भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। मई महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI ने भारतीय बाजार से करीब ₹14,231 करोड़ निकाल लिए हैं।
इसके साथ ही साल 2026 में अब तक कुल बिकवाली का आंकड़ा करीब ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल मार्केट में बढ़ती अनिश्चितता इसकी सबसे बड़ी वजह है।
दुनियाभर में आर्थिक और राजनीतिक हालात लगातार बदल रहे हैं, जिसका असर निवेशकों की रणनीति पर दिखाई दे रहा है।
अमेरिका और यूरोप समेत कई बड़े बाजारों में ब्याज दर, महंगाई और आर्थिक मंदी की आशंकाओं ने निवेशकों को सतर्क बना दिया है।
ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक जोखिम कम करने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालते हैं।
India जैसे बाजारों पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
हालांकि भारतीय बाजार लंबे समय से मजबूत प्रदर्शन करता रहा है, लेकिन वैश्विक दबाव के कारण उतार-चढ़ाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर शेयर बाजार के सेंटीमेंट पर पड़ता है।
जब बड़े निवेशक लगातार पैसा निकालते हैं, तो बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
हालांकि घरेलू निवेशकों की भागीदारी ने भारतीय बाजार को कुछ हद तक संभालने में मदद की है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिटेल निवेशकों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
इसी वजह से कई बार विदेशी बिकवाली के बावजूद बाजार पूरी तरह टूटता नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की लंबी अवधि की संभावनाएं अब भी मजबूत मानी जाती हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग में लगातार निवेश हो रहा है।
लेकिन छोटी अवधि में ग्लोबल फैक्टर्स बाजार को प्रभावित कर सकते हैं।
कई निवेशकों के लिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या यह गिरावट निवेश का मौका बन सकती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान घबराने के बजाय लंबी अवधि की रणनीति अपनानी चाहिए।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेशकों को केवल विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निर्भर होकर फैसले नहीं लेने चाहिए।
कंपनियों के फंडामेंटल और आर्थिक स्थिति को समझना ज्यादा जरूरी होता है।
आज के समय में ग्लोबल मार्केट पहले से ज्यादा आपस में जुड़े हुए हैं।
इसलिए दुनिया के किसी भी बड़े आर्थिक बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी तेजी से दिखाई देता है।
कुल मिलाकर मई महीने की विदेशी बिकवाली यह संकेत देती है कि वैश्विक अनिश्चितता अभी भी बाजारों पर दबाव बनाए हुए है, लेकिन भारतीय बाजार की लंबी अवधि की ताकत को विशेषज्ञ अब भी सकारात्मक मान रहे हैं।
