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रूस-ईरान ने क्रिप्टो में ₹9.92 लाख करोड़ का व्यापार किया? जानें कैसे बना वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क

रूस और ईरान एक बार फिर वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक चर्चाओं के केंद्र में हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देशों ने पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम पर निर्भरता कम करने के लिए क्रिप्टोकरेंसी और वैकल्पिक डिजिटल भुगतान नेटवर्क का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच लगभग ₹9.92 लाख करोड़ (लगभग 120 अरब डॉलर के आसपास) के बराबर व्यापार में क्रिप्टो आधारित भुगतान और वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया। बताया जा रहा है कि इस नेटवर्क के जरिए तेल, ड्रोन, औद्योगिक उपकरण और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई उत्पादों का लेनदेन हुआ।

हालांकि इन दावों के अलग-अलग स्रोत हैं और सभी लेनदेन के आधिकारिक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह स्पष्ट है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस और ईरान दोनों वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

रूस पर यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य पश्चिमी देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। दूसरी ओर ईरान वर्षों से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों में दोनों देशों के लिए वैश्विक बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से व्यापार करना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया।

अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली और वैश्विक बैंकिंग नेटवर्क के माध्यम से होता है। जब किसी देश पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तब उसके लिए अंतरराष्ट्रीय भुगतान, बैंक ट्रांसफर और विदेशी व्यापार करना जटिल हो जाता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए रूस और ईरान ने वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम तेज किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देशों ने ब्लॉकचेन तकनीक, डिजिटल भुगतान प्रणाली और स्थानीय मुद्रा आधारित लेनदेन को बढ़ावा दिया। कुछ मामलों में क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग सीमा पार भुगतान के लिए किया गया, जबकि कुछ व्यापार स्थानीय वित्तीय नेटवर्क और वैकल्पिक संदेश प्रणाली के माध्यम से किए गए।

ब्लॉकचेन एक ऐसी डिजिटल तकनीक है जिसमें लेनदेन का रिकॉर्ड सुरक्षित और वितरित रूप से संग्रहीत किया जाता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें किसी एक केंद्रीय संस्था पर पूरी निर्भरता नहीं होती। यही कारण है कि कई देश भविष्य की डिजिटल वित्तीय व्यवस्था में ब्लॉकचेन और डिजिटल करेंसी की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझना जरूरी है कि क्रिप्टोकरेंसी और ब्लॉकचेन एक ही चीज नहीं हैं। क्रिप्टोकरेंसी डिजिटल मुद्रा है, जबकि ब्लॉकचेन वह तकनीक है जिस पर कई डिजिटल भुगतान प्रणालियां आधारित होती हैं। कई सरकारें ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग करती हैं, लेकिन निजी क्रिप्टोकरेंसी को अलग दृष्टिकोण से देखती हैं।

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस और ईरान के बीच ऊर्जा क्षेत्र का व्यापार लगातार बढ़ रहा है। तेल और गैस दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ऐसे में वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के माध्यम से ऊर्जा व्यापार को बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।

ड्रोन तकनीक भी हाल के वर्षों में वैश्विक सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में रूस और ईरान के बीच रक्षा सहयोग की चर्चा होती रही है। हालांकि हर रक्षा सौदे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं होती और कई जानकारियां केवल सरकारी बयानों या मीडिया रिपोर्टों पर आधारित रहती हैं।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि अधिक देश पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली के विकल्प तलाशने लगते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि अमेरिकी डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सबसे प्रमुख मुद्रा बना हुआ है।

रूस ने हाल के वर्षों में अपनी घरेलू भुगतान प्रणाली को मजबूत किया है। वहीं ईरान भी लंबे समय से पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के बीच वैकल्पिक आर्थिक रास्ते विकसित करने का प्रयास करता रहा है। दोनों देशों के बीच सहयोग इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

क्रिप्टोकरेंसी के उपयोग को लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ का मानना है कि यह तेज और कम लागत वाला भुगतान माध्यम हो सकता है, जबकि अन्य विशेषज्ञ इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव, साइबर सुरक्षा और नियामकीय जोखिमों को लेकर चिंता जताते हैं।

भारत सहित कई देशों ने क्रिप्टोकरेंसी को लेकर अलग-अलग नीतियां अपनाई हैं। भारत में क्रिप्टो ट्रेडिंग पर कर संबंधी नियम लागू हैं, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक लगातार डिजिटल वित्तीय जोखिमों पर अपनी चिंता व्यक्त करता रहा है। साथ ही भारत अपनी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) यानी डिजिटल रुपये पर भी काम कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी डिजिटल करेंसी को लेकर नई प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। चीन डिजिटल युआन पर आगे बढ़ चुका है, जबकि कई अन्य देश अपनी डिजिटल मुद्रा विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य भुगतान प्रणाली को अधिक तेज, सुरक्षित और आधुनिक बनाना है।

रूस और ईरान के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क सफल होते हैं, तो अन्य प्रतिबंधित या उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी ऐसे मॉडल का अध्ययन कर सकती हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर इस तरह की व्यवस्था को व्यापक स्वीकृति मिलने में अभी समय लग सकता है।

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई भुगतान प्रणाली की सफलता उसके भरोसे, सुरक्षा, नियामकीय ढांचे और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता पर निर्भर करती है। यदि बड़े व्यापारिक साझेदार इसे स्वीकार नहीं करते, तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक भू-राजनीतिक पहलू भी है। पश्चिमी देशों और रूस-ईरान जैसे देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण आर्थिक व्यवस्था भी वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। प्रतिबंध, वैकल्पिक व्यापार नेटवर्क और नई भुगतान प्रणालियां अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

ऊर्जा बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है। यदि तेल और गैस का बड़ा हिस्सा पारंपरिक डॉलर आधारित व्यवस्था के बाहर व्यापार होने लगे, तो भविष्य में वैश्विक ऊर्जा व्यापार की संरचना में बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि फिलहाल डॉलर का प्रभुत्व मजबूत बना हुआ है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल भुगतान नेटवर्क के विस्तार के साथ साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी ब्लॉकचेन या क्रिप्टो आधारित प्रणाली के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में बताए गए व्यापारिक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए ऐसे दावों को आधिकारिक सरकारी घोषणाओं और विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों के साथ देखकर समझना चाहिए।

कुल मिलाकर रूस और ईरान द्वारा वैकल्पिक डिजिटल भुगतान प्रणाली और क्रिप्टो आधारित लेनदेन को बढ़ावा देने की खबरें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में संभावित बदलाव का संकेत देती हैं। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार और डिजिटल अर्थव्यवस्था में नई दिशा देखने को मिल सकती है। फिलहाल विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।

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