भारत में डिजिटल पेमेंट की पहचान बन चुके UPI को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकार ने साफ किया है कि UPI से जुड़े नए Merchant Discount Rate यानी MDR के फैसले के पीछे किसी तरह का विदेशी दबाव नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस और विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया है कि लंबे समय से मुफ्त चल रहे UPI पेमेंट सिस्टम में अब कुछ बड़े व्यापारी लेनदेन पर शुल्क लगाने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या इस बदलाव का फायदा अमेरिकी कार्ड कंपनियों को मिल सकता है। इसी राजनीतिक और आर्थिक विवाद के बीच UPI पर प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की खबर सामने आई है। यानी मामला अब केवल सरकार और विपक्ष की बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायिक जांच के दायरे में भी पहुंच गया है।
नए नियमों के मुताबिक 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा Person-to-Merchant यानी P2M UPI transactions पर 0.4% Merchant Discount Rate लागू होगा। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि Person-to-Person यानी P2P transactions पर किसी भी रकम के लिए UPI शुल्क नहीं लगेगा। इसी तरह ₹2,000 तक के merchant transactions और निर्धारित zero-MDR श्रेणी में आने वाले छोटे कारोबारियों के लेनदेन भी शुल्क से बाहर रहेंगे। वित्त मंत्रालय के अनुसार करीब 96% P2M transactions इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि MDR आखिर होता क्या है। Merchant Discount Rate वह शुल्क है जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले व्यापारी या कारोबार से पेमेंट इकोसिस्टम के लिए लिया जाता है। यह सीधे तौर पर ग्राहक से लिया जाने वाला UPI transaction fee नहीं है। नए ढांचे में सरकार का कहना है कि MDR की राशि सरकार के खाते में टैक्स के रूप में नहीं जाएगी, बल्कि बैंक, पेमेंट ऐप और अन्य संबंधित payment ecosystem participants के बीच बांटी जाएगी। सरकार का तर्क है कि UPI के लगातार बढ़ते इस्तेमाल के साथ उसके infrastructure, cybersecurity, fraud prevention और technology maintenance पर खर्च भी बढ़ रहा है। इसलिए डिजिटल पेमेंट सिस्टम की long-term sustainability के लिए एक revenue mechanism जरूरी है।
15 सितंबर 2026 को वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि नए framework का P2P transactions पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यानी अगर कोई व्यक्ति अपने दोस्त, परिवार के सदस्य या किसी अन्य व्यक्ति को UPI से ₹5,000, ₹20,000 या उससे अधिक भेजता है, तो उस transaction पर MDR नहीं लगेगा। बदलाव मुख्य रूप से merchant payments से जुड़ा है। ₹2,000 तक के merchant transactions भी zero-MDR व्यवस्था में रहेंगे। सरकार के मुताबिक इस वजह से UPI के बहुत बड़े हिस्से पर कोई शुल्क नहीं आएगा।
लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया कि UPI पर शुल्क की दिशा में बढ़ना अमेरिकी दबाव से जुड़ा हुआ है। राहुल गांधी का तर्क है कि UPI ने Visa और Mastercard जैसे international card networks को भारत में एक मजबूत विकल्प दिया है और शुल्क व्यवस्था में बदलाव से इन कंपनियों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हो सकता है। उन्होंने सरकार पर अमेरिकी कंपनियों के दबाव के आगे झुकने का आरोप लगाया। कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी इसी तरह के सवाल उठाए हैं और पूछा है कि जब सरकार पहले UPI को भारत के digital public infrastructure की बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत करती रही है, तो अब इसके कुछ transactions पर MDR लाने की जरूरत क्यों पड़ी।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिकी दबाव से जुड़े ये आरोप विपक्ष की राजनीतिक व्याख्या हैं। सरकार ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है। वित्त मंत्रालय और सरकार से जुड़े स्रोतों ने कहा है कि UPI policy भारत के अपने आर्थिक और डिजिटल infrastructure से जुड़े विचारों के आधार पर तय की गई है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य UPI को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके संचालन और भविष्य के विस्तार के लिए आर्थिक रूप से sustainable बनाना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि उपभोक्ताओं से सीधे UPI transaction fee नहीं लिया जाएगा।
सरकार के मुताबिक नए MDR framework का एक उद्देश्य छोटे व्यापारियों और सामान्य उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित रखना भी है। छोटे merchants के लिए zero-MDR व्यवस्था जारी रहने की बात कही गई है। ऐसे छोटे कारोबारी जो QR code के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक का UPI कारोबार प्राप्त करते हैं, उन्हें निर्धारित व्यवस्था के तहत MDR से छूट दी गई है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सड़क किनारे दुकान लगाने वाले छोटे व्यापारी, किराना दुकानदार और छोटे service providers पर डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने का अतिरिक्त खर्च न पड़े।
दूसरी तरफ ₹2,000 से अधिक के सामान्य merchant transactions पर 0.4% MDR का प्रावधान किया गया है। इस शुल्क की अधिकतम सीमा प्रति transaction ₹300 रखी गई है। इसका मतलब है कि ₹5,000 के transaction पर 0.4% के हिसाब से ₹20 MDR होगा, जबकि ₹10,000 पर ₹40। ₹50,000 के transaction पर ₹200 और ₹75,000 पर ₹300 बनता है। ₹75,000 से अधिक के eligible transactions में भी अधिकतम MDR ₹300 तक सीमित रहेगा। इससे बहुत बड़े transaction पर percentage के हिसाब से शुल्क अनिश्चित रूप से बढ़ता नहीं जाएगा।
कुछ विशेष क्षेत्रों के लिए अलग flat MDR structure रखा गया है। रिपोर्टों के अनुसार रेलवे, telecom, insurance, fuel और कुछ अन्य निर्धारित categories में ₹2,000 से ऊपर के eligible transactions पर ₹5 का flat MDR लागू किया जाएगा। इसके अलावा capital-market से संबंधित कुछ payments के लिए अलग दर निर्धारित की गई है। इस तरह हर UPI transaction पर एक जैसा 0.4% शुल्क नहीं लगेगा।
यही वजह है कि “UPI पर 0.4% टैक्स” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। सरकार ने साफ किया है कि MDR कोई सरकारी tax नहीं है। यह payment ecosystem में लिया जाने वाला merchant-side charge है। इसलिए UPI को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही उन पोस्टों से सावधान रहना जरूरी है जिनमें कहा जा रहा है कि अब हर UPI payment पर 0.4% tax कटेगा या ₹2,000 से ज्यादा भेजते ही ग्राहक के बैंक खाते से पैसा कट जाएगा। मौजूदा framework में ऐसा नहीं है।
हालांकि विपक्ष की चिंता यह है कि भले ही MDR merchant से लिया जाए, लेकिन उसका आर्थिक असर भविष्य में ग्राहकों तक पहुंच सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यापारी का digital payment processing cost बढ़ता है, तो वह अपनी pricing strategy में बदलाव कर सकता है। विपक्ष का तर्क है कि अगर किसी व्यापारी को अतिरिक्त लागत उठानी पड़ती है, तो वह किसी न किसी रूप में उस लागत को product या service की कीमत में शामिल करने की कोशिश कर सकता है। सरकार ने इसके विपरीत कहा है कि बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि MDR का बोझ सीधे ग्राहक पर न डाला जाए और UPI payment करने वाले व्यक्ति से अलग से platform fee या hidden charge नहीं लिया जाए।
इस विवाद का एक दूसरा पहलू UPI के business model से जुड़ा है। पिछले कई वर्षों से UPI को भारत में लगभग free-to-use digital payment infrastructure के रूप में बढ़ाया गया। इससे छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े retailers तक QR code payment का विस्तार हुआ। लेकिन transaction volume में जबरदस्त वृद्धि के साथ payment ecosystem को चलाने की लागत भी बढ़ती है। cybersecurity, fraud detection, server infrastructure, payment processing और लगातार technology upgrades पर खर्च होता है। सरकार का कहना है कि UPI के भविष्य के विस्तार के लिए इस ecosystem को आर्थिक रूप से मजबूत रखना जरूरी है।
सरकार ने इससे पहले भी UPI को financial inclusion और Digital India के महत्वपूर्ण infrastructure के रूप में प्रस्तुत किया है। अगस्त 2026 में वित्त मंत्रालय ने कहा था कि UPI users से कोई transaction charge नहीं लिया जाएगा और P2P transactions free रहेंगे। उस समय सरकार ने यह भी कहा था कि अगर MDR लागू किया जाता है तो वह सीमित merchant transactions और तय threshold से ऊपर के transactions पर होगा। बाद में सितंबर में नया framework सामने आया और 15 अक्टूबर से इसके लागू होने की तारीख तय हुई।
इस पूरी प्रक्रिया में Payment and Settlement Systems Act यानी PSS Act भी महत्वपूर्ण है। सरकार द्वारा किए गए कानूनी बदलावों का उद्देश्य यह तय करने के लिए framework उपलब्ध कराना है कि किन electronic payment modes पर शुल्क प्रतिबंध लागू रहेंगे। इसी कानूनी बदलाव के आधार पर ₹2,000 तक के UPI transactions के लिए fee-free framework स्पष्ट किया गया और उससे ऊपर के कुछ merchant transactions के लिए MDR लागू करने की जगह बनी।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होने से विवाद का कानूनी पहलू भी सामने आ गया है। 16 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक एक petition में कुछ UPI merchant transactions पर शुल्क लगाए जाने की व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से यह चिंता जताई गई है कि UPI जैसे व्यापक digital payment platform पर charges का प्रभाव लंबे समय में आम लोगों और व्यापारियों पर पड़ सकता है। मामले की न्यायिक प्रक्रिया में अदालत सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांग सकती है और यह देखा जा सकता है कि challenged framework कानून के तहत किस तरह बनाया गया है।
यहां यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सरकार का फैसला गलत है या अदालत इसे रद्द कर देगी। किसी भी policy को अदालत में चुनौती मिलने के बाद उसके कानूनी पहलुओं पर सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर आगे की प्रक्रिया होती है। इसलिए अभी इसे “UPI charge रद्द” या “सरकार का फैसला रोक दिया गया” कहना सही नहीं होगा।
मामले का timing भी महत्वपूर्ण है। नया MDR framework 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने की बात कही गई है। इसलिए अगले कुछ सप्ताह में इस विषय पर सरकार, payment companies, banks, merchants और अदालत से जुड़े developments महत्वपूर्ण रहेंगे। अगर अदालत से कोई interim order आता है या सरकार framework में बदलाव करती है, तो उसका असर implementation पर पड़ सकता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार सरकार ने policy को वापस लेने का संकेत नहीं दिया है।
UPI के आंकड़े बताते हैं कि इसका scale कितना बड़ा हो चुका है। अगस्त 2026 में UPI ने करीब 24 अरब transactions process किए और इनकी कुल value लगभग $311 billion बताई गई। इतनी बड़ी payment infrastructure को 24 घंटे reliable बनाए रखने के लिए technology और security investment की जरूरत होती है। सरकार इसी बढ़ते scale को MDR framework के पक्ष में एक कारण के रूप में रख रही है।
लेकिन UPI की सफलता का एक बड़ा कारण इसका आसान और कम लागत वाला होना भी रहा है। QR code scan करके payment करना छोटे दुकानदारों और ग्राहकों दोनों के लिए सरल है। ऐसे में व्यापारी संगठनों की चिंता यह है कि अतिरिक्त processing cost से कुछ businesses digital payments को लेकर दोबारा सोच सकते हैं। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक Retailers Association of India ने भी इस बदलाव को लेकर चिंता जताई है और कहा है कि कम margin वाले कारोबारों में अतिरिक्त cost का असर पड़ सकता है।
Capital market transactions को लेकर भी अलग चर्चा शुरू हो गई है। नए framework में कुछ capital-market payments के लिए 0.02% MDR और ₹300 की maximum cap की रिपोर्ट है। इसका असर brokers और अन्य financial platforms के payment operations पर पड़ सकता है। ऐसे businesses के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि MDR का accounting और settlement किस तरह किया जाए और क्या वे इसे अपने operational costs में absorb करेंगे।
इस विवाद में “अमेरिका को फायदा होगा” वाला राजनीतिक आरोप भी चर्चा के केंद्र में है। राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं ने अमेरिकी card companies के संदर्भ में सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि UPI और RuPay ने भारत में traditional card networks के मुकाबले एक अलग digital payment ecosystem बनाया है। विपक्ष इसलिए यह सवाल उठा रहा है कि UPI के कुछ merchant transactions पर MDR लगाने से क्या international payment networks के लिए competitive environment बदल सकता है। लेकिन सरकार ने इस interpretation को स्वीकार नहीं किया है और कहा है कि policy का आधार भारत की अपनी digital-payment जरूरतें और ecosystem sustainability हैं।
इसलिए फिलहाल दो अलग-अलग narratives सामने हैं। सरकार का पक्ष है कि consumer UPI payments free रहेंगे, P2P transactions पर कोई शुल्क नहीं होगा, लगभग 96% merchant transactions प्रभावित नहीं होंगे और MDR का उद्देश्य payment ecosystem की sustainability तथा infrastructure investment है। विपक्ष का पक्ष है कि यह कदम UPI के free model को कमजोर कर सकता है और इसके पीछे अमेरिकी कंपनियों से जुड़े हितों का सवाल उठता है। इन दोनों पक्षों के बीच वास्तविक असर का आकलन 15 अक्टूबर के बाद transaction behaviour, merchant costs और payment ecosystem के data से ज्यादा स्पष्ट होगा।
आम UPI user के लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे हर payment पर नया charge नहीं देना है। अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को पैसा भेजता है तो P2P transaction free रहेगा। ₹2,000 तक के merchant payments भी framework के अनुसार free रहेंगे। बड़े merchant payments में MDR merchant-side charge है, जिसे customer से अलग UPI transaction fee के रूप में लेने की अनुमति नहीं बताई गई है। इसलिए “UPI बंद हो जाएगा” या “हर payment पर पैसा कटेगा” जैसी अफवाहों पर भरोसा करने के बजाय transaction category और लागू नियम देखना जरूरी है।
आने वाले दिनों में इस मामले में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। पहली, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर आगे क्या कार्रवाई होती है। दूसरी, 15 अक्टूबर से MDR framework वास्तव में किस तरह लागू होता है और banks तथा payment apps इसे merchants के लिए कैसे operationalise करते हैं। तीसरी, क्या सरकार या NPCI implementation से पहले कोई clarification या बदलाव जारी करते हैं।
UPI भारत के digital payment ecosystem का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। इसलिए इसके pricing model में बदलाव केवल बैंक और payment companies का मुद्दा नहीं है, बल्कि करोड़ों users और merchants से जुड़ा विषय है। एक तरफ free digital payments को बनाए रखने की मांग है, तो दूसरी तरफ इतने बड़े infrastructure को सुरक्षित और financially sustainable रखने की जरूरत का सवाल है। अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और सरकार के जवाब के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कानूनी प्रक्रिया और ground-level implementation इस विवाद को किस दिशा में ले जाते हैं।
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि नया framework हर UPI payment पर charge लगाने वाला नियम नहीं है। ₹2,000 तक के merchant payments और P2P payments को free रखा गया है, जबकि निर्धारित श्रेणी के ₹2,000 से ऊपर के merchant transactions पर 0.4% MDR का प्रावधान है, जिसकी सामान्य maximum cap ₹300 है। सरकार विदेशी दबाव के आरोप से इनकार कर रही है, जबकि विपक्ष इसे अमेरिकी कंपनियों के हितों से जोड़कर देख रहा है। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दाखिल होने के बाद अब इस पूरे विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण न्यायिक प्रक्रिया और 15 अक्टूबर की implementation date होगी।
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