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Mr. Ashish

‘सुपर कंप्यूटर’ से तेज 12 अभ्यर्थी? 30 मिनट में 100 सवाल, FIR दर्ज

मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल की आबकारी आरक्षक भर्ती परीक्षा में सामने आए कथित ‘सुपर कंप्यूटर’ जैसे प्रदर्शन ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों ने 2 घंटे की परीक्षा में केवल डेढ़ घंटे तक सक्रिय रहकर मात्र 30 मिनट में 100 प्रश्न हल कर दिए और 100 पर्सेंटाइल हासिल कर लिया। परिणाम सामने आने के बाद परीक्षा प्रक्रिया, परीक्षा केंद्र और तकनीकी निगरानी तंत्र की निष्पक्षता पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन 12 अभ्यर्थियों पर संदेह जताया गया है, उन्होंने कंप्यूटर आधारित परीक्षा में असामान्य तेजी दिखाई। परीक्षा की कुल अवधि 120 मिनट थी, लेकिन लॉग डेटा में यह दर्ज हुआ कि कुछ उम्मीदवारों ने पहले प्रश्नपत्र को देखा, फिर अंतिम 30 मिनट में तेजी से उत्तर टिक कर दिए। इससे यह आशंका पैदा हुई कि कहीं प्रश्न पहले से उपलब्ध तो नहीं थे या किसी तकनीकी गड़बड़ी का लाभ तो नहीं उठाया गया।

परीक्षा केंद्र पर लगे CCTV और सर्वर लॉग की जांच के बाद यह पाया गया कि कुछ रोल नंबरों का पैटर्न समान था। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) में हर क्लिक, हर मूवमेंट और हर समय-चिह्न (टाइम स्टैम्प) रिकॉर्ड होता है। यदि किसी अभ्यर्थी ने 30 मिनट में 100 प्रश्न हल किए, तो यह औसत प्रति प्रश्न लगभग 18 सेकंड से भी कम का समय दर्शाता है। सामान्य परिस्थितियों में इतने कम समय में प्रश्न पढ़ना, समझना और सही विकल्प चुनना बेहद कठिन माना जाता है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, संदिग्ध अभ्यर्थियों के लॉग-इन और लॉग-आउट समय, माउस क्लिक पैटर्न और स्क्रीन नेविगेशन डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है। यदि यह साबित होता है कि परीक्षा प्रक्रिया से छेड़छाड़ हुई है, तो संबंधित केंद्र और तकनीकी सेवा प्रदाता की जिम्मेदारी तय की जाएगी।

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि परीक्षा के परिणाम पर हजारों युवाओं का भविष्य निर्भर करता है। यदि कुछ उम्मीदवार अनुचित तरीके से 100 पर्सेंटाइल हासिल करते हैं, तो मेहनत करने वाले अन्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होता है। इसी कारण परीक्षा बोर्ड ने FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

तकनीकी विशेषज्ञ बताते हैं कि कंप्यूटर आधारित परीक्षा में प्रश्नों का रैंडमाइजेशन किया जाता है, यानी हर अभ्यर्थी को प्रश्नों का क्रम अलग मिलता है। यदि इसके बावजूद कुछ उम्मीदवारों के उत्तर देने का पैटर्न असामान्य है, तो यह संगठित प्रयास की ओर संकेत कर सकता है।

इस मामले ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी है। कई अभ्यर्थियों ने सोशल मीडिया पर अपनी चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि तकनीकी गड़बड़ी या धांधली साबित होती है, तो पूरी परीक्षा रद्द कर पुनः आयोजित की जानी चाहिए।

परीक्षा बोर्ड का कहना है कि वे किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं करेंगे। सर्वर डेटा की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है। यदि किसी सॉफ्टवेयर बैकडोर, स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस की संभावना मिलती है, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना देशभर में आयोजित होने वाली कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं के लिए चेतावनी है। डिजिटल परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के लिए मल्टी-लेयर सिक्योरिटी, एन्क्रिप्शन और लाइव मॉनिटरिंग जरूरी है।

कुछ पूर्व अधिकारियों का कहना है कि परीक्षा केंद्रों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि किसी विशेष केंद्र से असामान्य परिणाम सामने आते हैं, तो वहां की व्यवस्थाओं की विस्तृत जांच होनी चाहिए।

इस प्रकरण का सामाजिक प्रभाव भी बड़ा है। युवा पीढ़ी पहले ही प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव से गुजर रही है। ऐसे मामलों से उनके मन में सिस्टम के प्रति अविश्वास पैदा होता है। इसलिए पारदर्शी और त्वरित जांच अत्यंत आवश्यक है।

आगे की कार्रवाई में संदिग्ध अभ्यर्थियों के मोबाइल, लैपटॉप और कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच हो सकती है। यदि संगठित गिरोह की भूमिका सामने आती है, तो साइबर क्राइम शाखा भी सक्रिय हो सकती है।

परीक्षा बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी उम्मीदवार को दोषी पाया गया, तो उसका परिणाम निरस्त किया जाएगा और भविष्य की परीक्षाओं से प्रतिबंधित किया जा सकता है।

यह मामला केवल 12 अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़ा है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि ‘सुपर कंप्यूटर’ जैसी तेजी के पीछे असाधारण प्रतिभा थी या तकनीकी हेरफेर।

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