आज का बच्चा पहले जैसा नहीं रहा। उसके हाथ में खिलौनों की जगह मोबाइल फोन है, आंखों के सामने मैदान की जगह स्क्रीन है और दोस्तों से बातचीत की जगह चैट और रील्स ने ले ली है। गाजियाबाद की उस दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें आत्महत्या करने वाली तीन बहनों की डायरी से यह सामने आया कि मोबाइल फोन की लत और कोरियाई कंटेंट की दीवानगी ने उनकी मानसिक दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया था। यह कोई एक परिवार या एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश में तेजी से फैलती एक खतरनाक सच्चाई है।
विशेषज्ञों और हालिया आंकड़ों के अनुसार, अगर किसी बच्चे का स्क्रीन टाइम चार घंटे से ज्यादा हो जाता है, तो उसमें डिप्रेशन की आशंका तीन गुना तक बढ़ जाती है। यह सिर्फ थकान या आंखों की समस्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चे के भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक विकास को भी गहराई से नुकसान पहुंचाता है।
आज भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे कम सो रहे हैं और भावनात्मक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। मोबाइल और टैबलेट पर देर रात तक वीडियो देखने, गेम खेलने और सोशल मीडिया खंगालने की आदत ने उनकी नींद का चक्र बिगाड़ दिया है। नींद की कमी सीधे दिमाग के विकास पर असर डालती है। बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है, गुस्सा जल्दी आता है और छोटी-छोटी बातों पर टूटने लगता है।
आंकड़े बताते हैं कि 50 प्रतिशत से ज्यादा किशोर रोजाना चार घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। पढ़ाई के नाम पर मोबाइल हाथ में लिया जाता है, लेकिन धीरे-धीरे वह पढ़ाई से ज्यादा मनोरंजन का साधन बन जाता है। ऑनलाइन क्लास खत्म होने के बाद भी स्क्रीन बंद नहीं होती। इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे परिवार के साथ समय बिताना कम कर देते हैं।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि 46 प्रतिशत बच्चे, जिनका स्क्रीन टाइम चार घंटे से ज्यादा है, वे नियमित रूप से खेल-कूद नहीं करते। खेल केवल शरीर के लिए नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन के लिए भी जरूरी होता है। जब खेल खत्म हो जाता है, तो बच्चे की ऊर्जा स्क्रीन में खपने लगती है, जिससे उसका व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगता है।
60 प्रतिशत बच्चे यह शिकायत करते हैं कि उनके माता-पिता उन्हें पूरा समय नहीं देते। लेकिन सच्चाई यह भी है कि कई माता-पिता खुद मोबाइल में इतने उलझे रहते हैं कि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि उनका बच्चा चुपचाप अंदर से टूट रहा है। जब संवाद खत्म हो जाता है, तो बच्चा अपनी भावनाओं को किसी और दुनिया में तलाशने लगता है, और वही दुनिया अक्सर डिजिटल होती है।
चार घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण 26 प्रतिशत तक पाए गए हैं, जबकि कम स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में यह आंकड़ा सिर्फ 9.5 प्रतिशत के आसपास है। यह अंतर साफ दिखाता है कि स्क्रीन का असर सिर्फ आंखों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे दिमाग और भावनाओं पर पड़ता है।
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि लगातार स्क्रीन देखने से बच्चे का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है। वह लंबे समय तक किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाता। पढ़ाई में मन नहीं लगता, याददाश्त कमजोर होने लगती है और आत्मविश्वास में कमी आने लगती है। कई बच्चों में सामाजिक डर भी बढ़ जाता है, वे लोगों से मिलने या बात करने से कतराने लगते हैं।
कोरियाई ड्रामा और विदेशी कंटेंट की बढ़ती लोकप्रियता भी एक बड़ा कारण बन रही है। देश में कोरियाई ड्रामा ही नहीं, बल्कि कोरियाई भाषा और खानपान का प्रभाव भी तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 18.5 करोड़ से ज्यादा लोग कोरियाई कंटेंट देखते हैं। कई विश्वविद्यालयों में कोरियाई भाषा के कोर्स शुरू हो चुके हैं और बीते पांच वर्षों में इसमें 280 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब बच्चा अपनी असली जिंदगी की तुलना स्क्रीन पर दिख रही परफेक्ट दुनिया से करने लगता है। उसे लगने लगता है कि उसकी जिंदगी उबाऊ है, उसके रिश्ते कमजोर हैं और वह खुद किसी काम का नहीं है। यही सोच धीरे-धीरे आत्मग्लानि और डिप्रेशन में बदल जाती है।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि खुशी जहां नहीं होती, वहां उदासी बढ़ती है और उदासी के साथ आत्महत्या जैसे खतरनाक विचार भी जन्म लेते हैं। कोरिया में पहले से ही आत्महत्या की दर बहुत ज्यादा है और अब उसी तरह का प्रभाव भारतीय युवाओं और बच्चों में भी दिखने लगा है। भारत में बीते दस सालों में बच्चों और किशोरों में आत्महत्या के मामलों में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है।
एक और बड़ा खतरा यह है कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बच्चे की भावनात्मक समझ कमजोर हो जाती है। वह दूसरों की भावनाओं को समझने में असमर्थ हो जाता है। दोस्ती, परिवार और रिश्तों का महत्व उसके लिए कम होने लगता है। उसे वर्चुअल दुनिया ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक लगने लगती है।
माता-पिता की भूमिका यहां सबसे अहम हो जाती है। कई बार माता-पिता यह सोचकर बच्चे को मोबाइल दे देते हैं कि वह शांत रहेगा या पढ़ाई करेगा। लेकिन यही सुविधा धीरे-धीरे आदत बन जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। पांच साल तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होना चाहिए और वह भी माता-पिता की निगरानी में।
समाधान आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। सबसे पहले परिवार में संवाद बढ़ाना होगा। बच्चे से रोज बात करना, उसकी बातें सुनना और उसे यह महसूस कराना कि वह अकेला नहीं है। स्क्रीन के विकल्प के तौर पर खेल, किताबें, संगीत और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है।
स्कूलों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों को सिर्फ अकादमिक दबाव में न डालें, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें। काउंसलिंग, खेल और सामूहिक गतिविधियों के जरिए बच्चों को वास्तविक दुनिया से जोड़ा जा सकता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि स्क्रीन अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन उसका अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहा है। अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसके परिणाम आने वाले वर्षों में और भी भयावह हो सकते हैं। बच्चों का भविष्य सिर्फ तकनीक पर नहीं, बल्कि संतुलन, संवाद और समझ पर टिका है।






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