भगवान शिव सनातन धर्म में सबसे अधिक पूजनीय देवताओं में से एक हैं। उन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, नीलकंठ, पशुपतिनाथ और त्रिलोचन जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। श्रावण मास, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन करोड़ों श्रद्धालु शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और भगवान शिव की आराधना करते हैं। लेकिन शिव पूजा को लेकर लोगों के मन में कई प्रश्न भी रहते हैं। जैसे – क्या महिलाएं शिवलिंग को स्पर्श कर सकती हैं? घर में शिवलिंग रखना चाहिए या नहीं? शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद खाना उचित है या नहीं?
धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर शिव पुराण, तथा विभिन्न परंपराओं में इन विषयों का उल्लेख मिलता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों, मंदिरों और परंपराओं में पूजा-पद्धति के नियम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक परंपरा को सभी स्थानों पर समान रूप से लागू नहीं माना जाता।
भगवान शिव की उपासना का मूल आधार श्रद्धा, भक्ति और पवित्र भाव माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान शिव अत्यंत सरल स्वभाव के देवता हैं और सच्ची भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसलिए पूजा के बाहरी नियमों के साथ-साथ मन की पवित्रता को भी विशेष महत्व दिया गया है।
सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि क्या महिलाएं शिवलिंग को छू सकती हैं? इस विषय पर अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग मत देखने को मिलते हैं। कई मंदिरों और शैव परंपराओं में महिलाओं को पुरुषों की तरह शिवलिंग का स्पर्श कर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने की अनुमति होती है। वहीं कुछ मंदिरों या स्थानीय परंपराओं में महिलाओं के लिए शिवलिंग को सीधे स्पर्श न करने की परंपरा भी प्रचलित है। इसलिए श्रद्धालुओं को संबंधित मंदिर के नियमों का सम्मान करना चाहिए।
महिलाओं के मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान पूजा को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं। इस विषय पर सभी संप्रदायों की एक जैसी मान्यता नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय अपने परिवार की परंपरा, स्थानीय धार्मिक रीति और अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक की सलाह का पालन करना उचित माना जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या घर में शिवलिंग रखना चाहिए? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर में शिवलिंग रखा जा सकता है, लेकिन उसके साथ नियमित पूजा और उचित देखभाल का महत्व बताया गया है। कई परंपराओं में छोटे आकार का शिवलिंग स्थापित करने की सलाह दी जाती है ताकि उसकी नियमित पूजा, अभिषेक और स्वच्छता बनाए रखना आसान हो।
यदि घर में शिवलिंग स्थापित किया जाए तो प्रतिदिन या अपनी क्षमता के अनुसार नियमित रूप से जल अर्पित करना, स्वच्छता बनाए रखना और श्रद्धापूर्वक पूजा करना उचित माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति नियमित पूजा करने में सक्षम नहीं है, तो केवल सजावट के उद्देश्य से शिवलिंग स्थापित करने के बजाय मंदिर में दर्शन करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
पूजा के दौरान शिवलिंग पर सामान्यतः जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी, शक्कर, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। हालांकि किसी भी सामग्री का उपयोग स्थानीय परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार करना चाहिए।
एक अन्य प्रश्न यह भी रहता है कि क्या शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है? इस विषय पर भी विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं। कई परंपराओं में शिवलिंग पर सीधे अर्पित की गई कुछ सामग्रियों को प्रसाद के रूप में ग्रहण न करने की मान्यता है, जबकि मंदिर में भगवान शिव को अर्पित कर अलग से वितरित किया गया प्रसाद श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। इसलिए जिस मंदिर या परंपरा में पूजा की जा रही हो, वहां के नियमों का पालन करना सबसे उचित माना जाता है।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि भगवान शिव की पूजा में सबसे अधिक महत्व श्रद्धा, संयम, सत्य और सदाचार का है। केवल बाहरी विधि-विधान ही पर्याप्त नहीं माने जाते, बल्कि व्यक्ति का आचरण भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है।
शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव को करुणा, त्याग, वैराग्य और समभाव का प्रतीक बताया गया है। वे सभी जीवों के कल्याण की भावना रखने वाले देव माने जाते हैं। इसी कारण उनकी पूजा में अहंकार छोड़कर विनम्रता के साथ आराधना करने पर विशेष बल दिया गया है।
श्रावण मास में लाखों श्रद्धालु सोमवार का व्रत रखते हैं और शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। हालांकि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यता के अनुसार पूजा कर सकता है।
यदि किसी श्रद्धालु को किसी विशेष पूजा-विधि या धार्मिक नियम को लेकर संदेह हो, तो संबंधित मंदिर के पुजारी या किसी योग्य धर्माचार्य से मार्गदर्शन लेना बेहतर माना जाता है। इससे परंपरा के अनुसार सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
भगवान शिव की पूजा का मूल संदेश यह है कि मन में श्रद्धा, जीवन में सादगी और व्यवहार में करुणा हो। धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए और बिना किसी मतभेद को बढ़ावा दिए यदि पूजा की जाए, तो वही सच्ची शिव भक्ति मानी जाती है।
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