भारत से विदेश में पढ़ाई करने जाने वाले छात्रों की संख्या में बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। पिछले तीन साल में यह आंकड़ा लगभग 31% तक घट गया है। संसद में पेश जानकारी के अनुसार, वीज़ा नियमों की सख्ती, बढ़ती फीस, रहने का खर्च, बैंक लोन की शर्तें और वैश्विक अनिश्चितता इस गिरावट के प्रमुख कारण बने हैं।
हालांकि एक तरफ आउटगोइंग स्टूडेंट्स कम हुए हैं, दूसरी ओर भारत ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए अपने दरवाजे खोलते हुए 14 अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को देश में कैंपस खोलने की मंजूरी दी है। यानी ट्रेंड बदल रहा है—अब छात्र विदेश जाने के बजाय विदेशी शिक्षा को भारत में ही पाना चाहते हैं।
कितनी आई गिरावट?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक:
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2022-23 में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेश गए।
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इसके बाद 2023-24 और फिर 2024-25 में लगातार कमी दर्ज हुई।
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कुल मिलाकर तीन साल में लगभग एक-तिहाई गिरावट देखी गई।
यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि कई देशों की नई पॉलिसी और आर्थिक दबावों का असर है।
किन कारणों से कम हुए छात्र?
1) वीज़ा नियम हुए सख्त
स्टडी वीज़ा, पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट और डिपेंडेंट पॉलिसी में बदलाव ने छात्रों की योजना प्रभावित की।
2) खर्च बढ़ा
ट्यूशन फीस, किराया, बीमा, यात्रा—सब महंगा हुआ।
3) लोन मिलना कठिन
बैंक अब कोर्स, यूनिवर्सिटी रैंकिंग और नौकरी की संभावना को ज्यादा सख्ती से देखते हैं।
4) इमिग्रेशन अनिश्चितता
पढ़ाई के बाद सेटलमेंट पहले जितना आसान नहीं रहा।
कनाडा का असर
भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहे Canada ने स्टडी परमिट की संख्या सीमित करने और कॉलेजों पर नियंत्रण कड़ा करने जैसे कदम उठाए। इससे नए अप्लिकेशन में गिरावट आई।
ऑस्ट्रेलिया में भी बदलाव
Australia ने अंग्रेज़ी दक्षता, फाइनेंशियल प्रूफ और वीज़ा स्क्रूटनी बढ़ाई। कई आवेदनों में रिजेक्शन रेट बढ़ा, जिससे मिडिल क्लास छात्रों की चिंता बढ़ी।
ब्रिटेन की नई पॉलिसी
United Kingdom में डिपेंडेंट लाने के नियमों में बदलाव हुआ। अब ज्यादातर पोस्टग्रेजुएट छात्रों के लिए परिवार साथ ले जाना आसान नहीं रहा। इससे कई परिवारों ने प्लान टाल दिए।
अमेरिका की स्थिति
United States अभी भी बड़ा एजुकेशन हब है, लेकिन अपॉइंटमेंट वेट टाइम, वीज़ा इंटरव्यू और बढ़ती फीस ने निर्णय कठिन बनाए हैं।
भारत में विदेशी कैंपस – गेमचेंजर?
गिरावट के बीच एक नई दिशा दिख रही है। भारत में 14 विदेशी संस्थानों को संचालन की मंजूरी मिल चुकी है। इसका मतलब है:
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ग्लोबल डिग्री, देश के अंदर
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कम खर्च
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परिवार के पास रहकर पढ़ाई
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विदेशी फैकल्टी और करिकुलम
यह मॉडल आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकता है।
छात्रों की सोच में बदलाव
पहले विदेश जाना = बेहतर भविष्य माना जाता था।
अब तुलना हो रही है:
| विदेश | भारत में विदेशी कैंपस |
|---|---|
| ज्यादा खर्च | अपेक्षाकृत कम |
| वीज़ा रिस्क | नहीं |
| सेटलमेंट अनिश्चित | घरेलू अवसर |
क्या पूरी तरह रुक जाएगी विदेश पढ़ाई?
नहीं।
टॉप यूनिवर्सिटी, रिसर्च, विशेष कोर्स, ग्लोबल एक्सपोज़र—इनके लिए छात्र जाते रहेंगे। लेकिन मास माइग्रेशन कम हो सकता है।
एजुकेशन इंडस्ट्री पर असर
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कंसल्टेंसी बिज़नेस
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एजुकेशन लोन
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टेस्ट प्रेप कंपनियाँ
इन सबको नए माहौल के अनुसार खुद को ढालना होगा।
क्या सरकार का लक्ष्य यही है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि उद्देश्य यह है कि भारत खुद एक एजुकेशन डेस्टिनेशन बने, ताकि विदेशी मुद्रा बाहर कम जाए और टैलेंट देश में रहे।
छात्रों के लिए क्या सलाह?
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देश और कोर्स अच्छी तरह रिसर्च करें
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वीज़ा पॉलिसी अपडेट देखें
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ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) समझें
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भारत में उपलब्ध विकल्पों की तुलना करे
अगर विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में सफल रहीं, तो यह ट्रेंड तेज हो सकता है। आने वाले 5 साल में तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
तीन साल की गिरावट सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि संकेत है कि ग्लोबल एजुकेशन का मॉडल बदल रहा है।
अब छात्र खर्च, सुरक्षा, अवसर—सब देखकर फैसला कर रहे हैं।