ब्रिटेन की 30 वर्षीय लिज ईस्ट ने अपने करियर में ऐसा बदलाव किया, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लंबे समय तक लीगल सेक्टर में काम करने के बाद लिज ने अपनी नौकरी छोड़कर डॉग-वॉकिंग और पेट-केयर का काम शुरू किया। अब वह हर दिन करीब 20 से 30 कुत्तों की देखभाल और उन्हें घुमाने का काम करती हैं। उनकी रिपोर्टेड दैनिक कमाई करीब 400 से 530 डॉलर यानी लगभग ₹38 हजार से ₹50 हजार तक बताई गई है। हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि यह आंकड़ा उनकी बताई गई दैनिक कमाई/टर्नओवर का अनुमान है, इसे सीधे शुद्ध मुनाफा नहीं माना जाना चाहिए। NDTV और Moneycontrol की रिपोर्टों के अनुसार लिज करीब चार ग्रुप वॉक करती हैं और प्रति कुत्ते लगभग 14 से 19 डॉलर प्रति घंटे के आसपास शुल्क लेती हैं।
लिज की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने किसी छोटी-मोटी नौकरी को छोड़कर यह काम शुरू नहीं किया, बल्कि लीगल करियर से निकलकर पेट-केयर बिजनेस को चुना। उनके मुताबिक पिछली नौकरी में लंबे काम के घंटे, लगातार यात्रा, कोर्ट से जुड़े काम, क्लाइंट मीटिंग और अन्य जिम्मेदारियों के कारण उनकी रोजमर्रा की जिंदगी काफी व्यस्त हो गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक उनका काम कई बार 12 घंटे से भी ज्यादा चलता था और लंदन आने-जाने में लगभग दो घंटे अतिरिक्त लग जाते थे। इस तरह नौकरी के अलावा यात्रा में भी काफी समय चला जाता था।
लिज ने बताया कि क्रिमिनल डिफेंस से जुड़े काम में प्रशासनिक जिम्मेदारियों से लेकर कोर्ट जाने, जेलों में विजिट करने और क्लाइंट्स से मिलने तक कई तरह के काम शामिल थे। लंबे समय तक ऐसा रूटीन चलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि जिस जीवनशैली में वह रह रही थीं, वह लंबे समय तक उनके लिए टिकाऊ नहीं लग रही थी। उन्हें यह भी लगने लगा था कि अच्छी नौकरी और कमाई होने के बावजूद उनके पास अपने लिए पर्याप्त समय नहीं बच रहा है।
उनके करियर में बदलाव के पीछे एक और महत्वपूर्ण वजह उनके पति बने। लिज के पति पहले से ही डॉग-वॉकिंग और डॉग-बोर्डिंग के काम से जुड़े हुए थे। वह अपने पति को इस काम में खुश और उत्साहित देखती थीं। इसके उलट लिज खुद अपनी नौकरी को लेकर लगातार तनाव महसूस कर रही थीं। इसी तुलना ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या वह भी ऐसा काम कर सकती हैं, जिसमें उन्हें बाहर रहने, जानवरों के साथ समय बिताने और अपनी दिनचर्या पर ज्यादा नियंत्रण मिले।
कोविड के बाद दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने अपने काम और जीवनशैली को नए तरीके से देखना शुरू किया। लिज के मामले में भी यह बदलाव महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अपने पुराने करियर को जारी रखने के बजाय पेट केयर से जुड़े काम को गंभीरता से लेने का फैसला किया। हालांकि शुरुआत में यह बदलाव आसान नहीं था। उन्होंने अपना बिजनेस शुरू करने के लिए एक वैन खरीदी और शुरुआती दौर में खर्च चलाने के लिए स्थानीय पब में भी काम किया। इसके साथ-साथ उन्होंने अपने डॉग-वॉकिंग क्लाइंट्स का नेटवर्क बनाना शुरू किया।
धीरे-धीरे उनका काम बढ़ता गया और नियमित ग्राहक मिलने लगे। रिपोर्ट के अनुसार करीब एक साल के भीतर उनका शेड्यूल नियमित ग्राहकों से भर गया। अब वह दिन में लगभग चार अलग-अलग ग्रुप वॉक आयोजित करती हैं और कुल मिलाकर 20 से 30 कुत्तों की देखभाल करती हैं। उनके काम में केवल कुत्ते को सड़क पर घुमाना ही शामिल नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित तरीके से संभालना, उनके व्यवहार पर नजर रखना और तय समय पर उन्हें उनके मालिकों तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लिज के मुताबिक वह प्रति कुत्ते लगभग 14 से 19 डॉलर प्रति घंटे के आसपास शुल्क लेती हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में राशि में थोड़ा अंतर दिखाई देता है, इसलिए इसे एक अनुमानित रेंज के रूप में देखना बेहतर है। NDTV ने उनके हवाले से लगभग 14 पाउंड प्रति घंटे प्रति कुत्ता का आंकड़ा दिया है, जबकि Moneycontrol ने करीब 19 डॉलर प्रति घंटे का उल्लेख किया है। चार ग्रुप वॉक और 20 से 30 कुत्तों के आधार पर उनका दैनिक कारोबार लगभग 300 से 530 डॉलर तक बताया गया है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग ₹38 हजार से ₹50 हजार के आसपास बैठता है, लेकिन मुद्रा विनिमय दर बदलने के कारण वास्तविक रुपये की राशि अलग हो सकती है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। “रोज ₹50 हजार कमाना” और “रोज ₹50 हजार का कारोबार होना” दोनों अलग बातें हैं। डॉग-वॉकिंग बिजनेस में वाहन का खर्च, ईंधन, इंश्योरेंस, लाइसेंस या स्थानीय नियमों से जुड़े खर्च, उपकरण, कुत्तों की देखभाल और दूसरे ऑपरेशनल खर्च हो सकते हैं। इसलिए रिपोर्ट में बताई गई रकम को सीधे हाथ में बचने वाली रकम नहीं माना जाना चाहिए। लिज ने अपनी कमाई की तुलना अपनी पिछली नौकरी से करते हुए कहा है कि अब वह पहले से ज्यादा कमा रही हैं और पहले के मुकाबले लगभग आधे घंटे काम करती हैं।
लिज के लिए सबसे बड़ा बदलाव केवल कमाई नहीं बल्कि काम करने का तरीका है। पहले उन्हें ऑफिस, कोर्ट, क्लाइंट और यात्रा से जुड़ी कई जिम्मेदारियों के बीच समय निकालना पड़ता था। अब उनकी दिनचर्या काफी हद तक उनके अपने बिजनेस के हिसाब से चलती है। वह सुबह कुत्तों को लेने जाती हैं, उन्हें ग्रुप में घुमाती हैं और फिर अगले बैच के लिए निकलती हैं। इस तरह काम शारीरिक रूप से सक्रिय भी है और उन्हें लंबे समय तक कंप्यूटर स्क्रीन के सामने नहीं बैठना पड़ता।
डॉग-वॉकिंग को बाहर से देखने पर यह आसान काम लग सकता है, लेकिन कई कुत्तों को एक साथ संभालना अपने आप में जिम्मेदारी वाला काम है। अलग-अलग कुत्तों का स्वभाव अलग होता है। कुछ कुत्ते दूसरे जानवरों के साथ आसानी से घुल-मिल जाते हैं, जबकि कुछ को अकेले या छोटे ग्रुप में चलाना जरूरी हो सकता है। इसलिए किसी भी प्रोफेशनल डॉग वॉकर के लिए जानवरों के व्यवहार को समझना महत्वपूर्ण है।
एक डॉग वॉकर को यह भी समझना पड़ता है कि कुत्ते को किस तरह की लीड और हार्नेस की जरूरत है, सड़क पार करते समय कैसे सुरक्षित रखा जाए और किसी अचानक स्थिति में क्या किया जाए। अगर कोई कुत्ता दूसरे कुत्ते को देखकर आक्रामक हो जाए या अचानक सड़क की तरफ भागने की कोशिश करे तो वॉकर को तुरंत प्रतिक्रिया देनी पड़ती है। इसी वजह से केवल कुत्तों से प्यार करना पर्याप्त नहीं है; जिम्मेदारी, धैर्य और बेसिक पेट-केयर की समझ भी जरूरी होती है।
भारत में भी पेट-केयर से जुड़ी सेवाओं का बाजार धीरे-धीरे विकसित हो रहा है। महानगरों में कई परिवारों के पास पालतू कुत्ते हैं, लेकिन काम के लंबे घंटे या यात्रा के कारण वे हर दिन अपने पालतू को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। इसी वजह से प्रोफेशनल डॉग-वॉकिंग, पेट-सिटिंग, ग्रूमिंग और बोर्डिंग जैसी सेवाओं की मांग दिखाई देती है। Petsfolio की एक रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे इलाकों में कुछ डॉग वॉकर महीने में करीब ₹50 हजार तक कमाने की बात सामने आई है। हालांकि यह लिज की ब्रिटेन वाली दैनिक कमाई से अलग बाजार और आय का आंकड़ा है।
भारत में डॉग-वॉकिंग को बिजनेस के रूप में शुरू करने के लिए शुरुआती निवेश भी दूसरे कई व्यवसायों की तुलना में कम हो सकता है। किसी व्यक्ति को सबसे पहले अपने इलाके में पेट ओनर्स की जरूरत समझनी होगी। अपार्टमेंट सोसाइटी, बड़े रिहायशी इलाके और ऐसे क्षेत्र जहां कामकाजी परिवार ज्यादा हैं, वहां संभावित ग्राहक मिल सकते हैं। शुरुआत में एक या दो कुत्तों से सेवा शुरू करके धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ाए जा सकते हैं।
लेकिन भारत में किसी भी व्यक्ति को दूसरे देश की कमाई देखकर यह मान लेना नहीं चाहिए कि वह तुरंत रोजाना ₹50 हजार कमा सकता है। लिज का मामला एक स्थापित क्लाइंट बेस और ब्रिटेन के पेट-केयर बाजार से जुड़ा है। भारत में कीमत, ग्राहक की भुगतान क्षमता, शहर, प्रतियोगिता, सेवा का प्रकार और कुत्तों की संख्या के आधार पर कमाई काफी अलग हो सकती है। इसलिए यह कहानी एक उदाहरण है, गारंटीड इनकम मॉडल नहीं।
लिज की कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपनी पढ़ाई और पुराने अनुभव को पूरी तरह बेकार नहीं माना। उन्होंने आलोचना का सामना किया क्योंकि कुछ लोगों का मानना था कि कानून की पढ़ाई करने के बाद डॉग-वॉकिंग करना उनके पुराने करियर की तुलना में अलग दिशा है। लिज ने इसके जवाब में कहा कि कानून के क्षेत्र में बिताए वर्षों से मिली कई स्किल्स आज भी उनके काम आती हैं। यानी करियर बदलने का मतलब यह नहीं कि पिछला अनुभव पूरी तरह खत्म हो जाता है।
बिजनेस में बातचीत, ग्राहक प्रबंधन, समय का पालन, बिलिंग, कॉन्ट्रैक्ट, जिम्मेदारी और समस्या समाधान जैसी क्षमताएं महत्वपूर्ण होती हैं। लिज की कानूनी पृष्ठभूमि उनके लिए इन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा ग्राहक के पालतू जानवर की सुरक्षा से जुड़े नियमों और जिम्मेदारियों को समझने में भी व्यवस्थित सोच मदद कर सकती है।
लिज ने यह भी स्पष्ट किया कि डॉग-वॉकिंग को केवल ज्यादा पैसे कमाने के लिए नहीं चुनना चाहिए। उनके अनुसार इस काम के लिए जानवरों के साथ रहना और बाहर काम करना पसंद होना जरूरी है। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया पर जब किसी व्यक्ति की असाधारण कमाई की कहानी वायरल होती है तो लोग अक्सर केवल कमाई के आंकड़े पर ध्यान देते हैं। लेकिन किसी भी व्यवसाय में ग्राहक बनाना, उन्हें बनाए रखना, रोजाना समय पर सेवा देना और खर्च संभालना उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
डॉग-वॉकिंग में मौसम भी चुनौती बन सकता है। बारिश, ठंड या बहुत गर्म मौसम में कुत्तों को बाहर ले जाते समय अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। कुत्ते की उम्र, नस्ल, स्वास्थ्य और व्यवहार के अनुसार वॉक का समय और तरीका बदल सकता है। इसलिए एक प्रोफेशनल वॉकर को हर कुत्ते की व्यक्तिगत जरूरत समझना जरूरी होता है।
कई पेशेवर पेट-केयर सेवाएं अब केवल वॉक तक सीमित नहीं रहतीं। डॉग सिटिंग, पेट बोर्डिंग, ग्रूमिंग, पेट टैक्सी और बेसिक केयर जैसी सेवाओं को भी पैकेज में शामिल किया जा सकता है। इससे एक ही ग्राहक से कई तरह की सेवाएं उपलब्ध कराकर बिजनेस को बढ़ाया जा सकता है। भारत में भी पेट केयर क्षेत्र में ऐसी सेवाओं का विस्तार देखने को मिल रहा है।
डॉग-वॉकिंग बिजनेस में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है। पेट मालिक अपने कुत्ते को किसी अनजान व्यक्ति के साथ भेजने से पहले उसकी विश्वसनीयता देखेंगे। इसलिए पहचान सत्यापन, ग्राहक रेफरेंस, बेसिक ट्रेनिंग, इमरजेंसी कॉन्टैक्ट, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट और स्पष्ट नियम जैसी चीजें बिजनेस को पेशेवर बनाने में मदद कर सकती हैं। कुछ संगठित सेवाएं वॉकर की ट्रेनिंग और वॉक की जानकारी जैसी सुविधाएं भी देती हैं। उदाहरण के लिए Sploot जैसी पेट-केयर सेवा अपने डॉग-वॉकिंग सिस्टम में प्रशिक्षित वॉकर और वॉक हिस्ट्री जैसी सुविधाओं का उल्लेख करती है।
अगर कोई व्यक्ति भारत में इस तरह का काम शुरू करना चाहता है तो शुरुआत में एक छोटे क्षेत्र को चुनना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक सोसाइटी या उसके आसपास के कुछ किलोमीटर क्षेत्र में सेवा शुरू की जा सकती है। इससे आने-जाने का समय और ईंधन खर्च कम रहेगा। पहले कुछ नियमित ग्राहकों के साथ अच्छी सेवा देने के बाद रेफरल के जरिए ग्राहक बढ़ाए जा सकते हैं।
कमाई का मॉडल भी स्पष्ट होना चाहिए। कोई व्यक्ति प्रति वॉक शुल्क ले सकता है, कोई मासिक पैकेज बना सकता है और कोई अतिरिक्त सेवाओं के लिए अलग शुल्क रख सकता है। उदाहरण के लिए सुबह और शाम की वॉक के लिए अलग पैकेज, वीकेंड पैकेज या छुट्टी के दौरान पेट-सिटिंग जैसी सेवाएं दी जा सकती हैं। लेकिन कीमत तय करते समय स्थानीय बाजार और अपने वास्तविक खर्चों को ध्यान में रखना जरूरी है।
लिज ईस्ट की कहानी में सबसे बड़ा बदलाव यह नहीं है कि उन्होंने कुत्तों को घुमाना शुरू किया और ज्यादा पैसा कमाने लगीं। असल बदलाव यह है कि उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार करियर को दोबारा डिजाइन किया। पहले उनके पास अच्छी नौकरी थी, लेकिन काम के लंबे घंटे और यात्रा के कारण वह परेशान थीं। अब उनका काम अलग तरह की मेहनत मांगता है, लेकिन उन्हें अपनी दिनचर्या पर ज्यादा नियंत्रण और अपने पसंद के वातावरण में काम करने का मौका मिल रहा है।
उनकी कहानी उन लोगों के लिए भी एक उदाहरण है जो नौकरी और बिजनेस के बीच विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि किसी भी करियर को छोड़ने का फैसला व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है। केवल किसी वायरल कहानी में दिखाई गई कमाई देखकर नौकरी छोड़ना उचित नहीं होगा। बेहतर तरीका यह है कि पहले पार्ट-टाइम आधार पर बाजार को समझा जाए, संभावित ग्राहकों की संख्या देखी जाए, खर्च और आय का हिसाब लगाया जाए और फिर जरूरत के अनुसार बिजनेस को बढ़ाया जाए।
कुल मिलाकर ब्रिटेन की लिज ईस्ट की कहानी सोशल मीडिया और न्यूज प्लेटफॉर्म पर इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने लंबे घंटों वाली लीगल नौकरी छोड़कर डॉग-वॉकिंग और पेट-केयर बिजनेस को चुना। अब वह रिपोर्टेड तौर पर रोजाना करीब 20 से 30 कुत्तों की देखभाल करती हैं और उनकी बताई गई दैनिक कमाई करीब ₹38 हजार से ₹50 हजार के आसपास है। यह रकम दैनिक टर्नओवर/कमाई का रिपोर्टेड अनुमान है, न कि जरूरी तौर पर शुद्ध मुनाफा।
उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि आज के समय में कमाई के पारंपरिक रास्तों के अलावा सर्विस-बेस्ड बिजनेस के कई विकल्प मौजूद हैं। पेट केयर ऐसा ही एक क्षेत्र है, जिसमें शहरों में व्यस्त परिवारों की जरूरत के कारण अवसर बन रहे हैं। हालांकि इसमें सफलता के लिए केवल जानवरों से प्यार काफी नहीं है। सुरक्षा, जिम्मेदारी, ग्राहक सेवा, समय प्रबंधन और बिजनेस प्लानिंग भी जरूरी है।
लिज ने जिस तरह अपने करियर को बदला, उससे यह संदेश जरूर मिलता है कि किसी व्यक्ति का पेशेवर जीवन हमेशा एक ही दिशा में चलना जरूरी नहीं है। लेकिन उनकी कमाई को हर व्यक्ति के लिए सामान्य परिणाम मानना सही नहीं होगा। डॉग-वॉकिंग की आय शहर, ग्राहक संख्या, शुल्क, काम के घंटे और खर्चों के आधार पर काफी बदल सकती है। यही वजह है कि इस कहानी को एक असामान्य करियर-चेंज और बिजनेस सक्सेस स्टोरी के रूप में देखना ज्यादा उचित है, न कि रोजाना ₹50 हजार कमाने की गारंटी के तौर पर।
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