स्कूल की यूनिफॉर्म पहने बच्चों के हाथों में किताब और कॉपी की जगह झाड़ू दिखाई दे, बच्चे बारिश के बीच स्कूल के छज्जे पर चढ़कर सफाई करते नजर आएं, कहीं टॉयलेट साफ करते बच्चे दिखें और कहीं निर्माण सामग्री के रूप में रेत-बजरी उठाते छात्र कैमरे में कैद हों, तो सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि आखिर स्कूल में पढ़ने आए बच्चों से किस हद तक गैर-शैक्षणिक काम कराया जा सकता है और उनके शिक्षा के अधिकार की सीमा कहां से शुरू होती है।
सितंबर 2026 में मध्य प्रदेश के शहडोल जिले से सामने आए एक वायरल वीडियो ने इसी बहस को फिर तेज कर दिया है। गोरतरा ग्राम पंचायत के शासकीय प्राथमिक विद्यालय से जुड़े वीडियो में बच्चे स्कूल की छत और छज्जे की सफाई करते दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक बारिश के दौरान स्कूल भवन पर काई और गंदगी जमा थी और बच्चों को ऊंचाई पर चढ़कर सफाई करते देखा गया। सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर जताई गई कि बच्चों के लिए छज्जे पर चढ़ने-उतरने की सुरक्षित व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही थी। मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग की ओर से जांच की बात कही गई।
वीडियो सामने आने के बाद यह सवाल भी उठा कि अगर स्कूल भवन की छत या छज्जे की सफाई जरूरी थी, तो यह काम बच्चों से क्यों कराया गया? खासकर तब, जब बारिश में छज्जा या छत गीली हो सकती है और काई के कारण फिसलने का खतरा भी बढ़ जाता है। छोटे बच्चों को ऊंचाई पर भेजना सामान्य सफाई कार्य से अलग मामला है, क्योंकि इसमें उनकी शारीरिक सुरक्षा सीधे जुड़ जाती है।
शहडोल का मामला अकेला नहीं है। पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों से स्कूलों में बच्चों से सफाई या दूसरे गैर-शैक्षणिक काम कराए जाने के कई वीडियो और रिपोर्ट सामने आए हैं। मंडला जिले के मवई विकासखंड के अमवार प्राथमिक स्कूल से 27 अगस्त के आसपास सामने आए वीडियो में बच्चे स्कूल परिसर और टॉयलेट की सफाई करते नजर आए। कुछ बच्चों को कक्षाओं में झाड़ू लगाते हुए भी दिखाया गया। इस मामले में शिक्षकों को नोटिस दिए जाने की जानकारी सामने आई।
मंडला के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही था कि स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। अगर बच्चों को स्वच्छता के बारे में सिखाने के लिए हाथ धोने, कूड़ा सही जगह डालने या अपने आसपास की जगह साफ रखने जैसी गतिविधियां कराई जाएं, तो वह एक शैक्षणिक गतिविधि हो सकती है। लेकिन किसी बच्चे को नियमित रूप से टॉयलेट साफ करने, गंदगी उठाने या ऐसी सफाई का काम करने के लिए लगाना अलग बात है। यहां उद्देश्य “स्वच्छता की शिक्षा” है या “बच्चे से सफाई करवाना”, यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी तरह झारखंड के गढ़वा जिले से अप्रैल 2026 में सामने आए वीडियो ने भी सवाल खड़े किए थे। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक बरडीहा प्रखंड के लावा चंपा स्थित प्राथमिक स्कूल में बच्चे टॉयलेट की सफाई करते दिखाई दिए। उसी जिले के कांडी उच्च विद्यालय से भी ऐसा वीडियो सामने आया जिसमें बच्चों से किताबें ढुलवाने का आरोप लगा। लावा चंपा के हेडमास्टर ने कहा था कि बच्चों ने खुद से टॉयलेट साफ किया और उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा गया था। जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए थे।
यानी हर वायरल वीडियो के आधार पर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा कि किसी शिक्षक ने निश्चित तौर पर बच्चों को मजबूर किया था। जांच में यह देखना जरूरी होता है कि वीडियो कब का है, उसमें दिखाई दे रहे बच्चों से किसने काम करवाया, काम के लिए निर्देश किसने दिए और क्या बच्चे अपनी इच्छा से कोई गतिविधि कर रहे थे। लेकिन दूसरी तरफ अगर स्कूल में शिक्षक या प्रबंधन बच्चों से ऐसा काम करवा रहे हों, तो यह गंभीर प्रशासनिक और बाल-अधिकार संबंधी सवाल बन जाता है।
रेत और बजरी उठाते बच्चों का मामला भी इसी बहस को और गंभीर बनाता है। अक्टूबर 2025 में देहरादून के एक स्कूल से सामने आए वीडियो में यूनिफॉर्म पहने छात्र रेत और बजरी उठाते दिखाई दिए थे। रिपोर्टों के मुताबिक स्कूल में निर्माण कार्य चल रहा था और बच्चों से निर्माण सामग्री ढुलवाने का आरोप लगा। मामले पर शिक्षा विभाग ने कार्रवाई करते हुए प्रधानाध्यापक को निलंबित किया और जांच के आदेश दिए थे। विभागीय कार्रवाई में बच्चों से गैर-शैक्षणिक कार्य कराने को गंभीर मामला बताया गया था।
यहां यह समझना जरूरी है कि स्कूल में बच्चों को श्रम, स्वच्छता और जिम्मेदारी का महत्व समझाना और उनसे मजदूर की तरह काम करवाना एक ही चीज नहीं है। उदाहरण के लिए यदि शिक्षक बच्चों को अपना डेस्क व्यवस्थित करने, कक्षा में कूड़ा डस्टबिन में डालने या पौधों की देखभाल जैसी छोटी गतिविधियों में शामिल करते हैं, तो वह व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन निर्माण स्थल पर रेत-बजरी ढोना, ऊंचाई पर चढ़कर छज्जे की सफाई करना या गंदे टॉयलेट की सफाई करवाना अलग श्रेणी के जोखिम और जिम्मेदारी पैदा करता है।
अब सवाल आता है कि राइट टू एजुकेशन यानी RTE Act इस बारे में क्या कहता है। भारत में Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार दिया गया है। केंद्र सरकार के अनुसार RTE Act का उद्देश्य इसी आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना है।
RTE का मूल विचार यह है कि बच्चा स्कूल में पढ़ने के लिए आए, सुरक्षित वातावरण में शिक्षा हासिल करे और उसकी गरिमा तथा समानता का सम्मान हो। इसलिए अगर स्कूल का पूरा समय बच्चों से ऐसे काम करवाने में चला जाए जो उनकी पढ़ाई से संबंधित नहीं हैं, तो यह शिक्षा के उद्देश्य के खिलाफ जाता है। लेकिन कानूनी विश्लेषण करते समय हर गतिविधि को स्वतः “RTE Act का अपराध” कहना भी सही नहीं होगा।
RTE Act की धारा 17 विशेष रूप से कहती है कि किसी बच्चे को शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न का सामना नहीं करना चाहिए। उल्लंघन की स्थिति में संबंधित व्यक्ति के खिलाफ लागू सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। शिक्षा मंत्रालय के दिशानिर्देश भी स्कूलों में corporal punishment और mental harassment को प्रतिबंधित बताते हैं।
इसका मतलब यह है कि अगर किसी बच्चे को सजा देने के लिए जानबूझकर अपमानजनक, खतरनाक या मानसिक रूप से परेशान करने वाला काम कराया जाता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी बच्चे को पूरी कक्षा के सामने दंड के रूप में गंदा टॉयलेट साफ करने के लिए मजबूर करना सिर्फ “सफाई” नहीं रह जाता; उसमें मानसिक उत्पीड़न या गरिमा के उल्लंघन का सवाल भी उठ सकता है। अंतिम कानूनी निष्कर्ष हालांकि मामले के तथ्यों और जांच पर निर्भर करेगा।
RTE Rules में भी एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। नियमों में कहा गया है कि कमजोर और वंचित समूहों के बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव नहीं होना चाहिए। नियमों में कक्षा, मिड-डे मील, खेल मैदान, पेयजल और टॉयलेट सुविधाओं के इस्तेमाल के साथ-साथ टॉयलेट या कक्षाओं की सफाई के मामले में भी भेदभाव से सुरक्षा का उल्लेख है।
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे को उसकी जाति, वर्ग, धर्म या लिंग के आधार पर दूसरे बच्चों से अलग करके सफाई जैसे काम में न लगाया जाए। यानी अगर स्कूल में सभी बच्चों के लिए समान जिम्मेदारी वाली कोई गतिविधि भी हो, तब भी यह देखना जरूरी है कि किसी विशेष समुदाय या कमजोर वर्ग के बच्चों को ही बार-बार सफाई के काम में तो नहीं लगाया जा रहा।
यहां भारत के संविधान का समानता और गरिमा से जुड़ा व्यापक सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं है; वह बच्चे के सामाजिक और मानसिक विकास का भी स्थान है। अगर किसी बच्चे को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण गंदगी साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो मामला सिर्फ शिक्षा व्यवस्था का नहीं बल्कि भेदभाव और बाल गरिमा का भी हो सकता है।
स्कूल भवन की सुरक्षा का मुद्दा भी इस पूरे मामले में कम महत्वपूर्ण नहीं है। शहडोल के वीडियो में बच्चों को ऊंचाई पर चढ़कर छज्जे की सफाई करते दिखाए जाने पर इसलिए भी चिंता हुई क्योंकि गिरने या फिसलने का खतरा हो सकता है। शिक्षा मंत्रालय की स्कूल स्वच्छता संबंधी गाइडलाइन में भी स्कूल की छत, जल निकासी और छज्जों की जांच, दरारों तथा गिरने वाले हिस्सों की निगरानी जैसी बातों पर जोर दिया गया है।
RTE Act की धारा 19 के तहत स्कूल भवन और उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाओं के मानक भी निर्धारित हैं। इनमें सुरक्षित भवन, लड़के और लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट और अन्य आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं। 2026 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी स्कूलों के लिए RTE Act की धारा 19 के मानकों के अनुपालन पर जोर दिया गया और स्कूलों के टॉयलेट तथा वॉशिंग सुविधाओं की निगरानी के लिए जिला शिक्षा अधिकारियों की भूमिका को रेखांकित किया गया।
इसका सीधा मतलब है कि स्कूल की सफाई और रखरखाव को केवल बच्चों की जिम्मेदारी बनाकर छोड़ना व्यवस्था की जिम्मेदारी से बचने का रास्ता नहीं हो सकता। स्कूल प्रशासन और संबंधित सरकारी विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि भवन सुरक्षित हो, टॉयलेट उपयोग योग्य हों, पानी और स्वच्छता की व्यवस्था हो और बच्चों को पढ़ाई के लिए सुरक्षित माहौल मिले।
बाल श्रम कानून की बात करें तो Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Act, 2016 के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार या काम पर व्यापक प्रतिबंध है, जबकि 14 से 18 वर्ष के किशोरों को hazardous occupations और processes में काम करने से रोक दिया गया है। हालांकि स्कूल में किसी बच्चे द्वारा किया गया हर छोटा काम अपने आप कानूनी अर्थ में “employment” या “child labour” नहीं बन जाता। इसलिए किसी वायरल वीडियो को देखकर तुरंत बाल श्रम कानून के तहत अपराध घोषित करना भी कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि स्कूल प्रबंधन बच्चों से मनमाना काम करा सकता है। खासकर तब जब काम में शारीरिक जोखिम हो, पढ़ाई बाधित हो, बच्चे को अपमानित किया जा रहा हो या उसे किसी वयस्क मजदूर के स्थान पर लगाया जा रहा हो। ऐसे मामलों में शिक्षा विभाग, बाल संरक्षण तंत्र और परिस्थितियों के अनुसार अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई की संभावना हो सकती है।
यहां एक और महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है—“स्वच्छता शिक्षा” और “सफाई का श्रम”। स्कूल बच्चों को स्वच्छता का महत्व जरूर सिखा सकता है। बच्चे अपने आसपास कचरा न फैलाएं, हाथ धोएं, पानी बचाएं, पौधों की देखभाल करें और कक्षा को व्यवस्थित रखें, यह सब शिक्षा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन बच्चों से गंदे टॉयलेट की सफाई करवाना या ऊंचाई पर चढ़कर भवन की सफाई करवाना ऐसी गतिविधियां हैं जिनमें स्वास्थ्य और सुरक्षा का सवाल जुड़ जाता है।
विशेषज्ञों के लिए यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि स्कूलों में सफाई के लिए उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। अगर स्कूल में सफाई के लिए बजट, कर्मचारी या स्थानीय निकाय की व्यवस्था है, फिर भी बच्चों से नियमित रूप से सफाई कराई जा रही है, तो प्रशासन को यह देखना चाहिए कि संसाधनों का इस्तेमाल सही तरीके से क्यों नहीं हो रहा।
मध्य प्रदेश के मंडला और शहडोल की घटनाएं इसी वजह से व्यापक बहस पैदा करती हैं। एक तरफ सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की खबरें आती हैं, दूसरी तरफ कई जगह बच्चों को ही उन कमियों की भरपाई करते हुए देखा जाता है। यह व्यवस्था की जिम्मेदारी बच्चों पर डालने जैसा प्रतीत हो सकता है, हालांकि हर मामले में वास्तविक जिम्मेदारी जांच के बाद ही तय की जानी चाहिए।
अभिभावकों के लिए भी ऐसे मामलों में चुप रहना जरूरी नहीं है। अगर किसी बच्चे से स्कूल में खतरनाक या अपमानजनक काम कराया जा रहा है, तो अभिभावक स्कूल प्रबंधन, प्रधानाध्यापक, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी या जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत कर सकते हैं। गंभीर बाल अधिकार मामलों में बाल अधिकार आयोग या संबंधित बाल संरक्षण तंत्र से भी संपर्क किया जा सकता है।
बच्चों को भी यह समझना चाहिए कि स्कूल में कोई शिक्षक अगर उनसे ऐसा काम करवाता है जिससे उन्हें डर या खतरा महसूस हो, तो वे अपने माता-पिता या भरोसेमंद वयस्क को इसकी जानकारी दें। खासकर ऊंचाई पर चढ़ना, निर्माण सामग्री उठाना, बिजली से जुड़ा काम करना या किसी खतरनाक जगह की सफाई करना बच्चों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
शहडोल के मामले में जांच इसलिए महत्वपूर्ण है कि वायरल वीडियो में दिखाई दे रही गतिविधि के पीछे वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, यह आधिकारिक जांच से सामने आएगा। अगर बच्चों को शिक्षक के निर्देश पर छज्जे पर चढ़ाया गया था, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अगर किसी ने अपनी इच्छा से सफाई शुरू की थी, तब भी स्कूल प्रशासन को यह देखना होगा कि बच्चों को खतरनाक जगह पर ऐसा करने से क्यों नहीं रोका गया। दोनों परिस्थितियों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च होनी चाहिए।
इसी तरह मंडला और गढ़वा के मामलों में भी जांच का उद्देश्य केवल किसी शिक्षक को दोषी ठहराना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पता लगाना होना चाहिए कि स्कूल की सफाई व्यवस्था क्यों विफल हुई, बच्चों को काम करने की जरूरत क्यों पड़ी और ऐसी घटनाएं दोबारा न हों इसके लिए क्या व्यवस्था बनाई गई। गढ़वा मामले में प्रशासन ने जांच के आदेश दिए थे और हेडमास्टर ने बच्चों द्वारा स्वयं सफाई किए जाने की बात कही थी, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच पर निर्भर करता है।
स्कूल में बच्चे सबसे पहले विद्यार्थी हैं। उनसे जिम्मेदारी, अनुशासन और स्वच्छता सीखने की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन उन्हें स्कूल की व्यवस्थागत कमियों का समाधान करने वाला श्रमिक नहीं बनाया जा सकता। किताब, कॉपी, खेल, प्रयोगशाला, शिक्षक और सुरक्षित कक्षा—ये स्कूल जीवन के मूल हिस्से हैं। झाड़ू, टॉयलेट ब्रश, फावड़ा या निर्माण सामग्री तभी हाथ में होनी चाहिए जब गतिविधि स्पष्ट रूप से सुरक्षित, शैक्षणिक और उम्र के अनुरूप हो।
सबसे बड़ी चिंता तब होती है जब बच्चे ऐसी गतिविधि इसलिए करते दिखें क्योंकि स्कूल के पास कोई दूसरा इंतजाम नहीं है। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में नाम लिखवा देने का नाम नहीं है। बच्चे को ऐसा वातावरण मिलना भी जरूरी है जिसमें वह बिना भेदभाव, डर और अनावश्यक जोखिम के सीख सके।
देश में बाल श्रम को कम करने और स्कूलों में बच्चों की भागीदारी बढ़ाने के बावजूद ऐसे वीडियो यह याद दिलाते हैं कि कानून और जमीन पर व्यवस्था के बीच अभी भी अंतर हो सकता है। UNICEF की 2024 की रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में बाल श्रम और स्कूली शिक्षा के बीच संबंध अभी नीति और क्रियान्वयन के लिहाज से महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है।
इसलिए वायरल वीडियो का सबसे बड़ा संदेश सिर्फ इतना नहीं है कि “बच्चे सफाई कर रहे थे।” असली सवाल यह है कि स्कूल में बच्चे किस उद्देश्य से हैं और उनके समय, सुरक्षा तथा गरिमा की जिम्मेदारी किसकी है?
शहडोल में छज्जे की सफाई करते बच्चों का वीडियो हो, मंडला में टॉयलेट साफ करते बच्चे, गढ़वा में शौचालय और सामान से जुड़े काम करते छात्र या देहरादून में रेत-बजरी उठाते बच्चे—हर घटना की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए सभी मामलों को एक ही कानूनी श्रेणी में रखना ठीक नहीं होगा। लेकिन इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट है कि स्कूल प्रशासन को बच्चों से गैर-शैक्षणिक और जोखिम भरे काम कराने के बजाय सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।
राइट टू एजुकेशन का उद्देश्य बच्चे को सिर्फ स्कूल की चारदीवारी के भीतर रखना नहीं, बल्कि उसे शिक्षा का वास्तविक अवसर देना है। अगर बच्चा कक्षा में बैठने के बजाय नियमित रूप से सफाई, ढुलाई या दूसरे श्रम वाले काम में लगा है, तो उसकी शिक्षा प्रभावित होगी। और अगर ऐसा काम जोखिमपूर्ण या अपमानजनक तरीके से कराया जा रहा है, तो मामला और गंभीर हो जाता है।
अंततः किसी भी स्कूल की सफलता का पैमाना केवल परीक्षा का रिजल्ट नहीं होना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां बच्चे कितने सुरक्षित हैं, उन्हें सम्मान मिलता है या नहीं, स्कूल भवन सुरक्षित है या नहीं, टॉयलेट और पानी की व्यवस्था कैसी है और क्या बच्चों को उनके सीखने के समय का पूरा अधिकार मिल रहा है।
बच्चों के हाथ में झाड़ू या फावड़ा दिखना अपने आप में हर बार अपराध साबित नहीं करता, लेकिन जब बच्चों से पढ़ाई की जगह नियमित, जोखिमपूर्ण या अपमानजनक गैर-शैक्षणिक श्रम कराया जाए, तो यह शिक्षा व्यवस्था और बाल अधिकारों पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है। ऐसे मामलों में वायरल वीडियो के आधार पर फैसला सुनाने के बजाय निष्पक्ष जांच, बच्चों की सुरक्षा और जिम्मेदारी तय करना सबसे जरूरी कदम होना चाहिए।
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