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7600 करोड़ का कर्ज और आत्महत्या के बाद भी मुनाफे में लौटी कॉफी चेन की पूरी कहानी

भारत की सबसे चर्चित कॉफी चेन में गिनी जाने वाली कंपनी कभी 7600 करोड़ रुपये के भारी कर्ज में डूब गई थी। हालात इतने बिगड़ गए कि इसके संस्थापक ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। निवेशकों का भरोसा टूट गया, शेयर कीमतें गिर गईं, और बाजार में यह चर्चा होने लगी कि कंपनी दिवालिया होने की कगार पर है। लेकिन कुछ ही वर्षों में यही कंपनी घाटे से निकलकर मुनाफे में लौट आई। यह केवल कारोबारी सुधार की कहानी नहीं, बल्कि संकट से उबरने, नेतृत्व, रणनीति और धैर्य की मिसाल है।

कभी देशभर के कॉलेज छात्रों और युवा पेशेवरों की पहली पसंद रही इस कॉफी चेन ने 1990 के दशक में भारतीय बाजार में एक नई संस्कृति की शुरुआत की थी। “कॉफी पीने की जगह” से आगे बढ़कर यह “मिलने-जुलने की जगह” बन गई। 2019 तक इसके 240 से अधिक शहरों में 1700 से ज्यादा आउटलेट थे। कंपनी तेजी से विस्तार कर रही थी और रियल एस्टेट में भी निवेश बढ़ा रही थी। लेकिन यही विस्तार बाद में सबसे बड़ी चुनौती बन गया।

समस्या तब शुरू हुई जब कंपनी ने आक्रामक विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज लिया। बैंक और वित्तीय संस्थानों से हजारों करोड़ रुपये का ऋण उठाया गया। साथ ही गैर-कोर कारोबारों में निवेश बढ़ाया गया। बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज हुई, लागत बढ़ी और राजस्व अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया। नतीजतन कर्ज का बोझ 7600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह स्थिति किसी भी कंपनी के लिए खतरनाक मानी जाती है।

2019 में कंपनी के संस्थापक वी.जी. सिद्धार्थ की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। एक सुसाइड नोट सामने आया, जिसमें वित्तीय दबाव और जांच एजेंसियों की कार्रवाई का जिक्र था। इसके बाद कंपनी के शेयर धड़ाम से गिर गए और निवेशकों में घबराहट फैल गई। कर्मचारियों के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे। हजारों लोगों की नौकरियां दांव पर थीं।

लेकिन संकट के बीच एक नई शुरुआत हुई। कंपनी की बागडोर परिवार ने संभाली। मालविका हेगड़े ने नेतृत्व संभालते हुए साफ संदेश दिया कि कंपनी को बचाया जाएगा। सबसे पहले कर्ज कम करने की रणनीति बनाई गई। गैर-जरूरी संपत्तियों की बिक्री शुरू हुई। कई निवेश परियोजनाएं रोकी गईं। बैंकों के साथ पुनर्गठन समझौते किए गए। धीरे-धीरे कर्ज का बोझ घटाया गया।

कंपनी ने घाटे वाले स्टोर्स बंद किए और केवल उन आउटलेट्स पर फोकस किया जो बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। डिजिटल ऑर्डरिंग और डिलीवरी मॉडल को मजबूत किया गया। कोविड-19 के दौरान जब कैफे बंद थे, तब कंपनी ने टेक-अवे और ऑनलाइन ऑर्डरिंग पर जोर दिया। इससे नकदी प्रवाह बना रहा। कर्मचारियों की संख्या में संतुलन लाया गया और संचालन लागत कम की गई।

2023-24 तक स्थिति में सुधार दिखने लगा। कर्ज घटकर लगभग 1000 करोड़ रुपये के आसपास आ गया। 2025 तक कंपनी ने 435 से अधिक शहरों में 1000 से ज्यादा आउटलेट्स के साथ संचालन जारी रखा। कर्मचारियों की संख्या लगभग 3800 के आसपास स्थिर हुई। कंपनी ने 2025-26 की रिपोर्ट में 50-60 करोड़ रुपये के लाभ का अनुमान जताया। यह वापसी आसान नहीं थी, लेकिन रणनीतिक फैसलों ने रास्ता बदल दिया।

विश्लेषकों का मानना है कि कंपनी की सबसे बड़ी गलती बिना सोचे-समझे विस्तार करना था। हर शहर में स्टोर खोलने की होड़ ने संचालन लागत बढ़ा दी। वहीं रियल एस्टेट निवेश ने नकदी को बांध दिया। संकट के बाद कंपनी ने “स्मार्ट ग्रोथ” की नीति अपनाई। अब हर नए आउटलेट से पहले बाजार अध्ययन, लागत विश्लेषण और संभावित राजस्व का आकलन किया जाता है।

ब्रांड की ताकत भी इस वापसी में अहम रही। भारतीय युवाओं के बीच यह कॉफी चेन केवल पेय पदार्थ नहीं, बल्कि एक अनुभव बन चुकी थी। सोशल मीडिया मार्केटिंग, नए फ्लेवर, और किफायती कॉम्बो ऑफर ने ग्राहकों को जोड़े रखा। कंपनी ने यह भी समझा कि आज का ग्राहक केवल बैठकर कॉफी पीना नहीं चाहता, बल्कि तेज सेवा और डिजिटल सुविधा भी चाहता है।

प्रतिस्पर्धा भी कम नहीं थी। स्टारबक्स, ब्लू टोकाई और अन्य प्रीमियम ब्रांड तेजी से बाजार में जगह बना रहे थे। इसके बावजूद यह कंपनी अपनी “भारतीय पहचान” के कारण टिक सकी। किफायती कीमत और व्यापक नेटवर्क इसकी ताकत रहे।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए सीख है कि आक्रामक विस्तार हमेशा लाभदायक नहीं होता। नकदी प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन और दीर्घकालिक रणनीति जरूरी है। साथ ही नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। संकट के समय भावनात्मक संतुलन और स्पष्ट निर्णय ही कंपनी को बचा सकते हैं।

आज यह कॉफी चेन धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ रही है। कर्ज कम हुआ है, मुनाफा लौट रहा है और ब्रांड इमेज सुधर रही है। हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन कंपनी ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इच्छाशक्ति और सही रणनीति से बड़े से बड़ा संकट भी पार किया जा सकता है।

यह कहानी केवल 7600 करोड़ के कर्ज से उबरने की नहीं, बल्कि एक ब्रांड की जिजीविषा की कहानी है। जिसने निराशा के अंधेरे से निकलकर फिर से रोशनी देखी।

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