भारत और बांग्लादेश के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेता नाहिद इस्लाम ने भारत के लिए बांग्लादेश की जमीन से ट्रांजिट कॉरिडोर बनाने की किसी भी कोशिश का विरोध किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार पर आरोप लगाया कि वह भारत को ऐसा कॉरिडोर उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रही है। नाहिद इस्लाम ने कहा कि बांग्लादेश की जनता ऐसा कोई कथित कॉरिडोर स्वीकार नहीं करेगी।
यह बयान 30 अक्टूबर 2026 को ढाका में आयोजित एक रैली के दौरान आया। नाहिद इस्लाम ने गंगा जल बंटवारे के मुद्दे पर भी अपनी सरकार को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि 1996 की गंगा जल संधि का नवीनीकरण बांग्लादेश के हितों और उसके हिस्से के पानी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर होना चाहिए। यदि नए समझौते में बांग्लादेश के हित सुरक्षित नहीं किए गए तो विरोध प्रदर्शन किए जा सकते हैं।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल संधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। दूसरी ओर, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया जापान यात्रा के दौरान क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और बंगाल की खाड़ी के आसपास आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। हालांकि, बांग्लादेश सरकार के विदेश मंत्रालय के एक मंत्री ने स्पष्ट किया है कि जापान यात्रा के दौरान किसी तीसरे देश से जुड़ा मुद्दा चर्चा में नहीं था।
ढाका की रैली में नाहिद इस्लाम ने क्या कहा?
बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने शुक्रवार को ढाका में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए भारत के लिए कथित ट्रांजिट कॉरिडोर का मुद्दा उठाया। रैली में सैकड़ों समर्थक शामिल हुए थे। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद और बिजली, ऊर्जा एवं खनिज संसाधन मंत्री इकबाल हसन महमूद टुकू के इस्तीफे की मांग करना था।
पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार कानून-व्यवस्था की स्थिति और गैस-बिजली की कमी जैसे मुद्दों को ठीक से संभालने में नाकाम रही है। इसी दौरान नाहिद इस्लाम ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार पर भारत को ट्रांजिट कॉरिडोर देने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किसी ऐसे कॉरिडोर के लिए नहीं होना चाहिए, जिसे देश के हितों के खिलाफ माना जा रहा हो। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि जनता की सहमति और राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करके कोई फैसला नहीं किया जाना चाहिए।
नाहिद इस्लाम के बयान को भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन, परिवहन और नदियों के पानी के बंटवारे जैसे कई मुद्दे पहले से चर्चा में रहते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फिलहाल भारत को ऐसा नया ट्रांजिट कॉरिडोर देने का कोई अंतिम समझौता सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं हुआ है। यह मुद्दा मुख्य रूप से नाहिद इस्लाम के आरोप और उनके राजनीतिक विरोध के कारण चर्चा में आया है।
जापान यात्रा के बाद क्यों उठा भारत के कॉरिडोर का मुद्दा?
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 26 से 29 अक्टूबर 2026 तक जापान का दौरा किया था। इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश और जापान ने बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर सहमति जताई।
दोनों देशों ने Bay of Bengal Industrial Growth Belt यानी BIG-B पहल को एक नए रणनीतिक सहयोग ढांचे के रूप में आगे बढ़ाने पर सहमति दी। इस सहयोग में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, आपदा प्रबंधन, निजी क्षेत्र के निवेश, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय शामिल हैं।
जापान बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में मातरबाड़ी डीप-सी पोर्ट के विकास में भी सहायता कर रहा है। इस बंदरगाह को बंगाल की खाड़ी में व्यापार और समुद्री संपर्क बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण परियोजना माना जाता है।
नाहिद इस्लाम ने इसी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पहल को लेकर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि जापान के सहयोग से बांग्लादेश के रास्ते ऐसा कॉरिडोर बनाने की कोशिश हो सकती है, जिसका फायदा भारत को मिलेगा। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से जोड़कर विरोध किया।
लेकिन बांग्लादेश सरकार के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि जापान यात्रा के दौरान किसी तीसरे देश से संबंधित विषय पर चर्चा नहीं हुई। उनके मुताबिक, बातचीत का केंद्र बांग्लादेश और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी तीसरे देश से जुड़ा मुद्दा उठता है, तो उस देश के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही उस पर बातचीत होनी चाहिए।
इसलिए जापान यात्रा और भारत के कथित कॉरिडोर के बीच संबंध को अभी विपक्षी नेता के आरोप के रूप में ही देखना चाहिए, न कि किसी पक्के सरकारी समझौते के रूप में।
ट्रांजिट और कॉरिडोर में क्या अंतर है?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए ट्रांजिट और कॉरिडोर के बीच अंतर जानना जरूरी है। आम बोलचाल में दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, लेकिन परिवहन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इनके अर्थ और व्यवस्थाएं अलग हो सकती हैं।
ट्रांजिट का मतलब: जब किसी देश का सामान, वाहन या यात्री किसी दूसरे देश के रास्ते तीसरे स्थान तक पहुंचते हैं, तो इसे सामान्य रूप से ट्रांजिट कहा जाता है। उदाहरण के लिए, भारत का कोई मालवाहक वाहन बांग्लादेश के निर्धारित मार्ग से गुजरकर भारत के पूर्वोत्तर राज्य तक पहुंचता है, तो यह ट्रांजिट व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। इसके लिए दोनों देशों के बीच नियम, सीमा शुल्क, सुरक्षा जांच और परिवहन संबंधी शर्तें तय की जाती हैं।
कॉरिडोर का मतलब: कॉरिडोर आम तौर पर किसी खास मार्ग या परिवहन नेटवर्क को कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल तय उद्देश्य के लिए किया जाता है। यह सड़क, रेल, बंदरगाह या अन्य परिवहन सुविधाओं को जोड़ सकता है। किसी कॉरिडोर में अलग-अलग देशों की भागीदारी, निवेश, संचालन और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।
इन दोनों व्यवस्थाओं का वास्तविक स्वरूप संबंधित देशों के समझौते पर निर्भर करता है। केवल किसी मार्ग से गुजरने की अनुमति मिलने का मतलब यह नहीं होता कि उस देश की जमीन दूसरे देश को सौंप दी गई है।
इसी अंतर को लेकर बांग्लादेश में राजनीतिक बहस चल रही है। नाहिद इस्लाम का विरोध कथित कॉरिडोर को लेकर है, जबकि सरकार ने जापान यात्रा के दौरान तीसरे देश से संबंधित चर्चा होने से इनकार किया है। इसलिए किसी प्रस्ताव की वास्तविक शर्तें और आधिकारिक दस्तावेज सामने आए बिना यह कहना सही नहीं होगा कि बांग्लादेश ने भारत को अपनी जमीन दे दी है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बांग्लादेश क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि देश के बाकी हिस्सों से उनका संपर्क मुख्य रूप से एक संकरे भू-भाग के जरिए होता है, जिसे आमतौर पर सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक कहा जाता है। इसी वजह से भारत के लिए बांग्लादेश के साथ बेहतर सड़क, रेल, नदी और बंदरगाह संपर्क का आर्थिक और रणनीतिक महत्व है।
यदि दोनों देशों के बीच पारगमन और परिवहन की व्यवस्था मजबूत होती है, तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने के कुछ रास्ते छोटे और अधिक सुविधाजनक हो सकते हैं। इससे परिवहन समय और लॉजिस्टिक्स लागत कम करने की संभावना रहती है।
बांग्लादेश के लिए भी भारत के साथ कनेक्टिविटी बढ़ने के कई आर्थिक फायदे हो सकते हैं। बेहतर परिवहन से व्यापार, बंदरगाहों का इस्तेमाल, सीमा क्षेत्रों में कारोबार और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
लेकिन ऐसी किसी व्यवस्था को लागू करने के लिए दोनों देशों के बीच सहमति, पारदर्शी नियम, सुरक्षा प्रबंध और आर्थिक लाभ का संतुलन जरूरी है। बांग्लादेश में विपक्षी दलों की चिंता यही है कि किसी भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी समझौते में देश की संप्रभुता और आर्थिक हितों से समझौता न हो।
भारत के विदेश मंत्रालय ने भी अक्टूबर में कहा था कि भारत जापान के साथ अपनी साझेदारी को मजबूत करना चाहता है और इसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी पहलें भी शामिल हैं। हालांकि, इस बयान को बांग्लादेश के रास्ते किसी नए कॉरिडोर की पुष्टि नहीं माना जा सकता।
गंगा जल संधि क्या है और यह कब हुई थी?
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था। इसे गंगा जल बंटवारा संधि या Ganges Water Sharing Treaty कहा जाता है। इस संधि पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में हस्ताक्षर किए गए थे।
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज के पास गंगा नदी के पानी को भारत और बांग्लादेश के बीच बांटने की व्यवस्था तय करना था। खास तौर पर जनवरी से मई के बीच, जब नदी में पानी का स्तर अपेक्षाकृत कम रहता है, उस दौरान पानी के बंटवारे के नियम इस संधि में शामिल हैं।
गंगा नदी भारत के कई राज्यों से होकर गुजरती है और आगे बांग्लादेश में प्रवेश करती है। बांग्लादेश में इस नदी को पद्मा के नाम से भी जाना जाता है। दोनों देशों के लिए नदी का पानी कृषि, सिंचाई, पेयजल, मत्स्य पालन, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
इस संधि की अवधि 30 साल रखी गई थी। अब यह 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच नए समझौते या मौजूदा संधि के नवीनीकरण को लेकर बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है
बांग्लादेश गंगा जल समझौते में क्या बदलाव चाहता है?
बांग्लादेश लंबे समय से गंगा जल समझौते में अपने हिस्से के पानी की सुरक्षा के लिए मजबूत प्रावधानों की मांग करता रहा है। बांग्लादेश की चिंता खास तौर पर सूखे मौसम यानी जनवरी से मई के दौरान पानी की उपलब्धता को लेकर है।
इस अवधि में नदी में पानी कम होने के कारण सिंचाई, खेती और अन्य जरूरतों पर दबाव बढ़ सकता है। बांग्लादेश चाहता है कि नए समझौते में उसके हिस्से के पानी को सुरक्षित रखने के लिए स्पष्ट और प्रभावी गारंटी हो।
रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश एक लंबे समय के समझौते और ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहा है, जिसमें कम पानी की स्थिति में भी उसके हिस्से की सुरक्षा का प्रावधान हो। नाहिद इस्लाम ने इसी मांग को राजनीतिक रूप से उठाते हुए कहा है कि बांग्लादेश अपने उचित हिस्से से समझौता नहीं करेगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समझौते का नवीनीकरण बांग्लादेश के हितों के अनुरूप नहीं हुआ, तो देश में विरोध प्रदर्शन किए जा सकते हैं। उनके बयान से साफ है कि गंगा जल का मुद्दा केवल तकनीकी बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां की घरेलू राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भारत का गंगा जल संधि पर क्या रुख है?
भारत की ओर से साझा नदियों और पानी के बंटवारे से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के लिए द्विपक्षीय संयुक्त नदी आयोग यानी Joint Rivers Commission (JRC) का मंच मौजूद है। यह आयोग 1972 में भारत और बांग्लादेश के बीच बनाया गया था।
इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच साझा नदियों से जुड़े मुद्दों पर सहयोग, जानकारी का आदान-प्रदान और आपसी बातचीत को आगे बढ़ाना है। भारत और बांग्लादेश के बीच 54 साझा नदियां हैं। इसलिए नदी प्रबंधन, बाढ़, पानी की उपलब्धता और जल बंटवारे जैसे मुद्दे दोनों देशों के संबंधों में अहम भूमिका निभाते हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से पहले यह कहा गया था कि गंगा जल संधि से जुड़ी तकनीकी स्तर की बातचीत जारी है। भारत का रुख है कि साझा नदियों से संबंधित विषयों पर दोनों देशों के बीच स्थापित द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से चर्चा होनी चाहिए।
इसका अर्थ है कि संधि के नवीनीकरण का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी से तय नहीं होगा। इसमें नदी के जल प्रवाह के आंकड़े, मौसम, वर्षा, बांध और बैराज प्रबंधन, सिंचाई की जरूरतें तथा दोनों देशों की तकनीकी चिंताओं को ध्यान में रखना होगा।
फरक्का बैराज क्यों है इस विवाद के केंद्र में?
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर स्थित एक महत्वपूर्ण जल संरचना है। इसका निर्माण मुख्य रूप से हुगली नदी में पानी के प्रवाह को बनाए रखने और कोलकाता बंदरगाह से जुड़ी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया था।
फरक्का बैराज भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे की चर्चा में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1996 की संधि में इसी स्थान के पास उपलब्ध पानी के वितरण की व्यवस्था तय की गई है।
भारत के लिए हुगली नदी और उससे जुड़े बंदरगाहों की जरूरतें महत्वपूर्ण हैं। वहीं, बांग्लादेश के लिए गंगा का पानी खेती, सिंचाई और नदी आधारित आजीविका के लिए अहम है। जब सूखे मौसम में नदी का प्रवाह कम होता है, तब दोनों देशों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसलिए संधि के नवीनीकरण में केवल पानी की मात्रा तय करना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों देशों को आंकड़ों की पारदर्शिता, जल प्रवाह की निगरानी, कम पानी की स्थिति में वितरण और विवाद समाधान की प्रक्रिया पर भी सहमति बनानी होगी।
क्या कॉरिडोर और गंगा जल संधि एक ही विवाद का हिस्सा हैं?
नाहिद इस्लाम ने अपनी रैली में दोनों मुद्दे उठाए, लेकिन इनका स्वरूप अलग-अलग है।
ट्रांजिट कॉरिडोर का सवाल मुख्य रूप से सीमा पार परिवहन, व्यापार, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा है। वहीं, गंगा जल संधि का संबंध नदी के पानी के बंटवारे और दोनों देशों की जल जरूरतों से है।
इन दोनों विषयों को एक साथ उठाने से बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भारत के साथ संबंधों पर बहस तेज हो सकती है। विपक्षी दल सरकार से यह पूछ सकते हैं कि वह भारत के साथ किसी भी समझौते में बांग्लादेश के हितों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी।
लेकिन यह जरूरी नहीं कि दोनों मुद्दों पर बातचीत एक ही मंच या एक ही समझौते के तहत हो। गंगा जल संधि के लिए संयुक्त नदी आयोग और संबंधित द्विपक्षीय तंत्र महत्वपूर्ण हैं, जबकि ट्रांजिट और कनेक्टिविटी के लिए अलग परिवहन, सीमा और व्यापार संबंधी समझौते आवश्यक हो सकते हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत और बांग्लादेश के संबंध भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा सुरक्षा, ऊर्जा, परिवहन, नदी प्रबंधन और लोगों के आवागमन जैसे कई विषयों पर सहयोग होता रहा है।
बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए महत्वपूर्ण पड़ोसी है, जबकि भारत बांग्लादेश के लिए बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक और आर्थिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच बेहतर संपर्क से व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।
लेकिन यदि किसी बड़े समझौते को लेकर बांग्लादेश में राजनीतिक विरोध बढ़ता है, तो सरकार के लिए उस पर आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय हित, जनता की राय और राजनीतिक दलों की आपत्तियां नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत के लिए भी यह जरूरी होगा कि किसी भी कनेक्टिविटी या नदी जल संबंधी बातचीत में पारदर्शिता बनी रहे और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखा जाए। बांग्लादेश के लिए भी भारत के साथ आर्थिक सहयोग और अपने घरेलू राजनीतिक दबाव के बीच संतुलन बनाना चुनौती हो सकती है।
क्या बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं?
नाहिद इस्लाम ने गंगा जल समझौते के नवीनीकरण को लेकर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि बांग्लादेश के हिस्से के पानी की सुरक्षा नहीं हुई, तो लोग सड़कों पर उतर सकते हैं।
हालांकि, अभी यह कहना संभव नहीं है कि देशव्यापी आंदोलन कब या किस स्तर पर होगा। फिलहाल यह एक राजनीतिक चेतावनी है। विरोध प्रदर्शन की वास्तविक स्थिति आगे होने वाली बातचीत, सरकार के फैसलों और विपक्षी दलों की रणनीति पर निर्भर करेगी।
ट्रांजिट कॉरिडोर के मुद्दे पर भी विपक्षी दल सरकार से जवाब मांग सकते हैं। यदि सरकार किसी प्रस्ताव पर विचार करती है, तो उसे उसकी शर्तें, आर्थिक लाभ, सुरक्षा व्यवस्था और बांग्लादेश की संप्रभुता से जुड़े पहलुओं को स्पष्ट करना होगा।
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले दिनों में भारत और बांग्लादेश के संबंधों से जुड़े कुछ घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे।
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गंगा जल संधि की बातचीत: 12 दिसंबर 2026 की समय-सीमा से पहले दोनों देशों के बीच नवीनीकरण पर क्या सहमति बनती है।
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बांग्लादेश सरकार का रुख: प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ट्रांजिट कॉरिडोर के आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देती है।
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जापान-बांग्लादेश सहयोग: BIG-B पहल और मातरबाड़ी बंदरगाह परियोजना पर आगे क्या प्रगति होती है।
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भारत की प्रतिक्रिया: भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और साझा नदियों के मुद्दों पर किस तरह की बातचीत आगे बढ़ाता है।
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विपक्ष की रणनीति: नाहिद इस्लाम और NCP इन मुद्दों को आगे किस तरह उठाते हैं।
इन सभी विषयों का असर भारत-बांग्लादेश के राजनीतिक और आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है। लेकिन किसी भी संभावित समझौते या विरोध के बारे में अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक घोषणाओं और वास्तविक घटनाक्रम के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
क्षा के लिए स्पष्ट गारंटी हो और समझौता लंबी अवधि के लिए किया जाए।
7. भारत और बांग्लादेश के बीच कितनी साझा नदियां हैं?
दोनों देशों के बीच 54 साझा नदियां हैं। इनके जल प्रबंधन और संबंधित मुद्दों पर बातचीत के लिए 1972 में संयुक्त नदी आयोग बनाया गया था।
8. भारत के लिए बांग्लादेश का ट्रांजिट क्यों महत्वपूर्ण है?
बांग्लादेश के रास्ते बेहतर सड़क, रेल और जल परिवहन संपर्क से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने के वैकल्पिक रास्ते विकसित हो सकते हैं। इससे समय और परिवहन लागत कम होने की संभावना रहती है।

