिस्थितियों में विकसित किया जा सकता है। इनके रासायनिक और भौतिक गुण प्राकृतिक हीरों के समान होते हैं, हालांकि उनकी उत्पत्ति पहचानने के लिए विशेष परीक्षण किए जा सकते हैं।

तकनीक में सुधार, उत्पादन क्षमता बढ़ने और कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण लैब-ग्रोन हीरों की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है। इससे कई उपभोक्ताओं को प्राकृतिक हीरों की तुलना में कम कीमत पर हीरे खरीदने का विकल्प मिला है।

लेकिन सोने की स्थिति अलग है। लैब-ग्रोन हीरों को तैयार करने के लिए कार्बन को विशेष परिस्थितियों में हीरे की संरचना में बदला जाता है। वहीं, सोना बनाने के लिए परमाणु नाभिक बदलना पड़ता है। इसके लिए विशेष परमाणु तकनीक और बहुत नियंत्रित परिस्थितियों की जरूरत होती है।

इसके अलावा, सोना बाजार में केवल आभूषण बनाने के लिए नहीं खरीदा जाता। इसका उपयोग निवेश, केंद्रीय बैंकों के भंडार, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भी होता है। सोने की कीमत पर वैश्विक मांग, आपूर्ति, ब्याज दरों, मुद्रा की स्थिति और निवेशकों की धारणा का भी असर पड़ता है।

इसलिए लैब में सोना बनाने की तकनीक विकसित हो जाने भर से यह तय नहीं होता कि इसकी कीमत हीरों की तरह गिर जाएगी। इसके लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम लागत का प्रमाण जरूरी होगा।

क्या सोने की कीमतें गिर सकती हैं?

सिद्धांत रूप में, यदि भविष्य में कोई तकनीक बड़ी मात्रा में शुद्ध सोना कम लागत पर बना सके और वह बाजार तक पहुंच सके, तो इससे सोने की आपूर्ति बढ़ सकती है। आपूर्ति में बड़ा और लगातार इजाफा कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

लेकिन अभी ऐसी स्थिति नहीं है। Marathon Fusion ने सार्वजनिक रूप से उत्पादन की वास्तविक मात्रा और प्रति ग्राम लागत के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी है। स्वतंत्र सत्यापन भी बाकी है। इसलिए इस दावे के आधार पर सोने की कीमतों में तत्काल गिरावट की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

कंपनी ने अपने शोध और प्रस्तावित फ्यूजन संयंत्रों के आधार पर सोने के संभावित उत्पादन का अनुमान भी दिया है। लेकिन ऐसे अनुमान भविष्य की तकनीक और संयंत्रों की सफलता पर निर्भर करते हैं। उन्हें आज की वास्तविक उत्पादन क्षमता नहीं माना जाना चाहिए।

सोने की कीमतों पर असर पड़ने के लिए कई चीजें एक साथ जरूरी होंगी—फ्यूजन रिएक्टर का व्यावसायिक रूप से सफल होना, पर्याप्त मात्रा में सोना बनना, उत्पादन लागत का प्रतिस्पर्धी होना, रेडियोधर्मी अवशेषों को सुरक्षित तरीके से संभालना और तैयार धातु का बाजार के मानकों पर खरा उतरना।

जब तक ये सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक प्राकृतिक खनन से मिलने वाला सोना ही बाजार की आपूर्ति का प्रमुख स्रोत बना रहेगा।

कंपनी के अनुमान में कितने सोने की बात है?

Marathon Fusion ने अपनी प्रस्तावित तकनीक पर आधारित शोध में फ्यूजन संयंत्र से संभावित सोना उत्पादन का अनुमान दिया है। कंपनी के एक प्रकाशित शोधपत्र में मॉडल के आधार पर लगभग 2 टन सोना प्रति वर्ष प्रति गीगावॉट थर्मल क्षमता की संभावना बताई गई है। कंपनी ने दूसरे अनुमानों में बिजली उत्पादन क्षमता से जुड़े अलग पैमाने भी बताए हैं।

इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ये वास्तविक व्यावसायिक संयंत्र से हासिल किए गए प्रमाणित उत्पादन आंकड़े नहीं हैं। ये प्रस्तावित तकनीक और मॉडलिंग पर आधारित अनुमान हैं।

भविष्य में यदि बड़े पैमाने पर फ्यूजन संयंत्र बनते हैं और प्रस्तावित प्रक्रिया अपेक्षा के अनुसार काम करती है, तो सोना उत्पादन एक अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि बन सकता है। लेकिन फ्यूजन ऊर्जा उद्योग खुद अभी व्यावसायिक स्तर पर बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

फ्यूजन रिएक्टर को स्थिर और लगातार चलाना, ऊर्जा की लागत कम करना, उपकरणों को अत्यधिक ताप और न्यूट्रॉन के प्रभाव से बचाना और पूरे संयंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद कठिन काम है। सोना बनाने की अतिरिक्त प्रक्रिया इन चुनौतियों को और जटिल बना सकती है।

इसलिए कंपनी के अनुमान को संभावित भविष्य की तकनीक के रूप में देखना अधिक सही है, न कि ऐसी उत्पादन योजना के रूप में जिस पर अभी से बाजार भरोसा कर सके।

रेडियोधर्मिता और सुरक्षा की चुनौती

इस तकनीक से जुड़े एक और महत्वपूर्ण सवाल का संबंध रेडियोधर्मिता से है। पारे के कुछ समस्थानिक रेडियोधर्मी होते हैं। प्रस्तावित प्रक्रिया में बनने वाला Mercury-197 भी रेडियोधर्मी होता है और समय के साथ क्षय होकर स्थिर Gold-197 में बदल सकता है।

लेकिन किसी प्रक्रिया से सोने के स्थिर समस्थानिक बनने की संभावना होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रयोग के तुरंत बाद प्राप्त पूरा पदार्थ सुरक्षित और बिक्री योग्य होगा। उसमें दूसरे रेडियोधर्मी समस्थानिक या अवांछित पदार्थ भी मौजूद हो सकते हैं।

ऐसे पदार्थों को अलग करने, शुद्ध करने, जांचने और सुरक्षित रखने के लिए विशेष उपकरण, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और नियामकीय मानकों का पालन जरूरी होगा। कुछ रेडियोधर्मी अवशेषों को सुरक्षित स्तर तक पहुंचने के लिए समय भी देना पड़ सकता है।

Marathon Fusion से जुड़ी रिपोर्टों में रेडियोधर्मी पदार्थों को अलग करने और सोने को सुरक्षित रूप में उपलब्ध कराने की चुनौती का जिक्र किया गया है। इस प्रक्रिया की वास्तविक लागत और सुरक्षा व्यवस्था को समझने के लिए अधिक तकनीकी विवरण और स्वतंत्र मूल्यांकन की जरूरत होगी।

यह भी जरूरी है कि पारे को घर पर गर्म करने या किसी घरेलू प्रयोग से सोना बनाने की कोशिश न की जाए। पारा जहरीला होता है और उसके वाष्प को सांस के साथ अंदर लेना गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। परमाणु प्रयोग केवल उचित सुरक्षा और लाइसेंस वाली वैज्ञानिक सुविधाओं में ही किए जाने चाहिए।

क्या निवेशकों को अब सोना खरीदने से बचना चाहिए?

इस तरह की खबरों के बाद निवेशकों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भविष्य में लैब में बनने वाला सोना प्राकृतिक सोने की कीमत को प्रभावित कर देगा। फिलहाल केवल इस घोषणा के आधार पर निवेश का फैसला बदलना उचित नहीं होगा।

कंपनी का दावा अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है और व्यावसायिक उत्पादन की लागत भी स्पष्ट नहीं है। भविष्य में फ्यूजन तकनीक सफल होने पर भी बाजार तक पहुंचने में समय लग सकता है।

सोने में निवेश करने वाले लोगों को वैश्विक ब्याज दरों, महंगाई, मुद्रा के उतार-चढ़ाव, केंद्रीय बैंकों की खरीद, भू-राजनीतिक जोखिम और अपनी वित्तीय जरूरतों जैसे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। किसी एक संभावित तकनीकी उपलब्धि के आधार पर कीमतों के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना जोखिम भरा हो सकता है।

यदि यह तकनीक वास्तविक रूप से सफल होती है, तो इसका असर समझने के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण, उत्पादन की लागत, सुरक्षा मानकों और व्यावसायिक संयंत्रों की स्थिति पर नजर रखनी होगी।

आगे इस तकनीक में क्या देखना होगा?

Marathon Fusion के दावे को परखने के लिए आने वाले समय में कुछ सवालों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे।

पहला, क्या कंपनी प्रयोग के परिणामों का ऐसा डेटा जारी करेगी जिसे स्वतंत्र वैज्ञानिक दोहरा सकें? दूसरा, प्रयोग में वास्तव में कितनी मात्रा में सोना बना और उसकी शुद्धता कितनी थी? तीसरा, सोना अलग करने और रेडियोधर्मी पदार्थों को संभालने में कितना खर्च आता है? चौथा, क्या यह प्रक्रिया फ्यूजन रिएक्टर के ऊर्जा उत्पादन को प्रभावित किए बिना लगातार चल सकती है?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह समझना संभव होगा कि तकनीक प्रयोगशाला तक सीमित है या भविष्य में औद्योगिक उपयोग की ओर बढ़ सकती है।

विज्ञान में किसी नए दावे का महत्व केवल उसके आकर्षक होने से तय नहीं होता। परिणामों की पुनरावृत्ति, स्वतंत्र समीक्षा, पारदर्शी आंकड़े और व्यावहारिक उपयोगिता भी उतने ही जरूरी हैं।

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