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Mr. Ashish

17 साल यूट्यूब-स्काइप से पार्टी चलाने वाले तारिक रहमान बने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री

बांग्लादेश की राजनीति में एक ऐसा नाम उभरा है जिसने पारंपरिक राजनीति की परिभाषा बदल दी। 17 वर्षों तक देश से बाहर रहकर केवल यूट्यूब, स्काइप और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पार्टी का संचालन करने वाले नेता आज देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं। यूनिवर्सिटी ड्रॉपआउट होने के बावजूद उन्होंने संगठन, रणनीति और डिजिटल संवाद के दम पर सत्ता तक का सफर तय किया। यह कहानी है बांग्लादेश के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान की, जिन्हें समर्थक “सबसे छोटे युद्धबंदी” के नाम से भी जानते हैं।

तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1965 को ढाका में हुआ। उनके पिता जियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति रहे और मां खालिदा जिया तीन बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े तारिक ने बचपन से ही सत्ता, संघर्ष और विरोध की राजनीति को करीब से देखा। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उनका परिवार भी राजनीतिक उथल-पुथल का हिस्सा रहा। कहा जाता है कि कम उम्र में ही उन्होंने सैन्य और राजनीतिक दबाव का अनुभव किया, जिसके कारण उन्हें “सबसे छोटे युद्धबंदी” की संज्ञा दी गई।

शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने ढाका के आदमजी कैंटोनमेंट कॉलेज में पढ़ाई की, लेकिन बाद में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी। आलोचक इसे उनकी कमजोरी मानते हैं, लेकिन समर्थक कहते हैं कि असली शिक्षा उन्हें राजनीति और जीवन के अनुभवों से मिली। यूनिवर्सिटी ड्रॉपआउट होने के बावजूद उन्होंने संगठन कौशल और डिजिटल रणनीति में महारत हासिल की।

1988 में उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्राथमिक सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा। 2001 में पार्टी की जीत के बाद उन्हें वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया। लेकिन 2007-08 में राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और 18 महीने जेल में बिताने पड़े। इसके बाद वे इलाज के लिए लंदन चले गए और वहीं परिवार सहित बस गए।

यहीं से उनकी डिजिटल राजनीति की शुरुआत हुई। देश से दूर रहते हुए भी उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से संपर्क नहीं तोड़ा। स्काइप मीटिंग्स, यूट्यूब लाइव संबोधन और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए वे लगातार समर्थकों से जुड़े रहे। बताया जाता है कि उन्होंने करीब 18 हजार सक्रिय कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत पत्र लिखे, जिनमें हर जिले की समस्याओं और समाधान का जिक्र होता था। यह तरीका पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग था।

करीब 17 साल तक ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जीने के बाद भी उन्होंने पार्टी संगठन को बिखरने नहीं दिया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नियमित संबोधन, रणनीतिक मार्गदर्शन और चुनावी संदेशों ने उन्हें जमीनी कार्यकर्ताओं से जोड़े रखा। जब वे हाल ही में चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने, तो इसे “डिजिटल लोकतंत्र की जीत” कहा गया।

तारिक रहमान के राजनीतिक सफर में विवाद भी कम नहीं रहे। उन पर भ्रष्टाचार और ग्रेनेड हमले से जुड़े आरोप लगे। 2004 के एक बड़े हमले में उनका नाम सामने आया था। हालांकि वे इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते रहे। बांग्लादेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप आम बात है, लेकिन इन विवादों के बावजूद उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।

उनकी पत्नी जौबा रहमान एक चिकित्सक हैं और परिवार की निजी जिंदगी अपेक्षाकृत सादा रही है। उनकी एक बेटी है, जो विदेश में पढ़ाई कर चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पारिवारिक समर्थन ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखा।

प्रधानमंत्री बनने के बाद तारिक रहमान ने कहा कि वे “नई पीढ़ी की राजनीति” को आगे बढ़ाएंगे। उनका फोकस आर्थिक सुधार, युवाओं के लिए रोजगार, और डिजिटल प्रशासन पर रहेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वे शिक्षा सुधार और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नई योजनाएं शुरू करेंगे। 2001-2006 के दौरान लड़कियों की मुफ्त शिक्षा योजना को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

उनकी संपत्ति को लेकर भी चर्चा होती रही है। चुनावी हलफनामों के अनुसार उनकी कुल संपत्ति लगभग 1.48 करोड़ रुपये बताई गई है। हालांकि विपक्ष इस आंकड़े पर सवाल उठाता रहा है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि तारिक रहमान का सत्ता तक पहुंचना दक्षिण एशियाई राजनीति में एक नया अध्याय है। निर्वासन में रहकर पार्टी चलाना और फिर चुनाव जीतना दुर्लभ उदाहरण है। यह दर्शाता है कि डिजिटल माध्यम अब राजनीति का महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है।

बांग्लादेश की जनता के लिए यह बदलाव उम्मीदों से भरा है। लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता और विरोध के दौर के बाद अब स्थिर शासन की अपेक्षा की जा रही है। तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संतुलित रखना होगा।

उनकी कहानी संघर्ष, विवाद और पुनरुत्थान की कहानी है। यूनिवर्सिटी ड्रॉपआउट से लेकर प्रधानमंत्री पद तक का सफर आसान नहीं था। लेकिन डिजिटल संवाद, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक धैर्य ने उन्हें वह मुकाम दिलाया, जिसकी शायद कम ही लोगों ने कल्पना की थी।

आज जब वे ढाका के प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठकर फैसले ले रहे हैं, तो यह साफ है कि राजनीति का चेहरा बदल रहा है। यूट्यूब और स्काइप से पार्टी चलाने वाला नेता अब पूरे देश की बागडोर संभाल रहा है। आने वाले वर्षों में उनका नेतृत्व बांग्लादेश की दिशा तय करेगा।

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