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ग्रेजुएट–पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं ने बदली तस्वीर, 600 एकड़ बंजर जमीन से 5 हजार परिवारों को रोजगार

ग्रेजुएट–पोस्ट ग्रेजुएट युवा जब शहरों में नौकरी की तलाश में भटकते हैं, तो अक्सर गांवों की जमीन बंजर पड़ी रह जाती है। लेकिन असम के करीब 40 गांवों में एक अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। यहां ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं ने मिलकर ऐसी पहल शुरू की, जिसने 600 एकड़ बंजर जमीन को उपजाऊ बना दिया और करीब 5 हजार परिवारों को रोजगार से जोड़ दिया। यह मॉडल अब ग्रामीण आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बनता जा रहा है।

कुछ साल पहले तक इन गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन होता था। पढ़े-लिखे युवा गुवाहाटी, दिल्ली या बेंगलुरु जैसे शहरों में छोटी-मोटी नौकरियां करने चले जाते थे। गांवों में खेती का काम बुजुर्गों तक सीमित रह गया था। लेकिन जब स्थानीय युवाओं ने देखा कि शहर की जिंदगी में स्थिरता नहीं है और गांव की जमीन में संभावनाएं छिपी हैं, तो उन्होंने मिलकर एक संगठित कृषि मॉडल तैयार किया।

इस पहल की खास बात यह रही कि इसमें सिर्फ खेती नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग पर भी फोकस किया गया। युवाओं ने आधुनिक तकनीक अपनाई, जैविक खेती की ओर रुख किया और फसल विविधीकरण पर जोर दिया। धान के साथ-साथ सब्जियां, फल, दालें और डेयरी उत्पाद भी जोड़े गए।

हर परिवार के कम से कम चार सदस्य किसी न किसी रूप में इस अभियान से जुड़े हुए हैं। कोई खेत में काम करता है, कोई पैकेजिंग संभालता है, तो कोई ऑनलाइन मार्केटिंग का जिम्मा उठाता है। पढ़े-लिखे युवाओं ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाई। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई और किसानों की आय बढ़ी।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस मॉडल से जुड़े परिवार औसतन 40 हजार रुपये से अधिक मासिक आय अर्जित कर रहे हैं। इससे न केवल आर्थिक स्थिति सुधरी है, बल्कि गांवों में सामाजिक बदलाव भी आया है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और स्वयं सहायता समूहों के जरिए उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गई है।

इस अभियान की शुरुआत कुछ ग्रेजुएट युवाओं ने की थी, जिन्होंने कृषि विज्ञान और प्रबंधन की पढ़ाई की थी। उन्होंने महसूस किया कि यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए और उत्पादों को ब्रांडिंग के साथ बेचा जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

600 एकड़ जमीन, जो कभी बंजर थी, अब हरे-भरे खेतों में बदल चुकी है। ड्रिप इरिगेशन, सोलर पंप और आधुनिक मशीनरी का उपयोग किया जा रहा है। इससे उत्पादन लागत घटी और उत्पादकता बढ़ी।

इस मॉडल का एक महत्वपूर्ण पहलू ‘ग्रुप फार्मिंग’ है। छोटे-छोटे किसानों ने अपनी जमीन मिलाकर सामूहिक खेती शुरू की। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हुआ और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ।

राज्य सरकार और कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने भी तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण देकर इस पहल को मजबूती दी। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस मॉडल को अन्य राज्यों में अपनाया जाए, तो ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

इस पहल से सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि गांवों से पलायन लगभग रुक गया है। युवा अब गांव में ही सम्मानजनक आय कमा रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में भी सुधार देखने को मिला है, क्योंकि आय बढ़ने से परिवारों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है।

ग्रामीण विकास के विशेषज्ञों का मानना है कि यह उदाहरण बताता है कि शिक्षा केवल शहरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट युवा अपने गांवों में रहकर आधुनिक सोच के साथ काम करें, तो वे स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।

आज इन 40 गांवों में एक नई ऊर्जा दिखाई देती है। खेतों में काम करते युवा लैपटॉप और स्मार्टफोन के जरिए बाजार से जुड़े हैं। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उत्पाद तैयार कर रही हैं। बच्चे बेहतर स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

यह कहानी केवल खेती की नहीं, बल्कि सोच में बदलाव की है। जब पढ़े-लिखे युवाओं ने यह ठान लिया कि वे गांव छोड़ने के बजाय गांव को बदलेंगे, तो परिणाम भी सकारात्मक सामने आए।

आने वाले समय में इस मॉडल को और विस्तार देने की योजना है। प्रोसेसिंग यूनिट लगाने, कोल्ड स्टोरेज बनाने और निर्यात की संभावनाएं तलाशने पर काम चल रहा है।

ग्रेजुएट–पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं की यह पहल बताती है कि यदि सही दिशा और सामूहिक प्रयास हो, तो बंजर जमीन भी रोजगार का बड़ा स्रोत बन सकती है। यह मॉडल ग्रामीण भारत के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है।

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