अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव अब केवल टैरिफ और ट्रेड टेबल तक सीमित नहीं रह गया है। दोनों देशों के नेताओं और अधिकारियों के बीच बयानबाजी भी लगातार तीखी होती जा रही है। इसी कड़ी में अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पर निशाना साधते हुए एक बेहद तीखी तुलना की। बेसेंट ने कनाडा को एक छोटे कुत्ते यानी Dachshund से तुलना करते हुए कहा कि वह बड़े कुत्ते को लगातार भौंककर परेशान करता था। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने कनाडा को एक बेहद अच्छा ट्रेड डील ऑफर किया था, लेकिन कार्नी ने उसे स्वीकार करने के बजाय बातचीत से पीछे हटना चुना।
बेसेंट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका और कनाडा के बीच अगस्त में हुई गहन व्यापार वार्ता किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 21 अगस्त को अमेरिका के साथ ट्रेड नेगोशिएशन को निलंबित करने का फैसला किया था। कनाडाई सरकार का कहना था कि बातचीत के अंतिम चरण में अमेरिका की ओर से कुछ नई शर्तें सामने आईं, जिन्हें ओटावा ने अनुचित और कनाडा के आर्थिक हितों के खिलाफ माना। कार्नी ने साफ कहा था कि कनाडा किसी भी कीमत पर समझौता करने के बजाय अपने उद्योगों, श्रमिकों और आर्थिक संप्रभुता की रक्षा करेगा।
स्कॉट बेसेंट की ओर से की गई ‘छोटे कुत्ते’ वाली तुलना इसी विवाद को और ज्यादा व्यक्तिगत और आक्रामक बना रही है। रिपोर्ट के मुताबिक बेसेंट ने अपने उदाहरण में एक 110 पाउंड के German Shepherd और एक छोटे Dachshund की कहानी सुनाई। उनके मुताबिक छोटा कुत्ता लगातार बड़े कुत्ते को भौंककर परेशान करता था और लंबे समय तक बड़ा कुत्ता उसे नजरअंदाज करता रहा। लेकिन एक दिन बड़े कुत्ते ने प्रतिक्रिया दी। बेसेंट ने इसी उदाहरण को कनाडा और अमेरिका के रिश्ते से जोड़ते हुए मार्क कार्नी की रणनीति पर निशाना साधा।
यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक तंज नहीं है, बल्कि अमेरिका और कनाडा के बीच बिगड़ते व्यापारिक रिश्तों की गंभीरता को भी दिखाता है। दोनों देश दशकों से एक-दूसरे के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में रहे हैं। ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, कृषि, स्टील, एल्युमिनियम, मशीनरी और उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर सेवाओं तक दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर काफी निर्भर हैं। इसलिए जब दोनों देशों के बीच टैरिफ बढ़ते हैं या व्यापार समझौते की बातचीत रुकती है, तो उसका असर सिर्फ सरकारों पर नहीं बल्कि कंपनियों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
अगस्त में हुई बातचीत की कहानी भी काफी दिलचस्प रही। 18 अगस्त को कनाडाई प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा था कि अमेरिका और कनाडा के बीच बातचीत में काफी प्रगति हुई है और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम आगे बढ़ रहा है। उस समय अमेरिका ने कुछ कनाडाई उत्पादों पर प्रस्तावित 50% टैरिफ को 21 अगस्त तक टालने पर सहमति दी थी, क्योंकि दोनों पक्ष समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। इससे यह उम्मीद बनी थी कि दोनों देश आखिरी समय में किसी व्यापक व्यापार समझौते पर पहुंच सकते हैं।
लेकिन यह उम्मीद ज्यादा देर तक कायम नहीं रही। 21 अगस्त को कार्नी ने घोषणा की कि कनाडा बातचीत को निलंबित कर रहा है और उसकी वार्ता टीम वापस ओटावा लौटेगी। कनाडा का कहना था कि आखिरी चरण में अमेरिकी प्रस्तावों में ऐसे बदलाव किए गए जो पहले हुई प्रगति को कमजोर करते थे। कार्नी ने कहा कि कनाडा का लक्ष्य हमेशा ऐसा समझौता करना था जो कनाडाई व्यवसायों और श्रमिकों को स्थिरता दे, न कि केवल जल्दबाजी में कोई डील साइन करना।
कार्नी ने अगले दिन अपने भाषण में कहा कि कनाडा ने बातचीत के दौरान कई समझौते करने की इच्छा दिखाई थी। कनाडा स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपने जवाबी टैरिफ को हटाने के लिए भी तैयार था, बशर्ते अमेरिका अपने टैरिफ को पर्याप्त रूप से कम करता और ऐसा ढांचा बनता जिससे कनाडाई कंपनियों को अमेरिकी बाजार में स्थिर और आर्थिक रूप से व्यवहार्य पहुंच मिलती। लेकिन कनाडा कुछ ऐसी शर्तों पर सहमत नहीं हुआ जिन्हें वह अपनी संप्रभुता और घरेलू उद्योगों के लिए नुकसानदेह मानता था।
कनाडा के मुताबिक बातचीत में सिर्फ टैरिफ ही मुद्दा नहीं था। ऑटोमोबाइल सेक्टर, कनाडा की सांस्कृतिक और फ्रेंच भाषा से जुड़ी नीतियां, सप्लाई मैनेजमेंट और भविष्य में कनाडा के दूसरे देशों के साथ व्यापार समझौते करने की स्वतंत्रता जैसे विषय भी बातचीत में महत्वपूर्ण थे। कार्नी का कहना था कि कनाडा अपनी आर्थिक नीति पर बाहरी नियंत्रण स्वीकार नहीं कर सकता।
कार्नी ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी वार्ता का रवैया ऐसा था जिससे कनाडा के कुछ महत्वपूर्ण उद्योग या तो अमेरिकी कंपनियों की सहायक इकाइयों जैसे बन जाते या धीरे-धीरे कनाडा में उनका अस्तित्व कमजोर हो जाता। 1 सितंबर को कार्नी ने कहा कि अमेरिकी वार्ताकारों का रुख कनाडा के ऑटो सेक्टर जैसे उद्योगों को अमेरिकी कंपनियों की subsidiaries बनाने या उन्हें धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में ले जा सकता था। हालांकि यह कनाडाई प्रधानमंत्री का आकलन और आरोप है, जिसे अमेरिकी पक्ष स्वीकार नहीं करता।
दूसरी तरफ अमेरिका का नजरिया बिल्कुल अलग है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वॉशिंगटन ने कनाडा को अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में सबसे बेहतर शर्तों में से एक देने की कोशिश की थी। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने अगस्त में कहा था कि कनाडा ने आखिरी समय में नई मांगें रखीं और पहले बनी सहमति का संतुलन बिगाड़ दिया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि कनाडा को जिस स्तर की बाजार पहुंच और टैरिफ राहत मिल सकती थी, वह दूसरे बड़े निर्यातकों की तुलना में काफी बेहतर होती।
यही वह मुद्दा है जिसे अब स्कॉट बेसेंट ने अपनी टिप्पणी में उठाया है। उनका तर्क है कि अमेरिका ने कनाडा को एक अच्छा सौदा देने की कोशिश की, लेकिन कार्नी ने घरेलू राजनीति के कारण उसे स्वीकार नहीं किया। यानी अमेरिकी पक्ष के मुताबिक बातचीत आर्थिक फायदे के करीब पहुंच चुकी थी, लेकिन कनाडाई नेतृत्व ने राजनीतिक कारणों से पीछे हटना चुना। कनाडा इस दावे को स्वीकार नहीं करता और कहता है कि समस्या अमेरिका की आखिरी समय की शर्तों और भविष्य की व्यापारिक स्थिरता को लेकर थी।
इस विवाद को समझने के लिए अमेरिका-कनाडा व्यापार संबंधों के आकार को देखना जरूरी है। कनाडा का अमेरिका के साथ व्यापार सिर्फ कुछ उत्पादों तक सीमित नहीं है। ऊर्जा क्षेत्र में कनाडा अमेरिका को बड़ी मात्रा में तेल, प्राकृतिक गैस और बिजली की आपूर्ति करता है। कारों और ऑटो पार्ट्स की सप्लाई चेन दोनों देशों में कई बार सीमा पार करती है। इसका मतलब है कि किसी एक देश द्वारा लगाया गया टैरिफ दूसरे देश की कंपनियों की लागत और प्रतिस्पर्धा पर भी असर डाल सकता है।
मार्क कार्नी ने अपने 22 अगस्त के भाषण में इसी पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि अमेरिका का कनाडा के साथ व्यापार घाटा देखने का तरीका अधूरा है क्योंकि अमेरिका कनाडा से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक कनाडा अमेरिका के प्राकृतिक गैस आयात का 99%, बिजली आयात का 85% और कच्चे तेल आयात का लगभग 60% उपलब्ध कराता है। कार्नी ने यह भी कहा कि कनाडा अमेरिकी सामान और सेवाओं का एक बड़ा ग्राहक है।
यानी दोनों देशों के बीच आर्थिक निर्भरता इतनी गहरी है कि लंबा व्यापार युद्ध दोनों के लिए महंगा हो सकता है। यही कारण है कि अगस्त में बातचीत टूटने के बाद भी दोनों पक्षों ने भविष्य में फिर से बातचीत की संभावना पूरी तरह बंद नहीं की है।
3 सितंबर को कार्नी ने कहा कि कनाडा अभी भी अमेरिका के साथ ऐसा व्यापार समझौता करने के लिए तैयार है जिससे दोनों देशों को फायदा हो। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका एक स्थिर और विश्वसनीय समझौते के लिए तैयार होता है तो कनाडा फिर बातचीत की मेज पर बैठ सकता है। कार्नी ने यह भी संकेत दिया कि हाल के दिनों में अमेरिकी रुख में कुछ नरमी दिखाई दी है, खासकर कनाडा की भाषा और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को लेकर।
इसका मतलब है कि अगस्त में बातचीत टूटने के बावजूद दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। समस्या यह है कि दोनों पक्षों की शुरुआती स्थिति अभी भी काफी अलग है। अमेरिका बेहतर बाजार पहुंच और टैरिफ नीति पर अपना नियंत्रण चाहता है, जबकि कनाडा चाहता है कि किसी भी नए समझौते में उसके उद्योगों और संप्रभु निर्णय लेने की क्षमता की सुरक्षा हो।
कार्नी ने हाल के दिनों में अमेरिकी प्रशासन से यह भी कहा है कि वह ‘गंभीर’ तरीके से बातचीत करे और सोशल मीडिया पर बयानबाजी तथा राजनीतिक तंज से बचा जाए। उन्होंने अमेरिका से कहा कि अगर वह व्यापार वार्ता फिर शुरू करना चाहता है तो उसे गंभीर चर्चा के लिए तैयार होना होगा।
इसके उलट अमेरिकी अधिकारियों की बयानबाजी में अभी भी सख्त रवैया दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कनाडा पर दबाव बनाए रखा है और कनाडाई नेतृत्व के साथ व्यापार विवाद को लेकर कई बार कड़े बयान दिए हैं। इस माहौल में बेसेंट का ‘Dachshund’ वाला बयान दोनों देशों के बीच राजनीतिक तापमान को और बढ़ाता दिखाई दे रहा है।
अमेरिका और कनाडा के बीच टैरिफ विवाद का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 8 सितंबर है। कनाडा ने अगस्त में अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ के जवाब में डॉलर-फॉर-डॉलर जवाबी टैरिफ की घोषणा की थी। कनाडाई सरकार के मुताबिक लगभग 28 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाया जाना है। यह कदम दोनों देशों के बीच व्यापार तनाव को और बढ़ा सकता है।
अगर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक टैरिफ युद्ध चलता है तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा। व्यापारिक कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कुछ हद तक खुद वहन कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय में इसका असर उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। ऑटोमोबाइल, निर्माण सामग्री, कृषि उपकरण और रोजमर्रा की कुछ वस्तुओं की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से ऑटो सेक्टर इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका और कनाडा में कार निर्माण की सप्लाई चेन दशकों से आपस में जुड़ी हुई है। किसी कार का एक हिस्सा कनाडा में बन सकता है, दूसरा अमेरिका में और फिर अंतिम असेंबली किसी तीसरे स्थान पर हो सकती है। ऐसे में सीमा पार हर चरण पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
कनाडा के लिए अमेरिका का बाजार बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन कार्नी सरकार अब दूसरे देशों के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने की कोशिश भी कर रही है। कनाडा का कहना है कि वह अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एशिया, यूरोप और दूसरे बाजारों में व्यापारिक साझेदारी बढ़ाएगा। कार्नी ने अगस्त में कहा था कि कनाडा के मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए उसे करीब 1.5 अरब उपभोक्ताओं तक preferential access प्राप्त है और सरकार इसे और बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
यही रणनीति अमेरिका के लिए भी एक चुनौती बन सकती है। यदि कनाडा लंबे समय में अपने निर्यात बाजारों को विविध बनाता है तो अमेरिकी बाजार पर उसकी निर्भरता कम हो सकती है। लेकिन दूसरी ओर अमेरिका के लिए भी कनाडा कोई सामान्य व्यापार साझेदार नहीं है। ऊर्जा और कच्चे माल की सप्लाई के साथ-साथ कनाडा अमेरिकी राज्यों के लिए एक बड़ा ग्राहक है।
इसलिए ‘कौन जीतेगा’ वाला सवाल इस व्यापार विवाद में आसान नहीं है। दोनों देशों के पास एक-दूसरे पर आर्थिक दबाव डालने के साधन हैं, लेकिन दोनों की अर्थव्यवस्थाएं भी एक-दूसरे से जुड़ी हैं। यही कारण है कि व्यापार युद्ध का लंबा खिंचना दोनों के लिए महंगा साबित हो सकता है।
बेसेंट की ‘भौंकने वाला छोटा कुत्ता’ वाली टिप्पणी भले ही राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हो, लेकिन इसके पीछे चल रही असली कहानी कहीं ज्यादा गंभीर है। अगस्त में दोनों देश समझौते के काफी करीब दिखाई दे रहे थे, फिर आखिरी समय में बातचीत टूट गई। अब अमेरिका कह रहा है कि कनाडा ने बेहतर डील ठुकराई, जबकि कनाडा का कहना है कि अमेरिका ने अंतिम समय में ऐसी शर्तें रखीं जिन्हें स्वीकार करना उसके आर्थिक और राजनीतिक हित में नहीं था।
आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों सरकारें बयानबाजी से आगे बढ़कर कितनी जल्दी व्यावहारिक बातचीत शुरू करती हैं। कार्नी ने 3 सितंबर को साफ संकेत दिया है कि कनाडा बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वह ऐसा समझौता चाहता है जिसमें स्थिरता और भरोसे की गारंटी हो। अमेरिका अगर इस मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार होता है और दोनों पक्ष टैरिफ, ऑटो सेक्टर, कृषि, संस्कृति तथा भविष्य के व्यापार समझौतों से जुड़े विवादों पर समझौता कर पाते हैं, तो बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है।
फिलहाल अमेरिका और कनाडा के रिश्ते एक असामान्य दौर से गुजर रहे हैं। दो पड़ोसी देशों के बीच दशकों पुराने आर्थिक संबंध होने के बावजूद राजनीतिक बयानबाजी बेहद तीखी हो गई है। एक तरफ अमेरिका कनाडा पर बेहतर समझौता ठुकराने का आरोप लगा रहा है, दूसरी तरफ कनाडा का नेतृत्व कह रहा है कि वह किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेगा जो उसके उद्योगों और संप्रभुता को कमजोर करे। ऐसे में स्कॉट बेसेंट का ‘Dachshund’ वाला बयान केवल एक वायरल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस गहरे मतभेद का प्रतीक है जो इस समय अमेरिका-कनाडा व्यापार संबंधों में दिखाई दे रहा है।
अब सबकी नजर 8 सितंबर से लागू होने वाले कनाडाई जवाबी टैरिफ और उसके बाद दोनों देशों के अगले कदम पर रहेगी। अगर टैरिफ बढ़ते हैं और बयानबाजी जारी रहती है तो व्यापार विवाद और गहरा सकता है। लेकिन अगर दोनों पक्ष आर्थिक नुकसान को देखते हुए फिर बातचीत की मेज पर लौटते हैं, तो अगस्त में टूटी डील की जगह एक नए समझौते की कोशिश शुरू हो सकती है। फिलहाल कार्नी ने बातचीत का दरवाजा खुला रखा है, जबकि अमेरिकी प्रशासन की तरफ से दबाव और आलोचना जारी है।
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