महाराष्ट्र में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हजारों छात्रों का गुस्सा अब सड़क पर दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग यानी MPSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सोमवार 7 सितंबर 2026 को पुणे में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने ओंकारेश्वर मंदिर चौक से पुणे जिला कलेक्टर कार्यालय तक ‘आक्रोश मोर्चा’ निकाला। छात्रों की सबसे बड़ी मांगों में MPSC अध्यक्ष और सचिव के इस्तीफे के साथ-साथ कथित पेपर लीक मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, संदिग्ध परीक्षाओं का फॉरेंसिक ऑडिट और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता शामिल है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी वजह MPSC की ड्रग इंस्पेक्टर ग्रुप-B भर्ती परीक्षा को लेकर उठा पेपर लीक विवाद है। यह परीक्षा 22 मार्च 2026 को महाराष्ट्र के छह संभागीय मुख्यालयों में आयोजित की गई थी। परीक्षा के बाद परिणाम भी जारी हुआ और इंटरव्यू प्रक्रिया भी आगे बढ़ी, लेकिन बाद में प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले कुछ अभ्यर्थियों तक पहुंचने के आरोप सामने आए। प्रारंभिक जांच के बाद MPSC ने इस भर्ती प्रक्रिया को ही रद्द करने का फैसला लिया। अब जिन उम्मीदवारों ने महीनों तैयारी की थी, वे इस बात को लेकर नाराज हैं कि अगर परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी तो इसकी जानकारी सामने आने में इतना समय क्यों लगा और पूरी प्रक्रिया में शामिल ईमानदार उम्मीदवारों का क्या होगा।
पुणे में हुए सोमवार के प्रदर्शन में छात्रों ने साफ कहा कि मामला केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक MPSC की अलग-अलग परीक्षाओं में प्रक्रिया, रिजल्ट, मूल्यांकन और प्रशासनिक फैसलों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इसी वजह से आंदोलनकारियों ने 12 सूत्रीय मांगों का एक विस्तृत चार्टर सामने रखा है। छात्रों का कहना है कि जब तक इन शिकायतों की स्वतंत्र तरीके से जांच नहीं होती और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक आयोग की विश्वसनीयता बहाल करना मुश्किल होगा।
पुणे के इस प्रदर्शन को राजनीतिक समर्थन भी मिला। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले और विधायक रोहित पवार समेत विपक्षी नेताओं ने आंदोलन में छात्रों के साथ मौजूदगी दर्ज कराई। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने MPSC नेतृत्व के खिलाफ नारे लगाए और आयोग के अध्यक्ष व सचिव को हटाने या उनके इस्तीफे की मांग की। आंदोलनकारियों ने सरकार को तीन दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
छात्रों की नाराजगी के केंद्र में सबसे पहले ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा का मामला है। यह भर्ती महाराष्ट्र के Food and Drug Administration विभाग में ग्रुप-B ड्रग इंस्पेक्टर पदों के लिए थी। 22 मार्च को स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित की गई थी। MPSC ने 12 जून को इसका परिणाम घोषित किया था, जिसमें 506 उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट हुए थे। इनमें से 488 उम्मीदवार इंटरव्यू प्रक्रिया में शामिल हुए, जो 1 जुलाई से 22 जुलाई के बीच आयोजित हुई थी। इसके बाद पेपर लीक की शिकायत सामने आने से पूरी भर्ती प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई।
जुलाई के अंतिम सप्ताह में इस मामले ने तेजी पकड़ी। शिकायतों के आधार पर जांच शुरू हुई और बाद में MPSC ने भर्ती प्रक्रिया रद्द कर दी। आयोग के फैसले के अनुसार कुछ उम्मीदवारों के पास परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र या प्रश्न पहुंचने की शिकायतों की प्रारंभिक जांच की गई थी। इस जांच के बाद आयोग ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने और दोबारा परीक्षा आयोजित करने का रास्ता अपनाया। हालांकि नई परीक्षा की तारीख को लेकर उम्मीदवारों में अभी भी स्पष्टता का इंतजार है।
मामला इसलिए भी गंभीर हो गया क्योंकि पुलिस जांच में कई लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई। रिपोर्टों के मुताबिक मुंबई क्राइम ब्रांच ने ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में MPSC के एक अवर सचिव और दो असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर्स समेत छह लोगों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार लोगों में एक कोचिंग संस्थान से जुड़े व्यक्ति और अन्य लोग भी शामिल बताए गए। पुलिस की जांच इस बात पर केंद्रित है कि प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले बाहर कैसे पहुंचा और किन लोगों तक पहुंचा।
मामले में एक चौंकाने वाला एंगल उस शिकायत से जुड़ा है, जिसके सामने आने के बाद कथित पेपर लीक की जांच तेज हुई। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक जांच में आरोप है कि पेपर एक कोचिंग संचालक से एक महिला अभ्यर्थी और फिर उसके बॉयफ्रेंड तक पहुंचा था। रिपोर्ट में बताया गया कि रिश्ते में विवाद के बाद पूर्व बॉयफ्रेंड की ओर से शिकायत सामने आई, जिसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ी। यह पूरा घटनाक्रम जांच का हिस्सा है और अदालत या जांच एजेंसियों की अंतिम निष्कर्ष के बिना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि कथित लीक हुए प्रश्नपत्र के कई सवाल वास्तविक परीक्षा में आए थे। NDTV की रिपोर्ट में जांच से जुड़े दावों के आधार पर बताया गया कि कथित तौर पर 294 लीक प्रश्नों में से 77 प्रश्न 22 मार्च की परीक्षा में मैच हुए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक अभ्यर्थी को परीक्षा से दो दिन पहले कथित तौर पर पेपर मिला था और उसने सातवीं रैंक हासिल की। हालांकि इन दावों को जांच के अंतिम और न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यही वजह है कि छात्रों का गुस्सा केवल भर्ती रद्द होने पर नहीं है। उनका सवाल है कि अगर पेपर लीक की शिकायत परीक्षा के बाद सामने आई और जांच में गंभीर तथ्य मिले, तो परीक्षा परिणाम और इंटरव्यू तक प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ी। उम्मीदवारों का कहना है कि उन्होंने कई महीनों और कई बार वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है। ऐसे में अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी होती है तो उसका नुकसान केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। उम्र, आर्थिक स्थिति, दूसरी नौकरियों के मौके और तैयारी में लगाया गया समय—सब पर इसका असर पड़ सकता है।
छात्रों की 12 सूत्रीय मांगों में MPSC अध्यक्ष और सचिव के इस्तीफे की मांग सबसे ऊपर है। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि इन पदों पर ऐसे अधिकारियों को नियुक्त किया जाए जिनकी छवि साफ हो और जिन पर परीक्षा प्रक्रिया को लेकर कोई सवाल न हो। इसके अलावा ग्रुप-B परीक्षा से जुड़ी आपत्तियों पर आठ दिनों के भीतर स्पष्टीकरण देने की मांग की गई है। छात्रों का कहना है कि आयोग को केवल सामान्य बयान जारी करने के बजाय प्रत्येक गंभीर शिकायत का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए।
छात्रों ने 2025 राज्य सेवा मुख्य परीक्षा और कृषि सेवा परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि मूल्यांकन में कथित गलतियों की स्वतंत्र जांच हो। इसके अलावा मुंबई क्राइम ब्रांच ने MPSC को जो प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी है, उसे सार्वजनिक करने की मांग भी आंदोलनकारियों ने की है। उनका तर्क है कि यदि रिपोर्ट में परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर बातें सामने आई हैं तो उम्मीदवारों को भी यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि जांच में क्या पाया गया।
एक और बड़ी मांग गिरफ्तार MPSC अवर सचिव अभिजीत लेंडवे के कार्यकाल से जुड़ी परीक्षाओं के फॉरेंसिक ऑडिट की है। छात्रों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी पर पेपर लीक मामले में गंभीर आरोप हैं तो केवल एक परीक्षा की जांच पर्याप्त नहीं होनी चाहिए। उनके कार्यकाल में आयोजित दूसरी परीक्षाओं के परिणाम और प्रक्रिया की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। इसी क्रम में आरोपों में नाम आए अन्य अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड और प्रमोशन के आधार की जांच की मांग भी की गई है।
छात्रों ने उन उम्मीदवारों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच की मांग भी रखी है, जिनके कथित तौर पर मामले में आरोपी अधिकारियों या बिचौलियों से संपर्क होने का शक है। इसके साथ ही कथित दलालों और एजेंटों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है। इन मांगों का मकसद यह पता लगाना है कि अगर प्रश्नपत्र वास्तव में परीक्षा से पहले बाहर गया था तो उसके पीछे सिर्फ कुछ लोग थे या कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था।
ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा के संदिग्ध परिणामों का फॉरेंसिक ऑडिट भी छात्रों की मांगों में शामिल है। उनका कहना है कि यदि परीक्षा में कुछ उम्मीदवारों को अनुचित फायदा मिलने की आशंका है तो केवल पेपर लीक की घटना की जांच करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखा जाना चाहिए कि परीक्षा के परिणामों में कोई असामान्य पैटर्न दिखाई देता है या नहीं। हालांकि किसी उम्मीदवार की अच्छी रैंक या असामान्य प्रदर्शन अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच ही अंतिम आधार हो सकती है।
आंदोलनकारियों ने 25 अक्टूबर 2026 को होने वाली ग्रुप-C प्रारंभिक परीक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। वे चाहते हैं कि इस परीक्षा की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और पेपर की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्र, निगरानी, मूल्यांकन और परिणाम तक हर स्तर पर भरोसेमंद व्यवस्था बनाई जाए। छात्रों का कहना है कि अगर लगातार पेपर लीक और गड़बड़ी की खबरें सामने आती रहेंगी तो प्रतियोगी परीक्षाओं की पूरी व्यवस्था पर युवाओं का विश्वास कमजोर होगा।
महाराष्ट्र सरकार ने भी इस बढ़ते विवाद के बीच परीक्षा प्रणाली की समीक्षा के लिए कदम उठाया है। राज्य सरकार ने भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, सुरक्षा और विश्वसनीयता की समीक्षा के लिए अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है। समिति छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों और जनप्रतिनिधियों से सुझाव लेने वाली है। पुणे में 7 से 10 सितंबर तक सुझाव लेने के लिए विशेष सेल भी बनाया गया है और 12 सितंबर को सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में छात्रों से सीधे संवाद की योजना है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी छात्रों से जुड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के बाद परीक्षा प्रणाली में सुधार का आश्वासन दिया है। सरकार की ओर से कहा गया है कि पेपर लीक जैसी घटनाओं में जिम्मेदार पाए जाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी और परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा। पेपर लीक रोकने के लिए नए कानून की दिशा में भी काम करने की बात सामने आई है। दूसरी तरफ छात्रों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं बल्कि समयबद्ध कार्रवाई चाहिए।
MPSC अध्यक्ष विवेक भिमनवार की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक विवाद चल रहा है। अध्यक्ष की ओर से कहा गया है कि ड्रग इंस्पेक्टर पेपर लीक की घटना उनके कार्यभार संभालने से पहले की है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने अध्यक्ष पद का कार्यभार मार्च 2026 में संभाला, जबकि पेपर लीक की घटना जनवरी 2026 से जुड़ी बताई गई है। इसलिए उन्होंने अपने खिलाफ लगाए जा रहे व्यक्तिगत आरोपों को खारिज किया है। यह विवाद अब छात्रों की ओर से उनके इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका है।
यही वजह है कि पुणे का प्रदर्शन केवल एक भर्ती परीक्षा का विरोध नहीं रह गया है। यह परीक्षा व्यवस्था में भरोसे का सवाल बन चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र आमतौर पर कई साल तक एक ही लक्ष्य के लिए पढ़ाई करते हैं। एक परीक्षा की तारीख आने से पहले महीनों तक नोट्स, टेस्ट सीरीज, कोचिंग, यात्रा और आवेदन पर खर्च होता है। अगर परीक्षा रद्द हो जाती है तो उम्मीदवार को दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इससे समय और पैसे के साथ मानसिक दबाव भी बढ़ता है।
महाराष्ट्र में चल रहा यह आंदोलन देश के अलग-अलग हिस्सों में परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठ रहे छात्र आंदोलनों की व्यापक पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है। छात्रों का मुद्दा मूल रूप से एक ही है—परीक्षा हो तो निष्पक्ष हो, पेपर सुरक्षित हो, मूल्यांकन पारदर्शी हो और अगर गड़बड़ी मिले तो दोषियों पर कार्रवाई हो। यही कारण है कि MPSC के छात्र भी अब केवल ड्रग इंस्पेक्टर भर्ती का जवाब नहीं मांग रहे, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं।
राजनीतिक दलों के शामिल होने से इस मामले का राजनीतिक रंग जरूर गहरा हुआ है, लेकिन छात्रों की मूल चिंता रोजगार और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया को लेकर है। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है, जबकि सरकार ने उच्चस्तरीय समिति और जांच की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है। अब सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि जांच कितनी स्वतंत्र होती है, रिपोर्ट कब सामने आती है और दोष साबित होने पर कितनी जल्दी कार्रवाई होती है।
फिलहाल छात्रों ने सरकार को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है। उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन और तेज करने की चेतावनी दी गई है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि वे महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में आंदोलन का विस्तार कर सकते हैं। नागपुर और अन्य स्थानों पर भी छात्रों की गतिविधियां बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
MPSC के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल एक परीक्षा को दोबारा आयोजित करना नहीं है। असली चुनौती उम्मीदवारों का भरोसा वापस हासिल करना है। अगर किसी परीक्षा में पेपर लीक की पुष्टि होती है तो दोषियों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि दोबारा होने वाली परीक्षा में ऐसी घटना न हो। पेपर की प्रिंटिंग और स्टोरेज से लेकर परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी। डिजिटल और ऑफलाइन दोनों स्तर पर निगरानी बढ़ानी होगी और शिकायतों के लिए तेज और भरोसेमंद तंत्र बनाना होगा।
ड्रग इंस्पेक्टर भर्ती को रद्द करने के बाद अब सबसे ज्यादा इंतजार नई परीक्षा की प्रक्रिया का रहेगा। जिन उम्मीदवारों ने पहले परीक्षा दी थी, उनके सामने यह सवाल भी है कि नई परीक्षा में उन्हें फिर से किस प्रक्रिया से गुजरना होगा और क्या उम्र या अन्य पात्रता संबंधी किसी समस्या से उन्हें नुकसान होगा। सरकार और आयोग के लिए जरूरी होगा कि इन सभी सवालों पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएं।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में MPSC को लेकर शुरू हुआ छात्रों का आक्रोश अब एक बड़े परीक्षा सुधार आंदोलन में बदलता दिखाई दे रहा है। ड्रग इंस्पेक्टर पेपर लीक विवाद ने उस असंतोष को और बढ़ा दिया है, जिसे छात्र लंबे समय से परीक्षा प्रक्रिया और भर्ती में कथित अनियमितताओं के कारण महसूस कर रहे थे। पुणे में हजारों छात्रों का सड़क पर उतरना बताता है कि यह मामला उनके लिए कितना गंभीर है। अब सरकार ने समिति बनाकर सुधार की प्रक्रिया शुरू करने का दावा किया है, लेकिन छात्रों की नजर उसके नतीजों पर है।
आने वाले दिनों में इस पूरे मामले में पुलिस जांच, MPSC की कार्रवाई, सरकार की उच्चस्तरीय समिति और छात्रों के आंदोलन—चारों पर नजर रहेगी। अगर जांच में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं के आरोप साबित होते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के साथ-साथ परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की जरूरत होगी। वहीं अगर किसी आरोप की पुष्टि नहीं होती है तो आयोग को भी तथ्यों और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करके उम्मीदवारों की शंकाएं दूर करनी होंगी। फिलहाल इतना साफ है कि महाराष्ट्र के हजारों MPSC अभ्यर्थी केवल नौकरी की परीक्षा नहीं, बल्कि निष्पक्ष और भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था की मांग को लेकर सड़क पर हैं।
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