नेतन्याहू हारे या जीतें, फिलिस्तीनियों का भविष्य क्यों मुश्किल?

इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता और विपक्ष की संभावनाओं पर चर्चा तेज है। लेकिन इस चुनाव का एक बड़ा सवाल फिलिस्तीनियों के भविष्य से जुड़ा है। क्या नेतन्याहू के सत्ता से बाहर होने पर गाजा और वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनियों की स्थिति बदलेगी? या सरकार बदलने के बावजूद स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनने की संभावना कमजोर ही रहेगी?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों और राजनीतिक विश्लेषणों के मुताबिक, इजराइल के प्रमुख विपक्षी नेता भी निकट भविष्य में स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनाने के पक्ष में नहीं हैं। उनके और नेतन्याहू के बीच मतभेद जरूर हैं, लेकिन फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और गाजा में इजराइल की सुरक्षा संबंधी भूमिका जैसे बुनियादी सवालों पर व्यापक सहमति दिखाई देती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि इजराइल की सभी पार्टियों की नीतियां एक जैसी हैं। नेतन्याहू के दक्षिणपंथी सहयोगी फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर नियंत्रण और यहूदी बस्तियों के विस्तार को लेकर ज्यादा कठोर रुख रखते हैं। वहीं, विपक्ष के कुछ नेता वेस्ट बैंक में बसने वालों की हिंसा रोकने, प्रशासनिक सुधार करने और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संबंध सुधारने की बात करते हैं।

फिर भी चुनावी बहस का केंद्र फिलिस्तीनियों को स्वतंत्र देश देने के बजाय इजराइल की सुरक्षा, हमास को कमजोर करने, नेतन्याहू की जवाबदेही और सरकार के कामकाज पर ज्यादा केंद्रित है। यही वजह है कि चुनाव में नेतन्याहू की हार या जीत से फिलिस्तीनियों के लिए बड़े राजनीतिक बदलाव की उम्मीद फिलहाल सीमित दिखाई देती है।

27 अक्टूबर को इजराइल में क्यों अहम है चुनाव?

इजराइल में होने वाला यह चुनाव केवल प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया नहीं है। यहां मतदाता संसद यानी नेसेट के लिए पार्टियों को वोट देते हैं। इसके बाद राजनीतिक दल गठबंधन बनाकर सरकार बनाने की कोशिश करते हैं। संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए आम तौर पर कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दक्षिणपंथी तथा धार्मिक दलों के समर्थन से सरकार चलाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, विपक्ष की कई पार्टियां नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए चुनावी तालमेल बना रही हैं।

विपक्ष में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट, यायर लैपिड, अविग्दोर लिबरमैन और वामपंथी झुकाव वाले यायर गोलान जैसे नेता अलग-अलग राजनीतिक धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन नेताओं के बीच नेतन्याहू को हटाने का साझा उद्देश्य है, लेकिन उनकी विचारधारा, सुरक्षा नीति और भविष्य की सरकार को लेकर प्राथमिकताएं पूरी तरह समान नहीं हैं।

चुनाव से पहले सामने आए सर्वेक्षणों में किसी भी प्रमुख खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ नहीं दिखा। इसका मतलब है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए गठबंधन की बातचीत बेहद महत्वपूर्ण होगी।

अगर नेतन्याहू का खेमा बहुमत हासिल कर लेता है, तो उनकी मौजूदा नीतियां जारी रह सकती हैं। वहीं, विपक्ष के सत्ता में आने पर कुछ प्रशासनिक और सुरक्षा नीतियों में बदलाव संभव है। लेकिन फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के सवाल पर बड़ा परिवर्तन होगा या नहीं, यही सबसे अहम अनिश्चितता है।

नेतन्याहू और विपक्ष में फिलिस्तीन के मुद्दे पर कितनी समानता?

नेतन्याहू लंबे समय से स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश की स्थापना का विरोध करते रहे हैं। उनकी सरकार और दक्षिणपंथी सहयोगियों ने सुरक्षा के नाम पर जॉर्डन घाटी तथा वेस्ट बैंक के दूसरे हिस्सों पर इजराइल का नियंत्रण बनाए रखने की बात कही है। गठबंधन में शामिल कुछ नेता फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजराइली बस्तियों के विस्तार और क्षेत्र के कुछ हिस्सों को इजराइल में मिलाने के भी समर्थक हैं।

विपक्ष के प्रमुख नेता नेतन्याहू की कई नीतियों की आलोचना करते हैं। वे सरकार की जवाबदेही, 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था की विफलताओं, न्यायिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और पश्चिमी देशों के साथ इजराइल के संबंधों को लेकर सवाल उठाते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनाने की स्पष्ट योजना लेकर चुनाव लड़ रहा है। प्रमुख विपक्षी नेताओं में भी फिलिस्तीनी राज्य को लेकर समर्थन बहुत सीमित है। कई नेता मानते हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा राजनीतिक समझौता संभव नहीं है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 22 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट दोनों स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश के विरोध में हैं। दोनों की सुरक्षा नीति भी गाजा में हमास के हथियार डालने और उसके शासन को समाप्त करने पर केंद्रित है।

हालांकि, वेस्ट बैंक में बस्तियों, वहां होने वाली हिंसा और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संबंधों को लेकर दोनों खेमों के दृष्टिकोण में अंतर है। यही अंतर भविष्य की सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकता है।

वामपंथी पार्टियों का एजेंडा भी क्यों बदला?

इजराइल की राजनीति में वामपंथी और उदारवादी दल पहले भी फिलिस्तीन के साथ समझौते, शांति वार्ता और दो-राष्ट्र समाधान की चर्चा करते रहे हैं। दो-राष्ट्र समाधान का अर्थ है कि इजराइल और फिलिस्तीन अलग-अलग स्वतंत्र राज्यों के रूप में अस्तित्व में रहें और दोनों की सुरक्षा तथा राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित हों।

लेकिन पिछले वर्षों में इजराइल की राजनीति में सुरक्षा संबंधी चिंताएं ज्यादा प्रभावशाली हो गई हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले और उसके बाद शुरू हुए युद्ध ने राजनीतिक बहस को गहराई से प्रभावित किया। हमले में इजराइल में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और बंधक बनाए गए। इसके बाद गाजा में इजराइली सैन्य अभियान शुरू हुआ, जिसमें बड़े पैमाने पर फिलिस्तीनी जनहानि और विस्थापन हुआ।

इस माहौल में इजराइल के कई राजनीतिक दलों ने अपनी प्राथमिकताओं में सुरक्षा, हमास को कमजोर करने और सैन्य कार्रवाई के परिणामों को अधिक महत्व दिया है। वामपंथी या उदारवादी माने जाने वाले दलों में भी स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश को तत्काल स्वीकार करने के बजाय सुरक्षा की शर्तों और भविष्य की परिस्थितियों पर जोर बढ़ा है।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि इजराइल के सभी वामपंथी दलों ने फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन पूरी तरह छोड़ दिया है। कुछ नेता और राजनीतिक समूह अभी भी राजनीतिक समझौते और फिलिस्तीनियों के अधिकारों की बात करते हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में इस एजेंडे की प्रमुखता और प्रभाव पहले की तुलना में सीमित दिखाई देता है।

यही बदलाव फिलिस्तीनी मुद्दे के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ाता है। यदि प्रमुख दल स्वतंत्र राज्य के लिए स्पष्ट समयसीमा और राजनीतिक प्रक्रिया का समर्थन नहीं करते, तो शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ना कठिन हो सकता है।

गाजा में क्या बदल सकता है?

गाजा इस चुनाव के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। हमास के नेतृत्व में 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमले के बाद इजराइल ने गाजा में सैन्य अभियान चलाया। इस युद्ध में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ और बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े।

नेतन्याहू और उनके सहयोगियों का कहना है कि गाजा में स्थायी सुरक्षा के लिए हमास को हथियार छोड़ने और शासन से हटने की जरूरत है। वे सुरक्षा व्यवस्था पर इजराइल का नियंत्रण बनाए रखने को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

विपक्ष के कई प्रमुख नेता भी हमास के शासन को समाप्त करने और इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर देते हैं। गादी आइजेनकोट जैसे नेता गाजा में हमास के शासन को समाप्त करने के लिए समयसीमा तय करने की बात करते रहे हैं। नफ्ताली बेनेट भी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और भविष्य में गाजा के पुनर्निर्माण को सुरक्षा संबंधी शर्तों से जोड़ते हैं।

इसलिए विपक्ष के सत्ता में आने से गाजा में इजराइल की मूल सुरक्षा नीति तुरंत बदल जाएगी, ऐसा मानने के पर्याप्त आधार नहीं हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई की रणनीति, मानवीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव संभव हो सकते हैं।

फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि युद्धविराम कितना टिकाऊ रहता है, मानवीय सहायता कितनी पहुंचती है, विस्थापित परिवारों की वापसी कैसे होती है और पुनर्निर्माण के लिए कौन-सी व्यवस्था बनाई जाती है।

इन मुद्दों पर केवल चुनावी नतीजे पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए राजनीतिक निर्णयों, सुरक्षा व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय दबाव और जमीन पर लागू होने वाले समझौतों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

वेस्ट बैंक में बस्तियां और हिंसा बड़ा मुद्दा

गाजा के अलावा वेस्ट बैंक भी फिलिस्तीनियों के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी रहते हैं और इजराइली बस्तियां भी मौजूद हैं। वेस्ट बैंक पर 1967 के युद्ध के बाद से इजराइल का कब्जा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बड़े हिस्से के अनुसार, कब्जे वाले क्षेत्र में इजराइली बस्तियों का विस्तार अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। इजराइल इस कानूनी व्याख्या से असहमत रहा है।

नेतन्याहू के दक्षिणपंथी सहयोगियों में ऐसे नेता हैं जो बस्तियों का विस्तार करने और वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों पर इजराइल की संप्रभुता लागू करने का समर्थन करते हैं। इससे फिलिस्तीनियों के लिए एक सतत और स्वतंत्र राज्य बनाने की संभावनाएं और कठिन हो सकती हैं।

विपक्ष के कुछ नेताओं ने वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ बसने वालों की हिंसा की आलोचना की है और ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई की मांग की है। इस मामले में सरकार बदलने से कुछ सुधार संभव हैं, क्योंकि नई सरकार हिंसा रोकने, कानून लागू करने और अंतरराष्ट्रीय संबंध सुधारने को प्राथमिकता दे सकती है।

लेकिन बस्तियों के विस्तार और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के सवाल पर राजनीतिक मतभेद बने रहेंगे। यदि कोई नई सरकार बस्तियों की नीति में बड़ा बदलाव नहीं करती, तो स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश की स्थापना के लिए जरूरी क्षेत्रीय और राजनीतिक आधार कमजोर ही रह सकता है।

इसलिए वेस्ट बैंक में बदलाव का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि नेतन्याहू सत्ता में हैं या नहीं। यह भी देखना होगा कि नई सरकार बस्तियों, भूमि, आवाजाही, सुरक्षा और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संबंधों को लेकर क्या कदम उठाती है।

फिलिस्तीनी प्राधिकरण की भूमिका क्या होगी?

फिलिस्तीनी प्राधिकरण वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों में सीमित प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाता है। इसे फिलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख राजनीतिक संस्थाओं में गिना जाता है, हालांकि फिलिस्तीनियों के बीच इसकी लोकप्रियता, नेतृत्व और शासन को लेकर लंबे समय से विवाद भी रहे हैं।

इजराइल की कुछ विपक्षी पार्टियां फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संबंधों को सुधारने की बात करती हैं। ऐसा कदम सुरक्षा समन्वय, नागरिक प्रशासन और मानवीय मामलों में व्यावहारिक बदलाव ला सकता है।

लेकिन फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संबंध सुधारना और स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश को मान्यता देना दो अलग बातें हैं। किसी सरकार का प्राधिकरण के साथ बातचीत करना जरूरी नहीं कि वह दो-राष्ट्र समाधान स्वीकार कर ले।

फिलिस्तीनियों के लिए वास्तविक राजनीतिक प्रगति के लिए यह जरूरी होगा कि उन्हें अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का अधिकार मिले, कब्जे वाले क्षेत्रों की स्थिति का समाधान हो और स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए स्पष्ट राजनीतिक प्रक्रिया बने।

यदि चुनाव के बाद भी इजराइल के प्रमुख दल ऐसी प्रक्रिया पर सहमत नहीं होते, तो केवल प्रशासनिक संबंधों में सुधार से फिलिस्तीनियों की राष्ट्रीय आकांक्षाएं पूरी नहीं होंगी।

अरब पार्टियां चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं

इजराइल की राजनीति में अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी महत्वपूर्ण हैं। इजराइल की आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा अरब नागरिकों का है। इन पार्टियों के नेता नागरिक समानता, भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई, सार्वजनिक सेवाओं और फिलिस्तीनी मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हैं।

अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य और फिलिस्तीनियों के राजनीतिक अधिकारों के समर्थन में प्रमुख यहूदी-नेतृत्व वाले दलों से अलग रुख अपनाती रही हैं। लेकिन उन्हें सरकार बनाने वाले गठबंधनों में शामिल करने को लेकर मुख्यधारा की कई पार्टियों में हिचकिचाहट है।

इस चुनाव में यदि किसी भी प्रमुख खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो अरब पार्टियों का संसदीय समर्थन सरकार बनाने की बातचीत में अहम हो सकता है। फिर भी प्रमुख विपक्षी नेताओं में से कई ने अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन बनाने से दूरी रखी है।

यह स्थिति बताती है कि इजराइल की राजनीति में सरकार बदलने की संभावना केवल मतों की संख्या पर निर्भर नहीं करेगी। गठबंधन के लिए कौन-सी पार्टियां एक साथ आने को तैयार हैं और किस तरह के समझौते किए जाते हैं, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

अरब पार्टियों की भूमिका बढ़ने से कुछ नीतियों पर बातचीत की गुंजाइश बन सकती है। लेकिन जब तक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर प्रमुख दलों की सहमति नहीं बनती, तब तक इस मुद्दे पर निर्णायक बदलाव की संभावना सीमित रहेगी।

नेतन्याहू के खिलाफ नाराजगी किन मुद्दों पर है?

नेतन्याहू की राजनीति को लेकर इजराइल में लंबे समय से विवाद रहा है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े मुकदमे चल रहे हैं, जिन्हें वह खारिज करते हैं। इसके अलावा 7 अक्टूबर 2023 के हमले से पहले और बाद की सुरक्षा व्यवस्था, युद्ध के संचालन और न्यायिक सुधारों को लेकर भी उनकी सरकार की आलोचना होती रही है।

विपक्ष के कई नेता मानते हैं कि नेतन्याहू के नेतृत्व में इजराइल की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हुई है और सरकार ने सुरक्षा संबंधी गलतियों की पर्याप्त जवाबदेही नहीं ली। वे प्रशासनिक सुधार, जांच और राजनीतिक संस्थाओं में विश्वास बहाल करने की बात करते हैं।

लेकिन नेतन्याहू का विरोध करना और फिलिस्तीनी नीति में आमूलचूल बदलाव का समर्थन करना एक ही बात नहीं है। विपक्ष के कुछ नेता उनकी सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन सुरक्षा और फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे पर उनके कई विचार नेतन्याहू के रुख से मिलते हैं।

इसलिए चुनाव में नेतन्याहू की हार को फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में अपने आप होने वाली प्रगति मानना सही नहीं होगा। सरकार बदलने से राजनीतिक शैली और कुछ नीतियां बदल सकती हैं, लेकिन फिलिस्तीनी मुद्दे पर बदलाव के लिए स्पष्ट राजनीतिक इच्छा और ठोस समझौते जरूरी होंगे।

क्या दो-राष्ट्र समाधान की उम्मीद खत्म हो गई है?

दो-राष्ट्र समाधान लंबे समय से इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के राजनीतिक समाधान के प्रमुख प्रस्तावों में शामिल रहा है। इसके तहत इजराइल और फिलिस्तीन अलग-अलग स्वतंत्र देशों के रूप में रहेंगे। इसमें सीमाओं, यरुशलम की स्थिति, सुरक्षा, शरणार्थियों और बस्तियों जैसे कठिन सवालों पर समझौते की जरूरत होगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सरकारें और संस्थाएं इस समाधान का समर्थन करती हैं। लेकिन जमीन पर बढ़ती बस्तियां, राजनीतिक अविश्वास, हिंसा और युद्ध ने इसकी संभावनाओं को कमजोर किया है।

इजराइल में प्रमुख दलों का स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य को लेकर विरोध या अनिच्छा इस प्रक्रिया के लिए एक बड़ी बाधा है। दूसरी ओर, फिलिस्तीनी राजनीति में भी नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और भविष्य की शासन व्यवस्था को लेकर गंभीर चुनौतियां हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि दो-राष्ट्र समाधान की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो गई है। लेकिन जब तक दोनों पक्षों में राजनीतिक समझौते की इच्छा नहीं बनती और सुरक्षा तथा संप्रभुता के सवालों पर ठोस बातचीत नहीं होती, तब तक इसका रास्ता कठिन बना रहेगा।

यदि नई इजराइली सरकार अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाती है, वेस्ट बैंक में हिंसा रोकने के कदम उठाती है और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ संवाद बहाल करती है, तो कुछ सकारात्मक बदलाव संभव हो सकते हैं। लेकिन स्वतंत्र राज्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इससे ज्यादा व्यापक राजनीतिक प्रतिबद्धता की जरूरत होगी।

फिलिस्तीनियों की मुश्किलें क्यों बनी रह सकती हैं?

फिलिस्तीनियों के सामने केवल इजराइल की सरकार का सवाल नहीं है। गाजा में युद्ध और विस्थापन, मानवीय सहायता, घरों और बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण, वेस्ट बैंक में बस्तियों का विस्तार, आवाजाही पर प्रतिबंध और राजनीतिक संप्रभुता जैसे कई मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हैं।

यदि नेतन्याहू फिर से सरकार बनाते हैं, तो उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों की नीतियां फिलिस्तीनी क्षेत्रों में नियंत्रण और बस्तियों के विस्तार को बढ़ावा दे सकती हैं। दूसरी ओर, यदि विपक्ष सत्ता में आता है, तो प्रशासनिक और कूटनीतिक स्तर पर कुछ सुधार संभव हैं, लेकिन स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में तत्काल बदलाव की गारंटी नहीं है।

फिलिस्तीनियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नई सरकार उनके राजनीतिक अधिकारों और संप्रभुता को लेकर कोई ठोस प्रक्रिया शुरू करेगी। केवल युद्ध की रणनीति में बदलाव, बेहतर कूटनीतिक संबंध या सीमित प्रशासनिक राहत से इस मूल प्रश्न का समाधान नहीं होगा।

यह भी जरूरी है कि फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय जरूरतों को चुनावी राजनीति से अलग प्राथमिकता दी जाए। नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है।

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