नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद तबाही का दायरा लगातार सामने आ रहा है। रासुवा और आसपास के इलाकों में बोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ ने सड़कें, पुल, घर और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तबाह कर दिए। सबसे बड़ी चिंता उन मजदूरों को लेकर है जो बाढ़ के समय अलग-अलग जलविद्युत परियोजनाओं की भूमिगत सुरंगों में काम कर रहे थे। कई टनल मलबे, पत्थर, कीचड़ और पानी से बंद हो गईं और सैकड़ों लोगों का संपर्क टूट गया। अब नेपाल सेना, पुलिस, भारत, चीन और दक्षिण कोरिया से जुड़े विशेषज्ञों के साथ-साथ माउंट एवरेस्ट पर वर्षों तक काम कर चुके अनुभवी पर्वतारोही और शेर्पा गाइड भी इन खतरनाक सुरंगों में रेस्क्यू अभियान का हिस्सा बन चुके हैं।
इस पूरी घटना का सबसे भावुक और उम्मीद जगाने वाला हिस्सा यह है कि नौ दिन तक अंधेरी और मलबे से घिरी सुरंग में फंसे दो मजदूरों को जिंदा बाहर निकाल लिया गया। अपर त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग से संजय साह और कबीर महार्जन को 4 सितंबर को सुरक्षित बाहर निकाला गया। दोनों मजदूर लगभग 170 मीटर अंदर फंसे हुए थे। बचाव दल ने कई दिनों की मेहनत, खुदाई, भारी मशीनों और नियंत्रित विस्फोटों के बाद उस हिस्से तक पहुंच बनाई। दोनों को बाहर निकालने के बाद तुरंत मेडिकल सहायता और ऑक्सीजन दी गई तथा उन्हें इलाज के लिए काठमांडू ले जाया गया।
संजय साह नेपाल बिजली प्राधिकरण में मैकेनिकल फोरमैन हैं, जबकि कबीर महार्जन मैकेनिकल सुपरवाइजर के तौर पर काम करते हैं। बाढ़ आने के समय दोनों परियोजना के अंदर थे। संजय ने बताया कि जब पानी और मलबा तेजी से अंदर आने लगा तो उन्होंने कंट्रोल रूम में मौजूद लोगों को बाहर निकलने के लिए कहा। वह दूसरों को बाहर निकालने में मदद करते रहे, लेकिन खुद समय पर बाहर नहीं निकल सके। इसके बाद वह सुरंग के अंदर फंस गए। कई दिनों तक उनका परिवार यह भी नहीं जानता था कि वह जीवित हैं या नहीं।
रेस्क्यू टीम जब आखिरकार सुरंग के अंदर एक बड़े खाली हिस्से तक पहुंची तो उसने आवाज लगाकर पूछा कि अंदर कोई है या नहीं। कुछ क्षण बाद अंदर से “Help, help” की आवाज सुनाई दी। रेस्क्यू टीम ने उन्हें घबराने से मना किया और बताया कि वे उन्हें बाहर निकालने आ रहे हैं। इस आवाज ने कई दिनों से उम्मीद लगाए बैठे परिवारों को नई ताकत दी। संजय को सुरंग के अंदर बैठे हुए पाया गया, जबकि कुछ दूरी पर कबीर मलबे और लोहे-लकड़ी के बीच फंसे थे।
कबीर की हालत ज्यादा गंभीर बताई गई। रिपोर्टों के अनुसार वह अपने हाथ और पैर ठीक से नहीं हिला पा रहे थे और उनके पैर में चोट भी थी। दोनों के हाथ-पैरों पर चोट के निशान थे, जिन्हें सुरंग के अंदर मलबे और कीचड़ के बीच रेंगकर आगे बढ़ने से जोड़ा गया। लंबे समय तक अंधेरे और सीमित हवा में रहने का असर भी उनके शरीर पर पड़ा। दोनों को बाहर निकालते समय रेस्क्यू कर्मियों ने उन्हें मेडिकल टीम को सौंपा और अस्पताल भेजने से पहले प्राथमिक उपचार दिया।
इस रेस्क्यू ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है—अगर दो लोग नौ दिन तक ऐसी परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं तो क्या दूसरे लोग भी कहीं भूमिगत हिस्सों में जिंदा हो सकते हैं? इसी उम्मीद ने नेपाल के रेस्क्यू ऑपरेशन को और तेज कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार लगभग 900 मजदूरों के लापता होने की रिपोर्ट है और करीब 500 के अलग-अलग सुरंगों में फंसे होने की आशंका जताई गई है। कई जगह रेस्क्यू टीमों को सुरंगों तक पहुंचने के लिए पहले जमीन के ऊपर जमा मलबा हटाना पड़ रहा है।
रासुवा के चिलिमे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की स्थिति भी बेहद चुनौतीपूर्ण बताई गई है। स्थानीय रिपोर्टों में बताया गया है कि चिलिमे टनल के अंदर एक ऐसी जगह है जहां चार मंजिला इमारत जैसी संरचना मौजूद है। वहां खाने-पीने का सामान होने की जानकारी सामने आई है। रेस्क्यू टीमों को उम्मीद है कि अगर वहां तक हवा पहुंच रही हो और अंदर मौजूद लोगों के पास संसाधन बचे हों तो कुछ लोग अब भी जीवित हो सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस रास्ते से ऑक्सीजन या हवा पहुंच सकती है, वह मलबे से बंद है और अंदर मौजूद लोगों से संपर्क भी टूट गया है।
यही कारण है कि रेस्क्यू टीम सीधे सुरंग के अंदर जाने के बजाय पहले सुरक्षित रास्ता बनाने की कोशिश कर रही है। भारी मशीनों को प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती है क्योंकि बाढ़ ने सड़कें और पुल बहा दिए हैं। कई स्थानों पर सामान्य वाहन पहुंच ही नहीं सकते। ऐसे में मशीनरी को हेलीकॉप्टर या वैकल्पिक रास्तों से ले जाना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर सुरंग का प्रवेश द्वार भी इतना ज्यादा मलबे में दब गया कि पुराने नक्शे, सैटेलाइट तस्वीरों और इंजीनियरिंग ड्रॉइंग की मदद से उसका संभावित स्थान तलाशना पड़ा।
इस ऑपरेशन में माउंट एवरेस्ट और हिमालयी अभियानों के अनुभवी पर्वतारोहियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। जिन लोगों का काम सामान्य परिस्थितियों में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर पर्वतारोहियों को सुरक्षित ऊपर ले जाना होता है, वे अब कीचड़ से भरी अंधेरी सुरंगों में लोगों को खोज रहे हैं। पर्वतारोहियों के पास रस्सी लगाने, खड़ी चट्टानों पर सुरक्षित तरीके से उतरने, हेलीकॉप्टर लॉन्गलाइन तकनीक और अस्थिर जमीन पर काम करने का अनुभव होता है। बाढ़ ने रासुवा के कई हिस्सों को इतना दुर्गम बना दिया है कि ये कौशल अब टनल रेस्क्यू में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक पर्वतारोही और शेर्पा गाइडों ने अपनी सामान्य climbing activities को पीछे रखकर रेस्क्यू ऑपरेशन में हिस्सा लिया है। इनमें ऐसे गाइड भी शामिल हैं जिन्होंने माउंट एवरेस्ट को कई बार फतह किया है। उनका अनुभव इसलिए उपयोगी है क्योंकि टनल के अंदर की परिस्थितियां भी कई मायनों में पर्वतारोहण जैसी खतरनाक हैं—अस्थिर चट्टानें, सीमित जगह, फिसलन, रस्सियों के सहारे आगे बढ़ना और किसी भी समय दोबारा मलबा गिरने का खतरा।
ऑस्ट्रेलियाई इंजीनियर और टनल विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स भी इस रेस्क्यू अभियान से जुड़े हैं। डिक्स इससे पहले भारत के उत्तराखंड में सिलक्यारा सुरंग हादसे के दौरान फंसे 41 मजदूरों को निकालने के अभियान में सलाह दे चुके हैं। नेपाल के इस मामले में उन्होंने सुरंगों की संरचना, संभावित सुरक्षित एयर पॉकेट और पुराने इंजीनियरिंग नक्शों की मदद से यह समझने में योगदान दिया कि अगर लोग अंदर जीवित हैं तो उन्हें किस स्थान पर खोजा जाना चाहिए।
रेस्क्यू विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बाढ़ ने सिर्फ सुरंगों को पानी से नहीं भरा बल्कि उनके आसपास की पूरी भौगोलिक संरचना को बदल दिया। कई जगह चट्टानें, मिट्टी और मलबा इतनी मात्रा में जमा है कि पुराने नक्शे और जमीन की वास्तविक स्थिति में अंतर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों को पहले यह समझना पड़ रहा है कि हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की कौन-सी सुरंग कहां से शुरू होती थी, उसका दूसरा रास्ता किस दिशा में जाता था और किस जगह एयर पॉकेट बनने की संभावना हो सकती है।
इस बीच नेपाल में बाढ़ से हुई मौतों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता गया है। नदी में बहकर दूर-दूर तक पहुंचे शवों की पहचान करना प्रशासन के लिए एक अलग चुनौती बन गया है। कई शव इतने क्षत-विक्षत हालत में मिले कि उन्हें सामान्य तरीके से पहचानना संभव नहीं रहा। अधिकारियों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों को DNA सैंपल, कपड़े, गहने, टैटू और शरीर पर मौजूद दूसरे पहचान चिह्नों की मदद लेनी पड़ रही है।
कुछ स्थानों पर स्थिति इतनी दर्दनाक रही कि पूरे शरीर की जगह केवल शरीर के हिस्से मिले। रिपोर्टों में कुछ मामलों में सिर्फ हाथ या पैर मिलने की जानकारी सामने आई है। वहीं फॉरेंसिक अधिकारियों ने यह भी बताया है कि कुछ शवों के सिर नहीं मिले, इसलिए पहचान के लिए हड्डी या दांत से DNA सैंपल सुरक्षित रखने जैसी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। यह पूरी प्रक्रिया दिखाती है कि बाढ़ की ताकत कितनी विनाशकारी थी और शवों को पहचानना परिवारों तथा प्रशासन दोनों के लिए कितना मुश्किल हो गया है।
शवों की संख्या बढ़ने के कारण नेपाल के कई अस्पतालों और मॉर्चरी में जगह की समस्या भी सामने आई। कुछ जगहों पर शवों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त cold-storage उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रशासन ने DNA और पहचान संबंधी रिकॉर्ड सुरक्षित करने के बाद कुछ अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाने की व्यवस्था भी शुरू की। इसका उद्देश्य शवों को लावारिस छोड़ना नहीं बल्कि तेजी से खराब हो रहे शवों को सम्मानजनक तरीके से सुरक्षित रखना और भविष्य में DNA के जरिए पहचान संभव बनाना है।
परिवारों के लिए यह समय बेहद मुश्किल है। किसी का बेटा लापता है, किसी का भाई, किसी का पति या पिता। कई लोग अस्पतालों और अस्थायी पहचान केंद्रों में शवों की तस्वीरें देखकर अपने परिजन को खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कई मामलों में कपड़े, स्कूल यूनिफॉर्म, गले की माला, टैटू या कोई छोटा-सा पहचान चिह्न ही परिवारों को अपने प्रियजन तक पहुंचाने में मदद कर रहा है। कुछ शवों पर एक से ज्यादा परिवारों ने दावा किया है, जिसके बाद DNA जांच से अंतिम पहचान करने की जरूरत पड़ रही है।
बाढ़ की शुरुआत 26 अगस्त को हिमालयी क्षेत्र में हुई एक बेहद विनाशकारी घटना के बाद हुई। पानी के साथ बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे की ओर आया और बोटेकोशी-त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास तबाही मचा दी। रासुवा, नुवाकोट और आसपास के क्षेत्रों में कई हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हुईं। इन परियोजनाओं में काम कर रहे मजदूरों के लिए स्थिति अचानक बेहद खतरनाक हो गई क्योंकि भूमिगत सुरंगों में पानी और मलबा बहुत तेजी से पहुंचा।
कुछ मजदूर समय रहते बाहर निकलने में कामयाब रहे। एक जीवित बचे मजदूर ने बताया कि पानी अचानक सुरंग में घुसा और लोग जान बचाने के लिए भागने लगे। कुछ लोगों ने पाइप और सुरंग की सीढ़ियों को पकड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की। कई जगह मजदूरों को सैकड़ों मीटर तक अंधेरे में संघर्ष करना पड़ा। ऐसे लोगों की कहानियां बताती हैं कि जिन लोगों ने बाहर निकलकर अपनी जान बचाई, उनके लिए भी यह अनुभव किसी भयावह सपने से कम नहीं था।
अब रेस्क्यू टीमों की नजर उन सुरंगों पर है जहां अभी भी लोगों के फंसे होने की आशंका है। अपर त्रिशूली-1, चिलिमे और रासुवागढ़ी जैसे हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों में खोज अभियान तेज किया गया है। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस, नेपाल पुलिस और चीन, भारत तथा कोरिया के विशेषज्ञ अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। कई जगह ऑक्सीजन पहुंचाने, कैमरे अंदर भेजने और मलबे को हटाकर नए रास्ते बनाने की कोशिश की जा रही है।
रेस्क्यू टीमों के लिए हर मीटर की खुदाई बेहद सावधानी से करनी पड़ रही है। सुरंग के अंदर कोई व्यक्ति जीवित हो सकता है, इसलिए भारी मशीनरी का इस्तेमाल भी सोच-समझकर किया जाता है। दूसरी तरफ अगर मलबा हटाने में बहुत ज्यादा समय लगता है तो अंदर फंसे लोगों के लिए खतरा बढ़ता जाता है। इसी वजह से इंजीनियर, सुरंग विशेषज्ञ, सेना और पर्वतारोहण विशेषज्ञ मिलकर हर कदम की योजना बना रहे हैं।
अभी दो मजदूरों का जिंदा बाहर आना पूरे अभियान के लिए बड़ी उम्मीद है। नौ दिन तक फंसे रहने के बाद संजय साह और कबीर महार्जन का बचना इस बात का प्रमाण है कि भूमिगत संरचनाओं में बने कुछ सुरक्षित हिस्से लोगों को लंबे समय तक बचा सकते हैं। लेकिन हर सुरंग की स्थिति अलग है, इसलिए किसी भी दूसरे व्यक्ति के जीवित होने की संभावना के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। रेस्क्यू टीम इसी वजह से लगातार खोज जारी रखे हुए है।
इस पूरे हादसे ने नेपाल की हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बिजली परियोजनाएं अक्सर बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में बनाई जाती हैं। यहां भूस्खलन, अचानक बाढ़, ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं और नदी के जलस्तर में तेजी से बदलाव जैसी प्राकृतिक चुनौतियां मौजूद रहती हैं। इसलिए भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए emergency escape routes, communication systems, early-warning mechanisms, oxygen supply और underground refuge areas की सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत पर चर्चा होना तय है।
फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता उन लोगों को खोज निकालना है जिनके परिवार अब भी उनके लौटने का इंतजार कर रहे हैं। रेस्क्यू टीमों के लिए हर आवाज, हर सुरंग और हर छोटे एयर पॉकेट का महत्व है। नौ दिन बाद दो मजदूरों की जिंदगी बचाने वाली यह घटना इस त्रासदी के बीच उम्मीद की सबसे बड़ी वजह बनी है। दूसरी तरफ बाढ़ में जान गंवाने वालों की पहचान और सम्मानजनक अंतिम संस्कार का काम भी जारी है। नेपाल के लिए यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी बदल देने वाली त्रासदी है।
रासुवा की सुरंगों में चल रहा अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। जहां एक तरफ रेस्क्यू टीमों को मलबे के नीचे जिंदगी की तलाश है, वहीं दूसरी तरफ नदी के किनारे और अस्पतालों में परिवार अपने लापता लोगों की पहचान की उम्मीद में बैठे हैं। चार मंजिला संरचना वाली चिलिमे टनल में मौजूद संभावित सुरक्षित जगहों से लेकर त्रिशूली-3A में 170 मीटर अंदर मिले दो मजदूरों तक, हर घटनाक्रम यह बताता है कि इस आपदा में उम्मीद और भय दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। जब तक सभी संभावित स्थानों की तलाशी पूरी नहीं हो जाती, तब तक रेस्क्यू अभियान जारी रहने की संभावना है। और इस समय हर परिवार की नजर उसी सुरंग के मुहाने पर है, जहां से शायद अगली बार कोई और मजदूर जिंदा बाहर निकल आए।
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http://नेपाल के रासुवा में बाढ़ के बाद हाइड्रोपावर टनल में फंसे मजदूरों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन