घर में दो बच्चे हों तो उनके बीच कभी खिलौने को लेकर, कभी टीवी के रिमोट को लेकर, कभी खाने की चीज को लेकर और कभी माता-पिता का ध्यान पाने के लिए बहस होना आम बात है। कुछ घरों में बच्चों की छोटी-छोटी नोकझोंक इतनी बढ़ जाती है कि माता-पिता को बार-बार बीच में आना पड़ता है। शुरुआत में माता-पिता इसे सामान्य भाई-बहन की लड़ाई समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब रोजाना झगड़ा होने लगे, एक-दूसरे को चिढ़ाना, धक्का देना, चीजें छीनना या मारपीट तक पहुंच जाए तो परिवार के लिए स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है।
ऐसे समय में माता-पिता अक्सर बच्चों को डांटते हैं, समझाते हैं या किसी एक बच्चे को दोषी ठहराकर मामला शांत करने की कोशिश करते हैं। कुछ समय के लिए घर में शांति भी हो जाती है, लेकिन थोड़ी देर बाद वही विवाद फिर शुरू हो जाता है। इसका एक कारण यह है कि बच्चे केवल यह सुनकर कि “लड़ना बंद करो” हमेशा यह नहीं सीख पाते कि अगली बार असहमति होने पर करना क्या है।
बच्चों को विवाद खत्म करना ही नहीं, बल्कि विवाद को संभालना और समाधान तक पहुंचना सिखाना ज्यादा उपयोगी होता है। इसके लिए माता-पिता को हर झगड़े में जज बनने के बजाय धीरे-धीरे बच्चों को समस्या सुलझाने की प्रक्रिया सिखानी चाहिए। इससे बच्चे अपनी भावनाओं को पहचानना, दूसरे की बात सुनना, अपनी बात शांत तरीके से कहना और समझौता करना सीख सकते हैं।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भाई-बहन क्यों लड़ते हैं
हर लड़ाई के पीछे एक ही कारण नहीं होता। छोटे बच्चे अक्सर अपनी चीजों को लेकर बहुत possessive होते हैं। अगर एक बच्चे का खिलौना दूसरा बच्चा उठा ले तो उसे लग सकता है कि उसकी चीज छीन ली गई। वहीं दूसरा बच्चा शायद यह सोच रहा हो कि वह केवल कुछ देर उस खिलौने से खेलना चाहता है।
उम्र बढ़ने के साथ विवाद के कारण भी बदल सकते हैं। बड़े बच्चे को लग सकता है कि माता-पिता छोटे भाई या बहन को ज्यादा प्यार करते हैं। छोटा बच्चा बड़े की चीजों में दखल दे सकता है। कभी-कभी दोनों बच्चे माता-पिता का ध्यान पाने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं।
स्कूल, पढ़ाई, नींद की कमी, भूख, थकान और घर में तनाव भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हर लड़ाई को केवल “बच्चे बदतमीज हैं” के रूप में देखना समस्या की असली वजह समझने में मदद नहीं करता।
माता-पिता को यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि झगड़े सबसे ज्यादा कब होते हैं। क्या बच्चे शाम को स्कूल से आने के बाद ज्यादा लड़ते हैं? क्या विवाद किसी खास खिलौने या स्क्रीन टाइम को लेकर होता है? क्या दोनों बच्चों को एक साथ कोई काम करने में परेशानी होती है? इन पैटर्न को समझने से समाधान निकालना आसान हो सकता है।
हर बार यह तय करना जरूरी नहीं कि गलती किसकी थी
जब दो बच्चे लड़ते हुए माता-पिता के पास आते हैं तो दोनों अक्सर अपनी-अपनी कहानी बताते हैं। एक कहता है, “इसने पहले मारा।” दूसरा जवाब देता है, “लेकिन इसने मेरा खिलौना लिया था।”
ऐसी स्थिति में माता-पिता तुरंत किसी एक बच्चे को दोषी घोषित कर दें तो दूसरा बच्चा खुद को गलत तरीके से ट्रीट किया गया महसूस कर सकता है। इससे अगली बार वह अपनी बात साबित करने के लिए और ज्यादा आक्रामक हो सकता है।
इसलिए अगर विवाद बहुत गंभीर नहीं है तो माता-पिता पहले दोनों बच्चों को शांत कर सकते हैं और कह सकते हैं, “पहले दोनों शांत होंगे, फिर हम सुनेंगे कि क्या हुआ।” इसका उद्देश्य यह तय करना नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हारा, बल्कि यह समझना होना चाहिए कि समस्या क्या थी और आगे इसे कैसे सुलझाया जाए।
अगर मारपीट या चोट का खतरा हो तो माता-पिता को तुरंत हस्तक्षेप करके बच्चों को अलग करना चाहिए। सुरक्षा किसी भी parenting strategy से पहले आती है।
बच्चों को अपनी भावनाओं का नाम बताना सिखाएं
कई बार बच्चे गुस्सा महसूस तो करते हैं लेकिन उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। उन्हें केवल इतना पता होता है कि सामने वाला भाई या बहन उन्हें परेशान कर रहा है। परिणाम यह होता है कि वे चिल्लाने, धक्का देने या मारने लगते हैं।
माता-पिता बच्चों को भावनाओं के लिए सरल शब्द सिखा सकते हैं। जैसे, “मुझे गुस्सा आ रहा है”, “मुझे बुरा लगा”, “मुझे भी इस खिलौने से खेलना है” या “मुझे अच्छा नहीं लगा कि तुमने मेरी चीज बिना पूछे ली।”
जब बच्चा अपनी भावना को शब्दों में व्यक्त करना सीखता है तो उसके पास शारीरिक प्रतिक्रिया के अलावा दूसरा रास्ता भी होता है।
यह प्रक्रिया एक दिन में नहीं आती। शुरुआत में बच्चा फिर भी चिल्लाएगा या रोएगा। माता-पिता को उसकी भावना को स्वीकार करते हुए व्यवहार की सीमा स्पष्ट रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए कहा जा सकता है, “तुम गुस्सा हो सकते हो, लेकिन मारना ठीक नहीं है।”
इस तरह बच्चे को यह संदेश मिलता है कि भावना गलत नहीं है, लेकिन भावना के कारण किसी दूसरे को चोट पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है।
“किसने शुरू किया?” से ज्यादा जरूरी है “अब समाधान क्या है?”
भाई-बहन की लड़ाई में माता-पिता अक्सर पहला सवाल यही पूछते हैं कि “पहले किसने शुरू किया?” यह सवाल कभी-कभी जरूरी हो सकता है, खासकर जब चोट या गंभीर व्यवहार हुआ हो। लेकिन हर छोटे विवाद में इसे मुख्य सवाल बना देना बच्चों को जिम्मेदारी से ज्यादा दोष ढूंढने की आदत डाल सकता है।
इसके बजाय माता-पिता धीरे-धीरे एक नया सवाल सिखा सकते हैं—“अब हम इसे कैसे ठीक करें?”
मान लीजिए दोनों बच्चे एक ही खिलौने के लिए लड़ रहे हैं। माता-पिता कह सकते हैं, “तुम दोनों को यह खिलौना चाहिए। अब बताओ, इसे किस तरह इस्तेमाल कर सकते हो जिससे दोनों को मौका मिले?”
बच्चे कुछ विकल्प दे सकते हैं। शायद एक बच्चा पांच मिनट खेले और फिर दूसरा। या दोनों मिलकर कोई खेल बनाएं। अगर दोनों विकल्प पर सहमत नहीं होते तो माता-पिता कुछ विकल्प सुझा सकते हैं, लेकिन अंतिम समाधान चुनने में बच्चों को शामिल करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
इस तरह बच्चे सीखते हैं कि हर विवाद में किसी एक को हारना जरूरी नहीं है।
घर में कुछ स्पष्ट नियम पहले से तय करें
बच्चों को यह पता होना चाहिए कि परिवार में कौन-सा व्यवहार स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं। नियम बहुत लंबे या जटिल होने की जरूरत नहीं है।
उदाहरण के लिए परिवार में यह स्पष्ट हो सकता है कि किसी को मारना, धक्का देना, गाली देना या जानबूझकर चीज तोड़ना स्वीकार्य नहीं है। अपनी बात कहने की अनुमति है, नाराज होने की अनुमति है, लेकिन दूसरे को चोट पहुंचाने की अनुमति नहीं है।
इन नियमों को झगड़े के समय पहली बार बताने के बजाय शांत समय में बच्चों के साथ मिलकर तय करना ज्यादा प्रभावी हो सकता है। जब बच्चे नियम बनाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं तो उन्हें नियम अपना लगने की संभावना बढ़ती है।
माता-पिता चाहें तो घर के किसी हिस्से में छोटे और सरल family rules लगा सकते हैं। जैसे—“पहले सुनेंगे, फिर बोलेंगे”, “हाथ नहीं उठाएंगे” और “समस्या का समाधान मिलकर खोजेंगे।”
बच्चों की तुलना बिल्कुल न करें
“देखो तुम्हारी बहन कितनी अच्छी है”, “तुम हमेशा लड़ते हो”, “तुम्हारा भाई तो कभी ऐसा नहीं करता”—ऐसी बातें माता-पिता को उस समय आसान लग सकती हैं, लेकिन लगातार तुलना भाई-बहन के रिश्ते में प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है।
अगर एक बच्चे को बार-बार दूसरे से कम अच्छा बताया जाए तो उसके मन में नाराजगी पैदा हो सकती है। दूसरी तरफ जिस बच्चे की प्रशंसा की जा रही है, उस पर भी हमेशा अच्छा बने रहने का दबाव बन सकता है।
इसलिए बच्चे के व्यवहार को दूसरे बच्चे के व्यवहार से जोड़ने के बजाय उसी व्यवहार पर बात करें। “तुमने आज अपने भाई की बात पूरी सुनी, यह अच्छी बात थी” कहना “तुम अपने भाई से ज्यादा समझदार हो” कहने से अलग संदेश देता है।
इस छोटे से अंतर का parenting में काफी महत्व हो सकता है।
हर बच्चे को माता-पिता के साथ अलग समय दें
कभी-कभी भाई-बहन की लड़ाई के पीछे वस्तु या खिलौना नहीं बल्कि माता-पिता का ध्यान पाने की इच्छा होती है। अगर बच्चे को लगता है कि भाई या बहन के आने के बाद उसे कम समय मिलता है तो वह दूसरे बच्चे को परेशान करके माता-पिता का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
इसलिए माता-पिता के लिए दोनों बच्चों के साथ अलग-अलग थोड़ा quality time बिताना उपयोगी हो सकता है। यह समय बहुत लंबा होना जरूरी नहीं है। कुछ मिनट बच्चे की पसंद का खेल खेलने, उसकी बात सुनने या उसके साथ टहलने में भी बिताए जा सकते हैं।
इस दौरान दूसरे बच्चे से तुलना करने या उसकी शिकायत सुनाने के बजाय केवल उस बच्चे पर ध्यान देना बेहतर है।
इससे बच्चे को यह अनुभव हो सकता है कि माता-पिता का प्यार पाने के लिए उसे अपने भाई या बहन से प्रतिस्पर्धा करने की जरूरत नहीं है।
बच्चों को “माफी मांगो” कहने से पहले गलती समझाएं
झगड़े के बाद माता-पिता अक्सर दोनों बच्चों से कहते हैं, “चलो, अब एक-दूसरे से sorry बोलो।” इससे मामला तुरंत खत्म होता दिखाई देता है, लेकिन अगर बच्चे ने समझा ही नहीं कि गलती क्या थी तो केवल “sorry” कहना व्यवहार में बदलाव नहीं लाएगा।
बच्चे को यह समझने में मदद करें कि उसके व्यवहार से दूसरे बच्चे पर क्या असर पड़ा। उदाहरण के लिए, “जब तुमने उसका खिलौना छीना तो उसे खेलने का मौका नहीं मिला और वह परेशान हुआ। अगली बार पहले पूछ सकते हो।”
इसके बाद माफी मांगना और चीज को ठीक करने की कोशिश करना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है।
कभी-कभी “sorry” के साथ repair भी जरूरी होता है। अगर बच्चे ने दूसरे का खिलौना तोड़ दिया है तो केवल माफी मांगने के बजाय उसे उसे ठीक करने या किसी उचित तरीके से नुकसान की भरपाई करने में शामिल किया जा सकता है।
बच्चों को बातचीत का छोटा तरीका सिखाएं
माता-पिता घर में एक आसान communication formula बना सकते हैं। जब विवाद हो तो बच्चा पहले अपनी बात इस तरह कहे—“जब तुमने ___ किया, मुझे ___ महसूस हुआ। मैं चाहता/चाहती हूं कि अगली बार ___ हो।”
छोटे बच्चों के लिए इसे और सरल बनाया जा सकता है। जैसे, “मेरी बारी”, “तुम्हारी बारी”, “मुझे पसंद नहीं”, “पहले पूछो।”
धीरे-धीरे बच्चे समझने लगते हैं कि दूसरे को चिल्लाकर हराना ही अपनी बात रखने का तरीका नहीं है।
माता-पिता इस प्रक्रिया को खेल की तरह भी सिखा सकते हैं। रोजमर्रा के छोटे काल्पनिक विवाद लेकर बच्चों से पूछ सकते हैं कि अगर दोनों को एक ही चीज चाहिए तो क्या किया जा सकता है। इससे वास्तविक लड़ाई के समय उन्हें पहले से सीखी हुई भाषा याद आने की संभावना बढ़ सकती है।
जब बच्चे अच्छा व्यवहार करें तो उसे भी नोटिस करें
माता-पिता अक्सर बच्चों की लड़ाई तुरंत नोटिस कर लेते हैं, लेकिन जब दोनों बच्चे शांति से खेल रहे हों तो उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। इससे बच्चों को यह संदेश मिल सकता है कि माता-पिता का सबसे ज्यादा ध्यान तभी मिलता है जब घर में विवाद होता है।
इसलिए जब बच्चे बिना लड़ाई के खिलौना साझा करें, एक-दूसरे की मदद करें या किसी समस्या का समाधान खुद निकालें तो उस व्यवहार को पहचानें।
“तुम दोनों ने बिना मेरी मदद के बारी-बारी से खेल लिया, यह अच्छा तरीका था” जैसी प्रतिक्रिया बच्चे को बताती है कि कौन-सा व्यवहार परिवार में सकारात्मक माना जाता है।
प्रशंसा बहुत सामान्य न होकर व्यवहार से जुड़ी हो तो बच्चे के लिए यह समझना आसान होता है कि उसने वास्तव में क्या अच्छा किया।
हर विवाद में माता-पिता तुरंत बीच में न आएं
अगर बच्चे सुरक्षित हैं और केवल बहस कर रहे हैं तो माता-पिता उन्हें कुछ समय समस्या हल करने का मौका दे सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें पूरी तरह अकेला छोड़ दिया जाए। माता-पिता पास रहकर देख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बातचीत को दिशा दे सकते हैं।
उदाहरण के लिए अगर दोनों बच्चे एक ही खिलौना मांग रहे हैं तो माता-पिता तुरंत यह तय करने के बजाय पूछ सकते हैं, “तुम दोनों के पास क्या-क्या विकल्प हैं?”
अगर बच्चे कोई समाधान नहीं निकाल पाते तो माता-पिता दो-तीन विकल्प दे सकते हैं और उनसे चुनाव करने को कह सकते हैं।
इस प्रक्रिया से बच्चे धीरे-धीरे problem-solving skills विकसित कर सकते हैं।
लेकिन मारपीट को सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें
भाई-बहन का झगड़ा सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार मारना, गंभीर चोट पहुंचाना, डराना, धमकाना, जानबूझकर नुकसान पहुंचाना या किसी एक बच्चे को लगातार निशाना बनाना केवल सामान्य sibling rivalry मानकर छोड़ना ठीक नहीं है।
ऐसी स्थिति में माता-पिता को स्पष्ट रूप से हस्तक्षेप करना चाहिए और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। अगर व्यवहार लगातार गंभीर बना रहता है या परिवार स्वयं स्थिति संभाल नहीं पा रहा है, तो pediatrician, child psychologist या qualified mental-health professional से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
इसी तरह अगर किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव आया है—जैसे लगातार गुस्सा, स्कूल जाने से इनकार, बहुत ज्यादा डर या सामाजिक दूरी—तो उसके पीछे किसी अन्य परेशानी की संभावना को भी समझने की जरूरत हो सकती है।
बच्चों को यह महसूस कराएं कि भाई-बहन प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं
भाई-बहन के रिश्ते में प्रतिस्पर्धा पूरी तरह खत्म करना जरूरी नहीं है। बच्चे खेल में एक-दूसरे से मुकाबला करेंगे, अलग राय रखेंगे और कभी-कभी नाराज भी होंगे। लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि दोनों कभी लड़ें ही नहीं।
असल लक्ष्य यह है कि बच्चे लड़ाई के बाद वापस रिश्ते में कैसे लौटें, यह सीखें।
अगर बच्चे यह सीख जाते हैं कि नाराज होने के बावजूद बात की जा सकती है, अपनी बारी का इंतजार किया जा सकता है, दूसरे की बात सुनी जा सकती है और जरूरत पड़ने पर माफी मांगी जा सकती है, तो भविष्य में उनके बीच होने वाले मतभेदों को संभालना आसान हो सकता है।
माता-पिता भी यहां सबसे बड़े role model होते हैं। बच्चे केवल यह नहीं सीखते कि माता-पिता उन्हें क्या बताते हैं; वे यह भी देखते हैं कि माता-पिता खुद असहमति होने पर कैसे बात करते हैं। अगर घर में बड़े लोग शांत तरीके से अपनी बात रखते हैं, एक-दूसरे को सुनते हैं और गलती होने पर माफी मांगते हैं, तो बच्चे भी इन्हीं व्यवहारों को सीख सकते हैं।
इसलिए बच्चों को “प्यार से रहो” कहना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उन्हें दिखाना कि प्यार से रहने का मतलब व्यवहार में क्या होता है।
आखिर में, माता-पिता को यह याद रखना चाहिए कि भाई-बहन के झगड़े का समाधान किसी एक दिन में नहीं आता। बच्चों को emotional regulation, communication और conflict resolution सीखने में समय लगता है। कभी एक तरीका काम करेगा, कभी दूसरा। डांटने और बार-बार “लड़ना बंद करो” कहने के बजाय बच्चों को यह सिखाना अधिक उपयोगी हो सकता है कि गुस्सा आने पर क्या करें, अपनी बात कैसे कहें, दूसरे की बात कैसे सुनें और समस्या का समाधान कैसे खोजें।
शाकाहारियों के लिए Protein के Best Sources: शरीर में प्रोटीन के 10 काम और कमी के 8 संकेत
http://भाई बहन के झगड़े को सुलझाने के लिए बच्चों को parenting के जरिए समझाते माता पिता
