सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी सुरक्षा हट सकती है? सरकार कर रही नियमों की समीक्षा

भारत में सोशल मीडिया के नियमों में बड़ा बदलाव हो सकता है। केंद्र सरकार फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X जैसे प्लेटफॉर्म को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा यानी ‘सेफ हार्बर’ पर दोबारा विचार कर रही है। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इन कंपनियों को यूजर्स की ओर से पोस्ट किए गए कंटेंट के मामले में पहले से ज्यादा कानूनी जवाबदेही उठानी पड़ सकती है।

अभी तक सामान्य तौर पर सोशल मीडिया कंपनियों को केवल इस वजह से सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता कि किसी यूजर ने उनके प्लेटफॉर्म पर कोई पोस्ट, फोटो, वीडियो या कमेंट अपलोड कर दिया है। हालांकि यह सुरक्षा पूरी तरह बिना शर्त नहीं है। कंपनियों को कानून के तहत तय नियमों और सरकारी निर्देशों का पालन करना होता है।

सरकार की चिंता यह है कि सोशल मीडिया कंपनियां अब केवल यूजर्स का कंटेंट एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम नहीं करतीं। उनके एल्गोरिदम तय करते हैं कि किस व्यक्ति को कौन-सी पोस्ट दिखाई जाएगी, कौन-सा वीडियो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा और किस कंटेंट को कम या ज्यादा प्राथमिकता मिलेगी। इसी वजह से सरकार यह सवाल उठा रही है कि जब प्लेटफॉर्म कंटेंट की पहुंच और लोकप्रियता को प्रभावित करते हैं, तो उन्हें उसकी जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग कैसे रखा जा सकता है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अभी कानूनी सुरक्षा हटाने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सरकार के स्तर पर चर्चा और प्रस्ताव पर विचार की खबरें सामने आई हैं। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 6 नवंबर को सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही, बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा तथा एल्गोरिदम में पारदर्शिता पर जोर दिया, लेकिन उन्होंने सेफ हार्बर हटाने के बारे में कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की।

सरकार किस नियम में बदलाव करने पर विचार कर रही है?

इस पूरे मामले के केंद्र में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 यानी सेक्शन 79 है। इसी धारा के तहत इंटरनेट पर सेवाएं देने वाले कई मध्यस्थ प्लेटफॉर्म को कुछ शर्तों के साथ कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे आम भाषा में ‘सेफ हार्बर’ कहा जाता है।

इसका मतलब है कि यदि कोई यूजर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी या आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करता है, तो केवल उस सामग्री के प्लेटफॉर्म पर मौजूद होने के कारण कंपनी को अपने आप उसका प्रकाशक या दोषी नहीं मान लिया जाता। प्राथमिक जिम्मेदारी सामान्य तौर पर उस व्यक्ति की होती है जिसने कंटेंट बनाया या अपलोड किया है।

लेकिन इस सुरक्षा के साथ शर्तें भी जुड़ी हुई हैं। प्लेटफॉर्म को निर्धारित सावधानी और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। यदि उसे किसी गैरकानूनी सामग्री के बारे में वैध सरकारी आदेश या अदालत का निर्देश मिलता है, तो उसे लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी पड़ सकती है। कानून के तहत जरूरी शर्तों का पालन नहीं करने पर प्लेटफॉर्म अपनी सुरक्षा खो सकता है।

सरकार अब यह जांच रही है कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों को वही सुरक्षा मिलनी चाहिए जो उन सेवाओं को मिलती है जो मुख्य रूप से संदेश या डेटा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं। चर्चा में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, टेलीकॉम कंपनियों और कुछ पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग सेवाओं जैसे उदाहरण सामने आए हैं।

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जिम्मेदारी बढ़ने का कारण क्या है?

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर हर दिन बड़ी संख्या में फोटो, वीडियो, रील्स, कमेंट और दूसरी पोस्ट अपलोड होती हैं। लेकिन यूजर को ये सभी पोस्ट एक ही क्रम में नहीं दिखाई जातीं।

प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम यूजर की पसंद, उसकी पिछली गतिविधियों, देखे गए वीडियो, लाइक, कमेंट और अन्य संकेतों के आधार पर कंटेंट चुनते हैं। इसी प्रक्रिया को कंटेंट रिकमेंडेशन या एल्गोरिदम आधारित सुझाव कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति इंस्टाग्राम पर लगातार क्रिकेट के वीडियो देखता है, तो उसे आगे भी क्रिकेट से जुड़ी रील्स ज्यादा दिखाई जा सकती हैं। इसी तरह किसी विषय पर वायरल हो रही पोस्ट को प्लेटफॉर्म ज्यादा यूजर्स तक पहुंचा सकता है।

सरकार के सामने सवाल यह है कि यदि किसी प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम किसी भ्रामक, आपत्तिजनक या गैरकानूनी पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुंचाने में भूमिका निभाता है, तो क्या कंपनी को भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए?

सरकारी चर्चा में यह तर्क सामने आया है कि ऐसे प्लेटफॉर्म अब केवल निष्क्रिय माध्यम नहीं रह गए हैं। वे कंटेंट की रैंकिंग, प्रचार और दृश्यता को प्रभावित करते हैं। इसलिए उनकी कानूनी जिम्मेदारी के मौजूदा ढांचे की समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है।

X और यूट्यूब पर भी पड़ सकता है असर

प्रस्तावित बदलाव केवल फेसबुक और इंस्टाग्राम तक सीमित नहीं रह सकता। रिपोर्टों में यूट्यूब और एलन मस्क के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X का भी उल्लेख किया गया है।

यूट्यूब पर यूजर्स वीडियो अपलोड करते हैं। इसके बाद प्लेटफॉर्म का रिकमेंडेशन सिस्टम दर्शकों की रुचि के आधार पर वीडियो सुझाता है। कई बार किसी वीडियो को लाखों लोगों तक पहुंचाने में प्लेटफॉर्म की सिफारिश प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

X पर भी पोस्ट, तस्वीरें, वीडियो और दूसरे यूजर कंटेंट साझा किए जाते हैं। यहां ट्रेंडिंग विषय, रिपोस्ट और रिकमेंडेशन सिस्टम किसी पोस्ट की पहुंच बढ़ा सकते हैं।

यदि कानून में बदलाव होता है, तो इन कंपनियों को यह देखना पड़ सकता है कि उनके एल्गोरिदम किस तरह कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं और शिकायत मिलने पर वे कितनी जल्दी कार्रवाई करते हैं।

हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि प्रस्ताव लागू होने पर हर प्लेटफॉर्म पर एक जैसे नियम लागू होंगे या अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाएगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि कानूनी जिम्मेदारी किन परिस्थितियों में और किस सीमा तक तय की जाएगी।

सरकार को सोशल मीडिया से कौन-कौन सी शिकायतें हैं?

सरकार की चिंता केवल पोस्ट और कमेंट तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन धोखाधड़ी, डीपफेक, महिलाओं की तस्वीरों का गलत इस्तेमाल, बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाला कंटेंट और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में भी सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

डीपफेक का बढ़ता खतरा: डीपफेक ऐसी तकनीक से तैयार किया गया नकली वीडियो, फोटो या ऑडियो होता है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा या आवाज इस तरह इस्तेमाल की जाती है कि वह असली दिखाई दे। इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, गलत जानकारी फैलाने या धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है।

बिना सहमति निजी तस्वीरें साझा करना: किसी व्यक्ति की निजी या आपत्तिजनक तस्वीर या वीडियो उसकी अनुमति के बिना इंटरनेट पर डालना गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसी सामग्री तेजी से फैलने पर पीड़ित व्यक्ति के लिए उसे हटवाना मुश्किल हो सकता है।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा: सोशल मीडिया पर बच्चों को उनकी उम्र के लिहाज से अनुचित सामग्री दिखाई देने, ऑनलाइन शोषण और साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं भी चिंता का विषय हैं। सरकार चाहती है कि प्लेटफॉर्म बच्चों की सुरक्षा के लिए ज्यादा प्रभावी उपाय करें।

साइबर फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट: ठग सोशल मीडिया और मैसेजिंग सेवाओं के जरिए लोगों से संपर्क करते हैं। वे पुलिस, जांच एजेंसी या सरकारी अधिकारी बनकर डराते हैं और पैसे ऐंठने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में प्लेटफॉर्म की शिकायत व्यवस्था और संदिग्ध गतिविधियों पर कार्रवाई की गति महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार का तर्क है कि केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं हो सकता। कंपनियों को ऐसे नुकसान को रोकने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए।

यूजर्स को क्या फायदा हो सकता है?

यदि नियमों में बदलाव होता है और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ती है, तो आम यूजर्स को कुछ महत्वपूर्ण फायदे मिल सकते हैं।

सबसे पहले, डीपफेक और निजी तस्वीरों के दुरुपयोग जैसी शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई की व्यवस्था बन सकती है। अभी कई मामलों में पीड़ित को पुलिस या दूसरी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है। सरकार ऐसी व्यवस्था पर विचार कर रही है जिसमें प्रभावित व्यक्ति सीधे प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने का अनुरोध कर सके।

दूसरा फायदा शिकायतों के निपटारे से जुड़ा हो सकता है। यदि प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही तय होती है, तो यूजर्स को यह जानने में आसानी होगी कि उनकी शिकायत पर कब और कैसे कार्रवाई होगी।

तीसरा फायदा बच्चों और महिलाओं की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ा हो सकता है। कंपनियों को अपने सुरक्षा उपाय मजबूत करने, अनुचित सामग्री की पहचान बेहतर बनाने और शिकायतों पर संवेदनशीलता से कार्रवाई करने का दबाव बढ़ सकता है।

चौथा फायदा एल्गोरिदम की पारदर्शिता से जुड़ा है। यूजर को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उसे कौन-सा कंटेंट क्यों दिखाया जा रहा है और किसी पोस्ट की पहुंच किन कारणों से बढ़ रही है।

हालांकि ये संभावित फायदे हैं। इनका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अंतिम नियम कैसे बनाती है, शिकायत प्रक्रिया कितनी आसान रखती है और कंपनियां उसका पालन किस तरह करती हैं।

क्या हर यूजर की पोस्ट के लिए कंपनी जिम्मेदार होगी?

इस खबर को समझते समय सबसे जरूरी बात यही है कि कानूनी सुरक्षा हटाने की चर्चा का मतलब यह नहीं है कि हर पोस्ट के लिए कंपनी को अपने आप दोषी मान लिया जाएगा।

किसी व्यक्ति द्वारा अपलोड की गई सामग्री और प्लेटफॉर्म द्वारा उस सामग्री को सुझाने या बढ़ावा देने के बीच कानूनी अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, किसी यूजर ने अपनी निजी राय लिखी और उसे अपने दोस्तों के साथ साझा किया। दूसरी ओर, कोई प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के जरिए किसी विवादित वीडियो को बड़ी संख्या में अनजान यूजर्स तक पहुंचाता है। सरकार इसी तरह की परिस्थितियों में प्लेटफॉर्म की भूमिका पर विचार कर रही है।

लेकिन किसी पोस्ट का वायरल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कंपनी ने कानून तोड़ा है। यह देखना होगा कि प्लेटफॉर्म को सामग्री की जानकारी थी या नहीं, उसने क्या कदम उठाए, एल्गोरिदम ने उसकी पहुंच कैसे बढ़ाई और संबंधित कानून में जिम्मेदारी तय करने की शर्तें क्या हैं।

इसलिए प्रस्तावित बदलाव का वास्तविक स्वरूप बहुत महत्वपूर्ण होगा। यदि नियम अस्पष्ट हुए, तो कंपनियों, यूजर्स और अदालतों के सामने नए कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं।

क्या सरकार को संसद से कानून बदलवाना होगा?

धारा 79 सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का हिस्सा है। यदि सरकार इस धारा में बड़ा बदलाव करके सोशल मीडिया कंपनियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को हटाना या सीमित करना चाहती है, तो इसके लिए कानून में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है।

कानून में महत्वपूर्ण बदलाव के लिए संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होगा। प्रस्ताव का मसौदा तैयार करना, कानूनी पहलुओं की समीक्षा करना, संबंधित पक्षों से राय लेना और संसद में संशोधन लाना इस प्रक्रिया के संभावित हिस्से हो सकते हैं।

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक चर्चा शुरुआती चरण में है। सरकार ने ऐसा कोई अंतिम संशोधन लागू नहीं किया है जिसके आधार पर कहा जा सके कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X की मौजूदा कानूनी सुरक्षा समाप्त हो गई है।

सोशल मीडिया कंपनियों के सामने क्या चुनौतियां आएंगी?

यदि कानूनी सुरक्षा सीमित होती है, तो कंपनियों को अपने काम करने के तरीके में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

कंटेंट की जांच पर खर्च बढ़ सकता है: कंपनियों को पोस्ट, वीडियो और कमेंट की जांच के लिए ज्यादा कर्मचारियों, तकनीकी प्रणालियों और कानूनी विशेषज्ञों की जरूरत पड़ सकती है। अलग-अलग भाषाओं और स्थानीय संदर्भों को समझना भी बड़ी चुनौती होगी।

एल्गोरिदम में बदलाव करना पड़ सकता है: कंपनियों को यह समीक्षा करनी पड़ सकती है कि उनका रिकमेंडेशन सिस्टम किस तरह किसी पोस्ट को वायरल करता है। संवेदनशील या जोखिम वाले कंटेंट को बढ़ावा मिलने से रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय बनाए जा सकते हैं।

कानूनी मामलों की संख्या बढ़ सकती है: यदि प्लेटफॉर्म पर यूजर कंटेंट के लिए ज्यादा कानूनी जिम्मेदारी आती है, तो कंपनियों को अधिक शिकायतों, नोटिस और मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारत में उनके कानूनी और अनुपालन खर्च बढ़ सकते हैं।

छोटी कंपनियों पर दबाव: बड़ी टेक कंपनियों के पास कंटेंट मॉडरेशन और कानूनी टीमों के लिए ज्यादा संसाधन होते हैं। छोटे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए ऐसी व्यवस्था लागू करना महंगा साबित हो सकता है। इसलिए नियम बनाते समय कंपनियों के आकार और सेवा के प्रकार का ध्यान रखना जरूरी होगा।

क्या इससे सोशल मीडिया पर सेंसरशिप बढ़ सकती है?

इस प्रस्ताव को लेकर एक बड़ी चिंता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऑनलाइन सेंसरशिप से जुड़ी है।

यदि कंपनियों को हर यूजर पोस्ट के लिए कानूनी जोखिम महसूस होने लगे, तो वे विवाद से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा सामग्री हटाने का रास्ता अपना सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसी पोस्ट में सरकार की आलोचना, राजनीतिक टिप्पणी या सामाजिक मुद्दे पर तीखी राय हो सकती है। यदि प्लेटफॉर्म को डर हो कि ऐसी पोस्ट के कारण कानूनी कार्रवाई हो सकती है, तो वह सुरक्षित रहने के लिए उसे हटा सकता है।

इससे वैध विचारों और आलोचनात्मक बहस पर भी असर पड़ने की आशंका है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन जैसे डिजिटल अधिकारों से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है कि सेफ हार्बर हटाने से कंपनियां शिकायत या कानूनी जोखिम से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा कंटेंट हटाने लग सकती हैं।

दूसरी ओर, जवाबदेही बढ़ाने के समर्थकों का कहना है कि कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और कंटेंट वितरण के प्रभाव से पूरी तरह अलग नहीं रखा जा सकता। यदि किसी प्लेटफॉर्म की तकनीक किसी नुकसानदायक सामग्री को बड़े स्तर पर फैलाने में मदद करती है, तो उसकी भूमिका की जांच होनी चाहिए।

यही इस बहस का सबसे अहम पहलू है। नियम ऐसे होने चाहिए कि गैरकानूनी और नुकसानदायक सामग्री पर प्रभावी कार्रवाई हो, लेकिन वैध आलोचना, पत्रकारिता, व्यंग्य और आम नागरिकों की अभिव्यक्ति पर अनावश्यक रोक न लगे।

सरकार ने 6 नवंबर को क्या कहा?

6 नवंबर 2026 को केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल दुनिया में कंपनियां अब पहले की तरह केवल निष्क्रिय माध्यम नहीं रह सकतीं। बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा, साइबर धोखाधड़ी, डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन नुकसान को रोकने के लिए प्लेटफॉर्म को सक्रिय कदम उठाने चाहिए।

मंत्री ने एल्गोरिदम में पारदर्शिता और शिकायत निवारण व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बताया। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार धारा 79 के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को हटाने जा रही है या उसमें किस तरह का बदलाव करेगी।

इसलिए मंत्री के बयान को कानूनी सुरक्षा समाप्त करने की आधिकारिक घोषणा नहीं माना जाना चाहिए। यह बयान सोशल मीडिया कंपनियों की व्यापक जवाबदेही को लेकर सरकार की चिंता को जरूर दिखाता है।

यूजर्स को अभी क्या सावधानी रखनी चाहिए?

नियमों में बदलाव हो या न हो, सोशल मीडिया इस्तेमाल करते समय यूजर्स को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

यूजर्स को यह भी समझना चाहिए कि इंटरनेट पर पोस्ट की गई सामग्री लंबे समय तक कॉपी, स्क्रीनशॉट या दूसरे अकाउंट के जरिए उपलब्ध रह सकती है। इसलिए पोस्ट करने से पहले उसकी जिम्मेदारी समझना जरूरी है।

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