पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई बड़े शहरों में गर्मी का असर लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत समेत कई देशों में गर्मी के मौसम की अवधि लंबी होती दिखाई दे रही है और तापमान भी पहले की तुलना में अधिक दर्ज किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मौसम का सामान्य बदलाव नहीं है बल्कि इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय और शहरी कारण छिपे हुए हैं।
भारत के कई शहरों में गर्मी की स्थिति पहले से ज्यादा गंभीर हो चुकी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले दशक में गर्म दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कई जगहों पर गर्मी का मौसम एक महीने तक लंबा हो गया है और तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण तेजी से बढ़ता शहरीकरण माना जा रहा है। शहरों में आबादी बढ़ने के साथ-साथ कंक्रीट और डामर का उपयोग भी तेजी से बढ़ा है। बड़ी-बड़ी इमारतें, सड़कों का विस्तार और औद्योगिक गतिविधियां शहरों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।
जब किसी क्षेत्र में पेड़-पौधों की जगह कंक्रीट और डामर ले लेते हैं तो वहां की जमीन सूर्य की गर्मी को अधिक मात्रा में अवशोषित करने लगती है। दिन के समय यह सतह गर्मी को अपने भीतर जमा कर लेती है और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती रहती है। इसी कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक हो जाता है। इस घटना को वैज्ञानिक भाषा में “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव कहा जाता है।
शहरों में हरियाली की कमी भी गर्मी बढ़ने का एक बड़ा कारण है। पेड़-पौधे प्राकृतिक रूप से वातावरण को ठंडा रखने में मदद करते हैं। वे सूर्य की किरणों को अवशोषित करते हैं और वाष्पीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से वातावरण में नमी बनाए रखते हैं। लेकिन जब शहरों में हरियाली कम हो जाती है तो यह प्राकृतिक संतुलन टूट जाता है और तापमान बढ़ने लगता है।
इसके अलावा वाहनों और उद्योगों से निकलने वाली गर्मी भी शहरों के तापमान को बढ़ाने में योगदान देती है। बड़े शहरों में लाखों वाहन रोजाना सड़कों पर चलते हैं और उनसे निकलने वाली गर्मी और प्रदूषण वातावरण को और अधिक गर्म बना देते हैं।
जलवायु परिवर्तन भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। वैश्विक स्तर पर तापमान बढ़ने के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव आ रहा है। कई क्षेत्रों में हीटवेव की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्रता के साथ देखने को मिल रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में शहरों में रहने वाले लोगों के लिए गर्मी का सामना करना और अधिक कठिन हो सकता है। अत्यधिक तापमान स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय से जुड़ी समस्याएं गर्मी के कारण बढ़ सकती हैं।
कृषि क्षेत्र भी इससे प्रभावित हो सकता है। तापमान बढ़ने के कारण कई फसलों की उत्पादकता कम हो सकती है। इससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है।
शहरी योजनाकारों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए शहरों के विकास की योजना में बदलाव जरूरी है। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, जल निकायों का संरक्षण करना और पर्यावरण अनुकूल निर्माण तकनीकों को अपनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
कुछ शहरों में “ग्रीन रूफ” और “कूल रूफ” जैसी तकनीकों का उपयोग शुरू किया गया है। इन तकनीकों में इमारतों की छतों पर विशेष सामग्री या पौधों का उपयोग किया जाता है जिससे तापमान कम करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा शहरी जल निकायों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। झीलें और तालाब आसपास के वातावरण को ठंडा रखने में मदद करते हैं। लेकिन कई शहरों में इन जल निकायों को भरकर निर्माण कार्य किए गए हैं, जिससे प्राकृतिक तापमान संतुलन प्रभावित हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। सरकार, शहरी योजनाकारों और आम नागरिकों को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे शहरों में गर्मी के प्रभाव को कम किया जा सके।
यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाते हैं तो शहरों को अधिक रहने योग्य बनाया जा सकता है। लेकिन यदि इस समस्या को नजरअंदाज किया गया तो आने वाले समय में गर्मी की चुनौती और अधिक गंभीर रूप ले सकती है।
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