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बेटा हर वक्त मोबाइल-टीवी देखता है, किताब नहीं पढ़ता? ऐसे डेवलप करें Reading Habit

आज के समय में बच्चों को मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और दूसरे डिजिटल डिवाइस से दूर रखना कई माता-पिता के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। बच्चा स्कूल से आने के बाद होमवर्क करने के बजाय मोबाइल मांगता है, किताब खोलते ही कुछ मिनट में उसका ध्यान भटक जाता है और खाली समय मिलते ही टीवी या वीडियो देखने लगता है। कई माता-पिता की शिकायत होती है कि उनका बच्चा किताबों को हाथ तक नहीं लगाता और पढ़ने के नाम पर तुरंत बोर होने लगता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि हर बच्चा स्वाभाविक रूप से किताबों से नफरत नहीं करता। कई बार बच्चे को किताबों की आदत ही नहीं लगी होती, या उसने पढ़ने को केवल पढ़ाई और परीक्षा के दबाव से जोड़ लिया होता है। दूसरी तरफ मोबाइल और वीडियो प्लेटफॉर्म तुरंत मनोरंजन, आवाज, रंग और लगातार बदलती तस्वीरें देते हैं। इसलिए किताब की तुलना में स्क्रीन बच्चे को ज्यादा आकर्षक लग सकती है।

ऐसे में बच्चे को डांटकर, मोबाइल छीनकर या रोज यह कहकर कि “किताब पढ़ो” रीडिंग हैबिट विकसित करना मुश्किल हो सकता है। इसके बजाय माता-पिता को धीरे-धीरे ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें पढ़ना बच्चे के लिए सजा या पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ न लगे, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का एक सामान्य और आनंददायक हिस्सा बन जाए।

सबसे पहले माता-पिता को यह समझना होगा कि रीडिंग हैबिट एक दिन में विकसित नहीं होती। अगर बच्चा लंबे समय से रोज कई घंटे स्क्रीन देख रहा है और किताब पढ़ने की आदत लगभग नहीं है, तो अचानक उससे रोज एक घंटा किताब पढ़ने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा। शुरुआत केवल 5 से 10 मिनट से की जा सकती है। कुछ दिनों बाद समय धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है।

बच्चे को किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करने का सबसे आसान तरीका है कि शुरुआत उसकी पसंद से की जाए। जरूरी नहीं कि शुरुआत कहानी की किताब से ही हो। अगर बच्चे को क्रिकेट पसंद है तो क्रिकेट से जुड़ी किताब, खिलाड़ियों की कहानी या खेल से जुड़ी रोचक जानकारी वाली पुस्तक दी जा सकती है। अगर उसे अंतरिक्ष पसंद है तो ग्रहों और अंतरिक्ष की तस्वीरों वाली किताब चुनें। जानवर पसंद हैं तो वाइल्डलाइफ की किताब दी जा सकती है। कार, विज्ञान, डायनासोर, कॉमिक्स, रहस्य या एडवेंचर जैसी किसी भी रुचि से शुरुआत की जा सकती है।

माता-पिता अक्सर एक गलती करते हैं। वे अपने बच्चे को वही किताब पढ़ाना चाहते हैं जो उन्हें अच्छी लगती है। लेकिन बच्चे की उम्र और रुचि के हिसाब से किताब चुनना ज्यादा जरूरी है। पहली किताब साहित्यिक रूप से महान हो, यह जरूरी नहीं है। सबसे जरूरी यह है कि बच्चा उसे खोलना और पढ़ना चाहता हो।

अगर बच्चा कॉमिक बुक पढ़ना पसंद करता है तो शुरुआत कॉमिक से ही होने दें। अगर उसे चित्रों वाली किताब पसंद है तो चित्रों वाली किताब दें। कई माता-पिता कॉमिक को “सिर्फ मनोरंजन” मानकर रोक देते हैं, लेकिन शुरुआत में बच्चे का किताब के साथ जुड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक बार पढ़ने की आदत बनने लगे तो धीरे-धीरे दूसरी तरह की किताबों की तरफ ले जाया जा सकता है।

एक और प्रभावी तरीका है फैमिली रीडिंग टाइम। अगर माता-पिता खुद हर समय मोबाइल चलाते रहेंगे और बच्चे से कहेंगे कि “तुम किताब पढ़ो”, तो बच्चा आसानी से सवाल कर सकता है कि जब घर में कोई और नहीं पढ़ रहा तो वह क्यों पढ़े। बच्चे अक्सर माता-पिता के व्यवहार की नकल करते हैं।

इसलिए घर में रोज एक छोटा समय ऐसा रखा जा सकता है जब परिवार के सदस्य अपने-अपने काम से जुड़ी किताब, मैगजीन या अन्य पढ़ने की सामग्री लेकर बैठें। जरूरी नहीं कि हर कोई एक ही किताब पढ़े। बच्चा अपनी किताब पढ़ सकता है और माता-पिता अपनी। इससे बच्चे को यह संदेश मिलता है कि पढ़ना केवल स्कूल का काम नहीं है, बल्कि घर में सामान्य गतिविधि है।

शुरुआत में माता-पिता बच्चे के साथ बैठकर किताब पढ़ सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए माता-पिता कहानी पढ़कर सुनाएं और बीच-बीच में बच्चे से सवाल पूछें। उदाहरण के लिए, “तुम्हें क्या लगता है अब आगे क्या होगा?” या “इस कहानी में तुम्हें कौन अच्छा लगा?” इससे बच्चे की भागीदारी बढ़ती है।

बड़े बच्चों के साथ भी माता-पिता कभी-कभी साथ बैठकर पढ़ सकते हैं। अगर बच्चा किसी कहानी को पढ़ रहा है तो अगले दिन उससे कहानी के बारे में बातचीत की जा सकती है। यहां ध्यान रखना जरूरी है कि बातचीत परीक्षा की तरह न हो। हर पेज के बाद यह पूछना कि “तुमने क्या पढ़ा?” बच्चे को पढ़ने से और दूर कर सकता है।

किताबों को घर में दिखाई देने वाली जगह पर रखना भी उपयोगी हो सकता है। अगर किताबें हमेशा बंद अलमारी में रखी हैं और मोबाइल बच्चे के हाथ की पहुंच में है, तो बच्चा स्वाभाविक रूप से मोबाइल चुनेगा। घर में एक छोटा सा “रीडिंग कॉर्नर” बनाया जा सकता है। इसमें कुछ उम्र के अनुसार किताबें, कॉमिक्स, मैगजीन और कहानी की किताबें रखी जा सकती हैं।

रीडिंग कॉर्नर बहुत महंगा होना जरूरी नहीं है। घर का कोई शांत कोना, एक छोटी टेबल और कुछ किताबें पर्याप्त हैं। इसका उद्देश्य बच्चे को एक ऐसा स्थान देना है जहां वह आराम से पढ़ सके। अगर बच्चा वहां बैठकर केवल 10 मिनट भी पढ़ता है तो शुरुआत के लिए यह अच्छी बात है।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल आता है—मोबाइल और स्क्रीन टाइम को कैसे नियंत्रित करें? अचानक मोबाइल पूरी तरह बंद कर देना हर परिवार में संभव नहीं होता। खासकर आज कई बच्चों की पढ़ाई भी डिजिटल माध्यमों से होती है। इसलिए “स्क्रीन बिल्कुल नहीं” के बजाय “स्क्रीन का संतुलित इस्तेमाल” ज्यादा व्यावहारिक तरीका हो सकता है।

माता-पिता घर में स्पष्ट नियम बना सकते हैं कि मनोरंजन के लिए स्क्रीन कब इस्तेमाल होगी। उदाहरण के लिए, होमवर्क और पढ़ने का समय अलग हो सकता है और मनोरंजन के लिए निर्धारित समय अलग। नियम बच्चे की उम्र और परिवार की दिनचर्या के अनुसार बनाए जाने चाहिए।

यह भी जरूरी है कि माता-पिता खुद इन नियमों का पालन करें। अगर खाने की टेबल पर माता-पिता लगातार फोन देखते हैं तो बच्चे को स्क्रीन से दूर रहने के लिए कहना कम प्रभावी होगा। परिवार के लिए कुछ “नो-फोन जोन” या “नो-स्क्रीन टाइम” बनाया जा सकता है, जैसे भोजन के दौरान या सोने से पहले का समय।

बच्चे को किताब पढ़ने के बदले हर बार इनाम देने की आदत भी नहीं बनानी चाहिए। अगर हर 20 मिनट पढ़ने पर चॉकलेट, खिलौना या पैसे का वादा किया जाएगा तो बच्चा पढ़ने को अपने आप में आनंददायक गतिविधि के बजाय इनाम पाने का साधन समझ सकता है। हालांकि शुरुआत में छोटे सकारात्मक प्रोत्साहन उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन लंबे समय में लक्ष्य यह होना चाहिए कि बच्चा पढ़ने का आनंद खुद महसूस करे।

इसके बजाय बच्चे की तारीफ उसके प्रयास के लिए की जा सकती है। जैसे, “आज तुमने कल से ज्यादा पढ़ा”, “तुमने कहानी पूरी करने की कोशिश की” या “तुमने खुद किताब चुनी, यह अच्छी बात है।” ऐसी सकारात्मक प्रतिक्रिया बच्चे के आत्मविश्वास को बढ़ा सकती है।

बच्चे को किताब चुनने की स्वतंत्रता देना भी बहुत जरूरी है। माता-पिता दो या तीन किताबें सामने रखकर पूछ सकते हैं कि वह इनमें से कौन सी पढ़ना चाहता है। इससे बच्चे को लगता है कि निर्णय लेने में उसकी भी भूमिका है। जब बच्चे को अपनी पसंद की किताब चुनने का अवसर मिलता है तो पढ़ने की संभावना बढ़ सकती है।

रीडिंग हैबिट विकसित करने में सोने से पहले पढ़ना भी उपयोगी पारिवारिक रूटीन बन सकता है। अगर उम्र के अनुसार उपयुक्त हो तो रात में सोने से पहले कुछ मिनट किताब पढ़ने की आदत डाली जा सकती है। शुरुआत 5-10 मिनट से हो सकती है। धीरे-धीरे बच्चा खुद किताब लेकर बिस्तर पर जाने का आदी हो सकता है।

हालांकि माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि सोने से पहले पढ़ने का समय बच्चे की नींद को कम करने वाला नहीं होना चाहिए। अच्छी नींद भी बच्चे के विकास और सीखने के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए पढ़ने के लिए सोने का समय बहुत देर तक आगे न बढ़ाएं।

एक और अच्छी रणनीति है कि बच्चे को कहानी सुनाने के लिए कहा जाए। अगर बच्चा किसी किताब का एक हिस्सा पढ़ चुका है तो उससे कहें कि वह कहानी अपने शब्दों में सुनाए। इससे उसकी समझ और भाषा दोनों का अभ्यास हो सकता है। इसे भी परीक्षा की तरह न करें। माता-पिता उत्सुक श्रोता की तरह बच्चे की कहानी सुनें।

अगर बच्चा पढ़ते समय किसी शब्द का अर्थ नहीं जानता तो तुरंत डांटने के बजाय शब्द का अर्थ समझाएं। हर पंक्ति पर रोककर शब्दों की परीक्षा लेने से बच्चा परेशान हो सकता है। शुरुआत में पढ़ने की गति से ज्यादा पढ़ने का आनंद और समझ महत्वपूर्ण है।

कई बच्चों को लंबे पैराग्राफ वाली किताबें कठिन लगती हैं। ऐसे बच्चों के लिए चित्रों वाली किताब, छोटे अध्याय या बड़ी फॉन्ट वाली किताब बेहतर शुरुआत हो सकती है। उम्र के साथ धीरे-धीरे कठिन किताबों की तरफ बढ़ा जा सकता है।

माता-पिता बच्चे को लाइब्रेरी भी ले जा सकते हैं। लाइब्रेरी में कई तरह की किताबें देखकर बच्चे की जिज्ञासा बढ़ सकती है। अगर आपके शहर या स्कूल में लाइब्रेरी उपलब्ध है तो बच्चे को अपनी पसंद की किताब खोजने दें। किताब खरीदने के बजाय उधार लेकर अलग-अलग किताबें पढ़ना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

रीडिंग हैबिट विकसित करने के लिए किताबों को बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ना भी काम करता है। उदाहरण के लिए, अगर परिवार कहीं घूमने जा रहा है तो उस जगह से जुड़ी किताब या जानकारी पढ़ी जा सकती है। अगर बच्चा किसी वैज्ञानिक प्रयोग में रुचि दिखाता है तो उससे जुड़ी बच्चों की किताब लाई जा सकती है। इस तरह बच्चा समझता है कि किताबों में उसकी दुनिया से जुड़ी उपयोगी और रोचक जानकारी भी मिलती है।

अगर बच्चा बार-बार कहता है कि “मुझे किताब पढ़ना पसंद नहीं है”, तो माता-पिता को तुरंत इसे आलस या जिद नहीं मानना चाहिए। कभी-कभी पढ़ने में कठिनाई, शब्दों को समझने में परेशानी, आंखों की समस्या या सीखने से जुड़ी अन्य कठिनाइयां भी बच्चे को किताबों से दूर कर सकती हैं। यदि बच्चा उम्र के अनुसार सामान्य पढ़ने में लगातार बहुत अधिक कठिनाई महसूस करता है या स्कूल में भी पढ़ने को लेकर गंभीर परेशानी रहती है, तो शिक्षक और जरूरत पड़ने पर संबंधित विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी हो सकता है।

यह भी जरूरी है कि माता-पिता बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से न करें। “देखो तुम्हारा दोस्त रोज किताब पढ़ता है और तुम मोबाइल चलाते हो” जैसी बातें बच्चे में शर्म या विरोध की भावना पैदा कर सकती हैं। इसके बजाय बच्चे की अपनी प्रगति पर ध्यान दें। अगर उसने पहले बिल्कुल नहीं पढ़ा और अब रोज 10 मिनट पढ़ रहा है तो यह सकारात्मक बदलाव है।

रीडिंग चैलेंज को भी मजेदार बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए परिवार महीने में कितनी किताबें पढ़ सकता है, इसका छोटा लक्ष्य बनाया जा सकता है। लेकिन लक्ष्य बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। खासकर छोटे बच्चों के लिए पन्नों की संख्या के बजाय नियमितता पर ध्यान देना बेहतर है।

बच्चे के लिए किताब खरीदते समय उसकी उम्र के साथ-साथ पढ़ने के स्तर को भी ध्यान में रखें। बहुत कठिन किताब मिलने पर बच्चा जल्दी निराश हो सकता है। बहुत आसान किताब लंबे समय तक रुचि बनाए नहीं रख सकती। इसलिए ऐसी किताब चुनें जिसमें बच्चा कुछ हिस्सा खुद पढ़ सके और जरूरत पड़ने पर माता-पिता सहायता कर सकें।

एक जरूरी बात यह भी है कि स्क्रीन को हमेशा “दुश्मन” मानना सही नहीं है। डिजिटल माध्यम से भी बच्चों को अच्छी कहानियां, ऑडियोबुक, शैक्षणिक सामग्री और ई-बुक्स मिल सकती हैं। यदि बच्चा किसी कहानी को सुनना पसंद करता है तो ऑडियोबुक से शुरुआत करके बाद में उसी कहानी की प्रिंटेड किताब पढ़ने की कोशिश की जा सकती है। लक्ष्य स्क्रीन को हर स्थिति में हटाना नहीं, बल्कि बच्चे के डिजिटल और ऑफलाइन अनुभवों के बीच संतुलन बनाना है।

माता-पिता चाहें तो एक छोटा नियम बना सकते हैं—पहले पढ़ना, फिर मनोरंजन। लेकिन इसे कठोर सजा की तरह लागू करने के बजाय परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। उदाहरण के लिए शाम को कुछ समय आउटडोर खेल, फिर होमवर्क, फिर 10-15 मिनट पढ़ना और उसके बाद सीमित मनोरंजन का समय। यह क्रम बच्चे को धीरे-धीरे रूटीन बनाने में मदद कर सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात है धैर्य। अगर बच्चा पहले दिन 10 मिनट किताब पढ़ता है और दूसरे दिन केवल 5 मिनट, तो इसे असफलता न मानें। आदत बनने में समय लगता है। कुछ सप्ताह तक लगातार कोशिश करने के बाद ही स्पष्ट बदलाव दिखाई दे सकता है।

माता-पिता को यह भी याद रखना चाहिए कि किताब पढ़ने का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे नंबर लाना नहीं है। पढ़ने से भाषा, शब्दावली, कल्पना, सामान्य ज्ञान और विचारों को समझने की क्षमता विकसित हो सकती है। कहानी पढ़ते समय बच्चा अलग-अलग पात्रों और परिस्थितियों को समझता है, जिससे उसकी कल्पनाशक्ति और सोचने की क्षमता को भी बढ़ावा मिल सकता है।

इसलिए अगर आपका बेटा या बेटी हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी मांगता है और किताबों से दूर भागता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। शुरुआत छोटे कदम से करें। बच्चे की पसंद की किताब चुनें, रोज कुछ मिनट का परिवारिक रीडिंग टाइम बनाएं, घर में किताबों को आसानी से उपलब्ध रखें, स्क्रीन के लिए स्पष्ट और उम्र के अनुसार नियम बनाएं और सबसे महत्वपूर्ण—खुद भी पढ़ने की आदत दिखाएं।

एक आसान 30-दिन का रीडिंग रूटीन भी बनाया जा सकता है। पहले सप्ताह में रोज केवल 5-10 मिनट पढ़ने का लक्ष्य रखें। दूसरे सप्ताह में समय को 10-15 मिनट तक ले जाएं। तीसरे सप्ताह में बच्चे को खुद किताब चुनने दें और पढ़ी गई कहानी पर बातचीत करें। चौथे सप्ताह में 15-20 मिनट का नियमित रीडिंग टाइम बनाया जा सकता है। अगर बच्चा इससे ज्यादा पढ़ना चाहे तो उसे रोकने की जरूरत नहीं, लेकिन लक्ष्य पूरा न होने पर डांटने से बचें।

इस पूरी प्रक्रिया में माता-पिता का व्यवहार सबसे बड़ा उदाहरण बन सकता है। अगर बच्चा देखता है कि घर में किताबें पढ़ी जाती हैं, उनसे बातचीत होती है और पढ़ने को सम्मान दिया जाता है, तो उसके लिए भी यह गतिविधि सामान्य बन सकती है।

आखिरकार रीडिंग हैबिट किसी एक दिन का प्रोजेक्ट नहीं है। यह घर के वातावरण, बच्चे की रुचि, माता-पिता के व्यवहार और लगातार बनाए गए छोटे-छोटे नियमों से विकसित होती है। मोबाइल और टीवी को अचानक खत्म करने की कोशिश करने के बजाय बच्चे को किताबों की दुनिया से धीरे-धीरे जोड़ना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

अगर बच्चा आज सिर्फ 5 मिनट पढ़ता है, तो उसे शुरुआत मानिए। कल वही 10 मिनट हो सकता है और कुछ समय बाद बच्चा खुद किताब उठाकर बैठ सकता है। पेरेंटिंग में सबसे बड़ा बदलाव अक्सर बड़े नियमों से नहीं, बल्कि रोज दोहराई जाने वाली छोटी आदतों से आता है।

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