देश के कई हिस्सों में प्याज की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने बफर स्टॉक से प्याज निकालकर ₹35 प्रति किलो की रियायती दर पर बेचने की शुरुआत की है, लेकिन इसके बावजूद देशभर में प्याज का औसत खुदरा भाव नीचे आने के बजाय बढ़ गया है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 28 अगस्त को जब सरकारी रियायती बिक्री शुरू हुई थी, तब देश में प्याज का औसत खुदरा भाव करीब ₹48.50 प्रति किलो था। 5 सितंबर तक यह बढ़कर ₹50.79 प्रति किलो पहुंच गया। यानी सरकारी हस्तक्षेप शुरू होने के बाद भी राष्ट्रीय औसत में करीब ₹2.29 प्रति किलो की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सरकार का ₹35 किलो वाला प्याज और खुले बाजार में बिकने वाला प्याज एक ही कीमत पर उपलब्ध नहीं है। सरकारी प्याज चुनिंदा शहरों में NCCF, NAFED, केंद्रीय भंडार, मोबाइल वैन और अन्य निर्धारित बिक्री केंद्रों के जरिए उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा रहा है। दूसरी तरफ आम बाजार में प्याज की कीमत मांग, आपूर्ति, मंडी आवक, परिवहन लागत, भंडारण और स्थानीय बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से तय होती है। यही वजह है कि किसी शहर में सरकारी केंद्र पर ₹35 किलो प्याज उपलब्ध हो सकता है, लेकिन उसी शहर की सामान्य सब्जी मंडी या रिटेल दुकान पर कीमत इससे काफी ज्यादा हो सकती है। सरकार ने 2026 के लिए करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक तैयार किया है और कीमतों में तेजी आने पर इसी स्टॉक को चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जा रहा है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक सरकारी हस्तक्षेप के पहले 10 दिनों में करीब 4,000 टन बफर प्याज 17 शहरों में बेचा जा चुका है। केंद्र सरकार की ओर से NCCF और NAFED के माध्यम से यह बिक्री की जा रही है। उत्पादन वाले क्षेत्रों से बड़े उपभोग केंद्रों तक प्याज पहुंचाने के लिए सड़क परिवहन के साथ रेलवे की विशेष मालगाड़ी ‘कांदा एक्सप्रेस’ का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य केवल सस्ता प्याज बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन बाजारों में आपूर्ति बढ़ाना भी है जहां मांग के मुकाबले उपलब्धता कम होने के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
5 सितंबर को प्रमुख शहरों में प्याज के भाव में काफी अंतर देखने को मिला। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार चेन्नई में प्याज करीब ₹63 प्रति किलो, मुंबई में ₹53 और रांची में ₹40 प्रति किलो के आसपास रहा। दिल्ली के भाव को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में अंतर है—एक रिपोर्ट में ₹58 प्रति किलो का आंकड़ा दिया गया है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में दिल्ली का भाव ₹65 प्रति किलो बताया गया है। इसलिए दिल्ली के लिए स्थानीय बाजार और रिपोर्टिंग स्रोत के अनुसार कीमत अलग-अलग दिखाई दे सकती है।
यह अंतर इस बात को भी दिखाता है कि प्याज का राष्ट्रीय औसत किसी एक शहर की वास्तविक खुदरा कीमत को पूरी तरह नहीं दर्शाता। देशभर का औसत ₹50.79 होने का मतलब यह नहीं है कि हर शहर में प्याज इसी कीमत पर मिल रहा है। कुछ शहरों में यह ₹40 के आसपास है, तो कुछ बड़े महानगरों में ₹60 या उससे ऊपर भी पहुंच चुका है। इसी तरह सरकारी बिक्री वाले केंद्रों पर ₹35 किलो की कीमत आम बाजार के भाव से काफी कम है, लेकिन वहां उपलब्धता सीमित स्थानों और वितरण केंद्रों पर निर्भर करती है।
केंद्र सरकार ने 26 अगस्त से बफर स्टॉक जारी करने की प्रक्रिया तेज की थी। सरकार ने बताया था कि प्याज को उत्पादक क्षेत्रों से प्रमुख खपत केंद्रों तक पहुंचाने के लिए रेलवे और सड़क परिवहन का हाइब्रिड मॉडल अपनाया जाएगा। नासिक जैसे प्रमुख प्याज उत्पादन क्षेत्र से दिल्ली की ओर ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए प्याज भेजी गई। इसके अलावा जरूरत के हिसाब से ट्रकों के माध्यम से भी सप्लाई बढ़ाई जा रही है। सरकार के अनुसार प्याज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और मौसमी कीमतों के दबाव को कम करने के लिए यह व्यवस्था की गई है।
सरकार का कहना है कि बफर स्टॉक की बिक्री का स्थानीय स्तर पर असर दिखाई दे रहा है। उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे के अनुसार जिन क्षेत्रों में सरकारी बफर प्याज पहुंचाई गई है, वहां स्थानीय कीमतों में करीब ₹2 से ₹3 प्रति किलो तक की नरमी देखी गई है। NCCF की ओर से भी बताया गया है कि सरकारी प्याज को सीधे रिटेल स्तर पर ₹35 प्रति किलो की दर से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने पर जोर है। NCCF ने अलग-अलग शहरों में अब तक करीब 1,500 टन बफर प्याज बेचने की जानकारी दी है।
फिर सवाल यह है कि अगर सरकारी प्याज की बिक्री से कुछ इलाकों में कीमत कम हो रही है तो पूरे देश का औसत भाव क्यों बढ़ रहा है? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बफर स्टॉक की बिक्री अभी पूरे देश के बाजार का एक छोटा हिस्सा कवर कर रही है। 4,000 टन प्याज की बिक्री 17 शहरों में हुई है, जबकि भारत में प्याज की खपत बहुत बड़ी है। किसी शहर या इलाके में सरकारी प्याज की उपलब्धता बढ़ने से वहां कीमत पर असर पड़ सकता है, लेकिन पूरे देश के औसत भाव को नीचे लाने के लिए बड़े पैमाने पर और लगातार आपूर्ति की जरूरत होती है।
इसके अलावा प्याज की कीमत केवल सरकारी स्टॉक से नियंत्रित नहीं होती। मंडियों में आने वाली नई फसल की मात्रा, पुरानी फसल का स्टॉक, बारिश से हुआ नुकसान, परिवहन, भंडारण, स्थानीय मांग और खुदरा विक्रेताओं की लागत जैसे कई कारक कीमत तय करते हैं। यदि किसी अवधि में मंडियों में आवक कम होती है और मांग बनी रहती है तो थोक भाव बढ़ सकता है। थोक कीमत बढ़ने का असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार तक पहुंचता है।
इस समय प्याज की कीमतों पर मौसम का भी असर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपभोक्ता मामलों की सचिव के अनुसार इस साल रबी सीजन की प्याज फसल को कटाई के समय बेमौसम बारिश से नुकसान हुआ था। रबी प्याज भारत की सालभर की सप्लाई व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा स्टोरेज में रखा जाता है और बाद के महीनों में बाजार में उतारा जाता है। अगर भंडारण योग्य प्याज की मात्रा कम हो जाती है तो ऑफ-सीजन में सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है।
यही वजह है कि प्याज की कीमतों में तेजी केवल आज की मंडी आवक का मामला नहीं है। इसका संबंध पिछले सीजन की पैदावार, भंडारण में बची मात्रा और अगले सीजन की फसल की टाइमिंग से भी जुड़ा है। प्याज ऐसी सब्जी है जिसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है, लेकिन स्टोरेज के दौरान खराब होने और वजन कम होने जैसी समस्याएं भी होती हैं। इसलिए किसानों, व्यापारियों और सरकारी एजेंसियों को उत्पादन और स्टॉक के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
आने वाले दिनों में सरकार की नजर खरीफ प्याज की नई फसल पर भी है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अक्टूबर के मध्य से नई फसल की आवक बढ़ने की उम्मीद है। अगर नई फसल की मंडियों में पर्याप्त आवक होती है तो बाजार में सप्लाई बढ़ सकती है और इससे कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है। हालांकि, नई फसल की वास्तविक आवक मौसम, उत्पादन और मंडी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि अक्टूबर आते ही प्याज निश्चित रूप से सस्ता हो जाएगा।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सस्ता प्याज केवल कागज पर उपलब्ध न रहे, बल्कि वास्तविक रूप से आम उपभोक्ता तक पहुंचे। यदि किसी शहर में सरकारी बिक्री केंद्र सीमित हैं या वहां प्याज की मात्रा जल्दी खत्म हो जाती है, तो उपभोक्ता को खुले बाजार से ही प्याज खरीदना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकारी ₹35 किलो की कीमत और खुले बाजार की ₹55-65 किलो की कीमत के बीच बड़ा अंतर बना रहता है।
इसीलिए सरकार ने मोबाइल वैन का इस्तेमाल बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। मोबाइल वैन का फायदा यह है कि इन्हें उन इलाकों तक ले जाया जा सकता है जहां आम लोगों को सरकारी आउटलेट तक पहुंचने में परेशानी होती है। दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में इस तरह की बिक्री शुरू की गई है। केंद्र ने 19 शहरों तक ₹35 किलो प्याज की बिक्री का दायरा बढ़ाने की जानकारी दी है। दिल्ली को अतिरिक्त सप्लाई देने के लिए 1,000 मीट्रिक टन प्याज उपलब्ध कराने की योजना भी सामने आई है।
तमिलनाडु में भी प्याज की बढ़ती कीमतों को देखते हुए राज्य सरकार ने शहरी राशन दुकानों के जरिए ₹35 प्रति किलो की दर पर प्याज बेचने की व्यवस्था शुरू की है। रिपोर्टों के अनुसार राज्य में खुले बाजार में प्याज करीब ₹55 से ₹60 किलो के बीच बिक रहा था, जिसके बाद सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए रियायती बिक्री का फैसला किया।
इससे यह साफ होता है कि प्याज की महंगाई अब केवल एक राज्य या एक शहर की समस्या नहीं रह गई है। अलग-अलग राज्य सरकारें और केंद्र सरकार अपने-अपने स्तर पर बाजार में हस्तक्षेप कर रहे हैं। लेकिन लंबे समय में केवल सरकारी बिक्री से कीमतों को नियंत्रित रखना मुश्किल होता है। इसके लिए उत्पादन, भंडारण, परिवहन और मंडी व्यवस्था को भी मजबूत करना जरूरी है।
प्याज के मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों में संतुलन बनाना पड़ता है। अगर सरकार बाजार भाव को बहुत नीचे लाने की कोशिश करती है तो किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम नहीं मिल सकता। दूसरी तरफ अगर बाजार में कीमत बहुत तेजी से बढ़ती है तो इसका सीधा असर आम परिवारों के बजट पर पड़ता है। इसलिए सरकार का बफर स्टॉक मॉडल इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश करता है—जब कीमतें तेजी से बढ़ें तो स्टॉक बाजार में उतारकर उपभोक्ताओं को राहत दी जाए और जब बाजार सामान्य हो तो सरकारी हस्तक्षेप सीमित रखा जाए।
2026 के लिए सरकार के पास 1.21 लाख टन का प्याज बफर स्टॉक होना इसी रणनीति का हिस्सा है। उत्पादन वाले राज्यों से प्याज खरीदकर इसे जरूरत के समय इस्तेमाल करने के लिए रखा जाता है। जब किसी अवधि में आपूर्ति कम होने लगती है या कीमतें बढ़ती हैं तो इस स्टॉक से प्याज बाजार में उतारा जाता है। इस साल भी यही प्रक्रिया अपनाई गई है और रेलवे की ‘कांदा एक्सप्रेस’ तथा ट्रकों के जरिए प्याज को प्रमुख खपत केंद्रों तक पहुंचाया जा रहा है।
लेकिन फिलहाल आंकड़े बताते हैं कि सरकारी हस्तक्षेप का असर पूरे देश के औसत भाव पर निर्णायक रूप से नहीं पड़ा है। 28 अगस्त के ₹48.50 प्रति किलो के औसत खुदरा भाव से 5 सितंबर तक कीमत ₹50.79 प्रति किलो हो गई। यानी सरकार द्वारा रियायती बिक्री शुरू करने के बावजूद राष्ट्रीय औसत में गिरावट नहीं आई। हालांकि सरकार और NCCF का कहना है कि जहां सीधे बफर प्याज पहुंची है, वहां स्थानीय स्तर पर ₹2-3 किलो तक राहत मिली है। इन दोनों बातों को एक साथ देखने पर तस्वीर यह बनती है कि सरकारी हस्तक्षेप कुछ स्थानीय बाजारों में असरदार है, लेकिन अभी उसका प्रभाव पूरे देश के औसत बाजार भाव को नीचे लाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
आम उपभोक्ता के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आपके शहर में सरकारी ₹35 किलो प्याज उपलब्ध है तो खुले बाजार के मुकाबले वहां से खरीदारी करना आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकती है। हालांकि सरकारी बिक्री की उपलब्धता, मात्रा और बिक्री केंद्र शहर के हिसाब से अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल यह सुनकर कि सरकार ₹35 किलो प्याज बेच रही है, यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर दुकान पर प्याज ₹35 किलो मिल रहा है। खुले बाजार की कीमत अभी भी काफी अधिक हो सकती है।
दिल्ली, चेन्नई और मुंबई जैसे बड़े शहरों में कीमतों पर खास नजर इसलिए भी रहती है क्योंकि ये बड़े खपत केंद्र हैं। इन शहरों में मांग ज्यादा होने के कारण सप्लाई में थोड़ी भी कमी कीमतों पर असर डाल सकती है। चेन्नई में ₹63 किलो तक पहुंचा भाव इसका उदाहरण है। दिल्ली के मामले में उपलब्ध रिपोर्टों में ₹58 से ₹65 प्रति किलो तक के आंकड़े सामने आए हैं, जो अलग-अलग बाजारों या रिपोर्टिंग समय के अंतर को दर्शा सकते हैं।
वहीं रांची में करीब ₹40 किलो का भाव यह दिखाता है कि देशभर में प्याज की कीमत एक जैसी नहीं है। उत्पादन क्षेत्रों के नजदीक या जहां आपूर्ति बेहतर है, वहां कीमत अपेक्षाकृत कम रह सकती है। इसके विपरीत बड़े खपत केंद्रों तक प्याज पहुंचाने में परिवहन और वितरण लागत जुड़ती है, जिससे खुदरा कीमत बढ़ सकती है।
आने वाले कुछ सप्ताह प्याज बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। एक तरफ सरकार अपने बफर स्टॉक को बाजार में उतार रही है, दूसरी तरफ खरीफ फसल की नई आवक का इंतजार है। यदि बफर स्टॉक की सप्लाई बड़े शहरों तक लगातार बढ़ती है और नई फसल की आवक भी उम्मीद के मुताबिक रहती है, तो कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन अगर मौसम खराब रहता है, मंडियों में आवक कमजोर रहती है या मांग बढ़ती है तो कीमतों पर दबाव कुछ और समय बना रह सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यही है कि सरकारी ₹35 किलो की बिक्री शुरू होने के बावजूद देश का औसत खुदरा प्याज भाव ₹48.50 से बढ़कर ₹50.79 प्रति किलो हो गया है। करीब 4,000 टन बफर प्याज 17 शहरों में पहुंचाई जा चुकी है और सरकार के पास अभी भी बड़ा बफर स्टॉक मौजूद है। इसलिए आने वाले दिनों में सरकार इस स्टॉक से कितनी मात्रा बाजार में उतारती है और किस शहर में कितनी सप्लाई पहुंचती है, यह कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
कुल मिलाकर प्याज की मौजूदा महंगाई यह बताती है कि सिर्फ सस्ता प्याज घोषित कर देना बाजार भाव को तुरंत नीचे लाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। सरकारी स्टॉक को सही समय पर सही शहर तक पहुंचाना, वितरण व्यवस्था मजबूत करना, मंडियों में पर्याप्त आवक बनाए रखना और नई फसल के आने तक सप्लाई का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। सरकार की ₹35 किलो वाली बिक्री से कुछ उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिल रही है, लेकिन राष्ट्रीय औसत कीमत में अभी तक गिरावट नहीं आई है। अब नजर अक्टूबर की नई फसल की आवक और अगले कुछ हफ्तों में बफर स्टॉक की सप्लाई पर रहेगी। अगर दोनों मोर्चों पर पर्याप्त प्याज बाजार में पहुंचता है, तो आम आदमी को रसोई के बजट में राहत मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।
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