भारत में हर वर्ष फसल कटाई के बाद बड़ी मात्रा में पराली (फसल अवशेष) जलाई जाती है, जिससे वायु प्रदूषण गंभीर स्तर तक पहुंच जाता है। खासकर उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान पराली जलाने से स्मॉग की समस्या बढ़ जाती है और इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसी चुनौती को अवसर में बदलने का काम कर रहा है भारतीय स्टार्टअप CRASTE, जिसने पराली से प्लाईवुड और अन्य इको-फ्रेंडली उत्पाद बनाने की अनोखी पहल की है। यह स्टार्टअप न केवल प्रदूषण कम करने में योगदान दे रहा है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ उद्योग मॉडल विकसित करने की दिशा में भी काम कर रहा है।
CRASTE की स्थापना युवाओं की उस सोच का परिणाम है, जो पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान तकनीक और नवाचार के माध्यम से तलाशना चाहती है। संस्थापकों ने महसूस किया कि पराली को जलाने के बजाय यदि उसका उपयोग औद्योगिक उत्पाद बनाने में किया जाए, तो इससे दोहरा लाभ मिल सकता है—एक तरफ प्रदूषण कम होगा और दूसरी तरफ किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा। इसी विचार को वास्तविकता में बदलते हुए कंपनी ने पराली आधारित प्लाईवुड, बोर्ड और पैकेजिंग सामग्री तैयार करने की तकनीक विकसित की।
भारत में हर साल लाखों टन कृषि अवशेष पैदा होते हैं। इनमें से बड़ी मात्रा खेतों में ही जला दी जाती है क्योंकि किसानों के पास उसे निपटाने का सस्ता और आसान विकल्प नहीं होता। पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सूक्ष्म कण वायुमंडल में फैलते हैं, जो सांस संबंधी बीमारियों का कारण बनते हैं। CRASTE ने इस समस्या की जड़ को समझते हुए एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जिसमें किसानों से पराली खरीदी जाती है और उसे प्रोसेस कर उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है।
कंपनी का कार्यप्रणाली मॉडल काफी व्यवस्थित है। सबसे पहले स्थानीय किसानों से पराली एकत्र की जाती है। इसके बाद उसे प्रोसेसिंग यूनिट में ले जाकर साफ किया जाता है और विशेष तकनीक से दबाकर बोर्ड के रूप में ढाला जाता है। यह बोर्ड पारंपरिक लकड़ी आधारित प्लाईवुड की तरह मजबूत और टिकाऊ होता है। कंपनी का दावा है कि उनके उत्पादों में फॉर्मल्डिहाइड जैसे हानिकारक रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता, जिससे यह स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल हैं।
CRASTE के उत्पादों का उपयोग फर्नीचर, इंटीरियर डिजाइन, पैकेजिंग और निर्माण क्षेत्र में किया जा सकता है। इससे लकड़ी की मांग कम होती है और जंगलों पर दबाव घटता है। इस तरह यह स्टार्टअप न केवल प्रदूषण की समस्या सुलझा रहा है, बल्कि वनों की कटाई को भी कम करने में मदद कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो यह देश की पर्यावरण नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
किसानों के लिए यह पहल बेहद फायदेमंद साबित हो रही है। पहले जहां पराली को बेकार समझकर जला दिया जाता था, वहीं अब उसी पराली के बदले किसानों को भुगतान मिल रहा है। इससे उनकी अतिरिक्त आय सुनिश्चित होती है और खेत साफ करने की लागत भी कम होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं, क्योंकि पराली संग्रह और प्रोसेसिंग के लिए स्थानीय स्तर पर श्रमिकों की जरूरत होती है।
स्टार्टअप के संस्थापकों का कहना है कि उनकी प्रेरणा प्रदूषण की समस्या को जड़ से खत्म करने की थी। उन्होंने रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश कर ऐसी तकनीक विकसित की, जो पराली को मजबूत और टिकाऊ बोर्ड में बदल सके। शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जैसे फंडिंग, तकनीकी मानकों की स्वीकृति और बाजार में विश्वास बनाना। लेकिन धीरे-धीरे कंपनी ने अपनी गुणवत्ता और नवाचार के दम पर पहचान बना ली।
सरकारी योजनाओं और स्टार्टअप इकोसिस्टम से भी कंपनी को सहयोग मिला है। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियों के तहत ऐसे नवाचारों को प्रोत्साहन मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर पराली आधारित उद्योगों को सब्सिडी और समर्थन दें, तो यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।
CRASTE का लक्ष्य केवल प्लाईवुड तक सीमित नहीं है। कंपनी भविष्य में अन्य बायो-बेस्ड उत्पाद विकसित करने की दिशा में भी काम कर रही है। पैकेजिंग सामग्री, इको-फ्रेंडली बोर्ड और निर्माण सामग्री जैसे उत्पादों पर रिसर्च जारी है। इससे भारत में ग्रीन इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और कार्बन फुटप्रिंट कम करने में मदद मिलेगी।
पराली से प्लाईवुड बनाने का यह मॉडल वैश्विक स्तर पर भी सराहा जा रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस पहल की चर्चा हुई है और इसे पर्यावरण संरक्षण का अभिनव उदाहरण माना गया है। यदि ऐसे स्टार्टअप को पर्याप्त निवेश और नीति समर्थन मिले, तो भारत वैश्विक ग्रीन टेक्नोलॉजी बाजार में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
अंततः CRASTE की कहानी यह साबित करती है कि समस्या में ही समाधान छिपा होता है। जिस पराली को लंबे समय तक प्रदूषण का कारण माना गया, वही अब उद्योग और रोजगार का साधन बन रही है। यह पहल न केवल पर्यावरण के लिए सकारात्मक है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आने वाले वर्षों में यदि इस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया गया, तो यह भारत की प्रदूषण समस्या को कम करने में बड़ा योगदान दे सकता है
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