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Mr. Ashish

3 लाख भक्तों ने खींचा नंदी का रथ, दलित महिलाओं की आरती के बाद शुरू हुई यात्रा; 500 साल पुरानी परंपरा

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जब करीब तीन लाख श्रद्धालुओं ने मिलकर नंदी के भव्य रथ को खींचा। सदियों से चली आ रही यह परंपरा इस बार भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई गई। खास बात यह रही कि रथयात्रा की शुरुआत दलित महिलाओं की आरती के बाद हुई—जिसे सामाजिक बराबरी और सहभागिता का मजबूत संदेश माना जा रहा है।

रथ आगे बढ़ा तो सड़कों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। चारों तरफ “जय-जयकार”, ढोल-नगाड़ों की धुन, फूलों की वर्षा और भक्तों की उमंग—पूरा इलाका भक्तिमय हो गया।


परंपरा की विरासत: आधी सहस्राब्दी का इतिहास

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह रथोत्सव करीब 500 साल पुराना है। पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इस आयोजन से जुड़े रहे हैं। परिवार अपने बच्चों को साथ लाते हैं ताकि वे भी इस परंपरा को समझें और आगे बढ़ाएँ।

इतिहासकार बताते हैं कि यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामुदायिक पहचान का भी प्रतीक बन चुका है।


शुरुआत से पहले क्या हुआ?

रथयात्रा से पहले विशेष पूजा, मंत्रोच्चार और आरती का आयोजन हुआ। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा दलित महिलाओं द्वारा की गई आरती को लेकर रही।
इस कदम को समाज में बराबरी और भागीदारी बढ़ाने की दिशा में अहम माना गया।

जैसे ही आरती पूरी हुई, हजारों हाथ रस्सियों पर एक साथ पड़े और रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।


आस्था का महासागर

जहाँ तक नजर जाती, लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे।

  • छतों पर खड़े लोग

  • सड़कों के किनारे परिवार

  • दूर-दराज से आए श्रद्धालु

हर कोई इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनना चाहता था।


प्रशासन की बड़ी चुनौती

इतनी विशाल भीड़ को संभालना आसान नहीं था।
प्रशासन ने:

  • बैरिकेडिंग

  • मेडिकल कैंप

  • पुलिस और स्वयंसेवकों की तैनाती

  • ड्रोन से निगरानी

जैसे इंतजाम किए।

रास्तों को डायवर्ट किया गया ताकि रथयात्रा सुचारु रूप से निकल सके।


स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा

ऐसे बड़े आयोजनों से व्यापार को भी बढ़ावा मिलता है।
होटल, दुकानदार, प्रसाद विक्रेता, फूलमाला और परिवहन सेवाओं की मांग बढ़ जाती है। कई लोग इसे साल की सबसे बड़ी कमाई का मौका मानते हैं।


महिलाओं की भागीदारी

इस बार बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल हुईं।
आरती से लेकर भजन-कीर्तन तक उनकी सक्रिय भूमिका दिखाई दी।
यह आयोजन बदलते सामाजिक स्वरूप को भी दर्शाता है।


युवा भी पीछे नहीं

सोशल मीडिया पर लाइव वीडियो, रील्स और फोटो की भरमार रही।
युवा पीढ़ी परंपरा से जुड़ते हुए उसे डिजिटल दुनिया तक पहुंचा रही है।


सुरक्षा और स्वास्थ्य इंतजाम

गर्मी और भीड़ को देखते हुए पानी के टैंकर, एंबुलेंस और हेल्प डेस्क लगाए गए।
लाउडस्पीकर से लगातार निर्देश दिए जाते रहे।


श्रद्धालुओं की भावनाएँ

कई भक्तों ने बताया कि वे हर बार इस रथ को खींचने आते हैं।
उनके लिए यह सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


क्यों खास है यह रथयात्रा?

✔ सदियों पुरानी परंपरा
✔ लाखों की भागीदारी
✔ सामाजिक समरसता का संदेश
✔ धार्मिक + सांस्कृतिक महत्व

आने वाले दिनों में भी मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक आयोजन जारी रहेंगे।
स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि इस बार पिछले रिकॉर्ड भी टूट सकते हैं।

तीन लाख लोगों का एक साथ आकर रथ खींचना सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि एकता, विश्वास और परंपरा की ताकत का प्रतीक है।
दलित महिलाओं की आरती ने इस आयोजन को नया सामाजिक अर्थ भी दिया है।

http://3-lakh-devotees-nandi-rath-yatra

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