होली का त्योहार आते ही देशभर में घर लौटने की होड़ मच जाती है। लेकिन इस बार रंगों के त्योहार से पहले ही हवाई किराए ने रंगों के त्योहार बिगाड़ दिया है। प्रमुख रूट्स पर टिकट कीमतें सामान्य दिनों की तुलना में 2 से 3 गुना तक बढ़ गई हैं। कई रूट्स पर 300% तक अधिक किराया वसूले जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
त्योहारी सीजन में मांग बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या एयरलाइंस कंपनियां ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ के नाम पर मनमानी कर रही हैं? संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है, फिर भी यात्रियों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही।
60% रूट एक कंपनी के पास, प्रतिस्पर्धा कम
एविएशन सेक्टर के जानकारों के मुताबिक देश के लगभग 60% रूट्स पर एक ही प्रमुख कंपनी का वर्चस्व है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है और मांग बढ़ते ही किराया तेजी से ऊपर चला जाता है।
दिल्ली–पटना, मुंबई–वाराणसी, बेंगलुरु–लखनऊ, दिल्ली–जयपुर और मुंबई–रांची जैसे रूट्स पर टिकट कीमतें होली से ठीक पहले अचानक दोगुनी-तिगुनी हो गईं। जहां सामान्य दिनों में 4,000 से 6,000 रुपये में टिकट मिल जाती थी, वहीं अब 12,000 से 18,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।
डायनेमिक फेयर सिस्टम पर सवाल
एयरलाइंस कंपनियां किराया बढ़ने को ‘डायनेमिक फेयर सिस्टम’ का परिणाम बताती हैं। इस सिस्टम में मांग और उपलब्ध सीटों के आधार पर कीमतें तय होती हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह एल्गोरिद्म पारदर्शी नहीं है।
कई यात्रियों ने शिकायत की कि मोबाइल ऐप से टिकट बुक करने पर किराया ज्यादा दिखा, जबकि लैपटॉप से कम। इससे यह आशंका भी उठी है कि डिवाइस या सर्च हिस्ट्री के आधार पर किराया तय किया जा रहा है।
संसद और कोर्ट में गूंजा मुद्दा
हाल के दिनों में संसद में यह मुद्दा उठा कि त्योहारी सीजन में एयरफेयर की अधिकतम सीमा तय की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर कर किराया नियंत्रण की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि हवाई यात्रा अब ‘लक्जरी’ नहीं, बल्कि आवश्यक सेवा बन चुकी है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यात्रियों से अनुचित वसूली न हो।
यात्रियों की परेशानी
पुणे में काम करने वाले कई युवा कर्मचारियों ने बताया कि वे होली पर घर जाने का प्लान बना रहे थे, लेकिन महंगे टिकट के कारण उन्हें योजना रद्द करनी पड़ी। कुछ लोगों ने ट्रेन या बस का सहारा लिया, जबकि कई ने यात्रा स्थगित कर दी।
एयरपोर्ट पर भीड़ बढ़ने और फ्लाइट्स के फुल होने से यात्रियों की परेशानी और बढ़ गई है। कई फ्लाइट्स ‘वेटिंग’ मोड में हैं और आखिरी समय पर टिकट मिलना मुश्किल हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
भारत में फ्लाइट कैंसिल होने पर मुआवजा अपेक्षाकृत कम है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में यात्रियों को अधिक मुआवजा मिलता है, जबकि भारत में यह राशि सीमित है। विशेषज्ञों का कहना है कि एविएशन रेगुलेशन को मजबूत करने की जरूरत है ताकि यात्रियों के हित सुरक्षित रहें।
तेल कीमत और परिचालन लागत
एयरलाइंस कंपनियां यह भी तर्क देती हैं कि एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) की कीमतों में उतार-चढ़ाव से परिचालन लागत बढ़ती है। लेकिन यात्रियों का सवाल है कि जब ईंधन सस्ता होता है, तब किराया उतनी तेजी से कम क्यों नहीं होता?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि
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त्योहारों पर किराया कैप (ऊपरी सीमा) तय की जाए।
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डायनेमिक प्राइसिंग एल्गोरिद्म को पारदर्शी बनाया जाए।
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प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए नए खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया जाए।
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उपभोक्ता शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत किया जाए।
यदि सरकार और नियामक एजेंसियां सक्रिय कदम उठाती हैं, तो यात्रियों को राहत मिल सकती है।
फिलहाल होली के मौके पर यात्रियों को महंगे टिकट का सामना करना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में यदि मांग और बढ़ती है, तो किराया और ऊपर जा सकता है। ऐसे में यात्रियों को सलाह दी जा रही है कि वे पहले से योजना बनाएं और किराया तुलना वेबसाइट्स का उपयोग करें।
त्योहार खुशियों का होता है, लेकिन इस बार हवाई किराए ने कई परिवारों की योजना पर पानी फेर दिया है। अब देखना होगा कि सरकार और नियामक एजेंसियां इस पर क्या ठोस कदम उठाती हैं।















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