पश्चिम एशिया में गत कुछ दिनों से चल रही कड़ी तनातनी अचानक युद्ध जैसे मोड़ पर पहुँच गई, जब संयुक्त अमेरिकी–इस्राइली हमले के दौरान ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की पुष्टि हुई। खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता रहे हैं और उनका नेतृत्व दशकों तक इस्लामिक गणराज्य की नीति की रीढ़ रहा है। उनके निधन ने केवल ईरान ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनैतिक दिशा को बदल दिया है और बदले की आग भूचाल की तरह फैल रही है।
ईरानी राज्य मीडिया ने कहा कि खामेनेई पर अमेरिका और इस्राइल की संयुक्त एयर स्ट्राइक में हमला हुआ, जिससे उनका ऑफिस परिसर तबाह हो गया और वे वहीं मृत्यु को प्राप्त हुए थे। इस हमले में उनके परिवार के सदस्यों सहित कई वरिष्ठ सैनिक अधिकारी भी मारे गए। ईरानी कैबिनेट ने 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया है और खामनेई को “शहीद” की संज्ञा दी है।
अमेरिका का ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ — कैसे शुरू हुआ युद्ध
संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और इस्राइल ने “Operation Epic Fury” नामक सैन्य अभियान के तहत ईरान पर सबसे बड़े पैमाने पर हमला किया। इसमें टीओएफ एयरक्राफ्ट, मिसाइलें और ड्रोन सहित सामरिक बमबारी शामिल थीं। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने बताया कि इस ऑपरेशन का लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमताओं, परमाणु केंद्रों और सैन्य नेतृत्व को कमजोर करना था।
अमेरिका का दावा है कि यह हमला “आतंकवाद और परमाणु खतरे” को रोकने के लिए आवश्यक था, जबकि ईरान और उसके सहयोगियों ने इसे “अवैध, आक्रामक और युद्ध अपराध” बताया है। इस हमले से पहले कूटनीतिक बातचीत जारी थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता संभव नहीं हो पाया।
ईरान का जवाब — बदले की आग भड़की
खामनेई की मौत के बाद ईरानी नेता और संसद ने स्पष्ट कर दिया कि वे “लक्ष्मण रेखा पार किए जाने” का बदला लेंगे। ईरान ने कहा है कि अमेरिका और इस्राइल ने न केवल उसके सेना के शीर्ष नेतृत्व को मार गिराया है, बल्कि पूरे देश के सम्मान और आत्मा को चोट पहुंचाई है। संसद अध्यक्ष ने कहा कि उस पार की ताकतों को इसका “कठोर परिणाम” भुगतना होगा।
इस जवाबी नीति के तहत ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले पूरे गल्फ क्षेत्र में किए, जिसमें UAE, कुवैत, कतर और बहरीन समेत कई राज्यों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इससे उस क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और कई देशों की ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को खतरा उत्पन्न हुआ है।
ईरानी अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे दूसरे देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य आधारों के खिलाफ हमले जारी रखेंगे ताकि अमेरिका तथा उसके सहयोगियों को “भुगतान करने” के लिए मजबूर किया जा सके।
क्षेत्रीय और ग्लोबल प्रभाव — तेल बाजार से लेकर तालिबानी तक
खामनेई की मौत और इसके बाद के हमलों ने सीधे तौर पर हौर्मुज जलडमरूमध्य संकट को जन्म दिया, जो कि वैश्विक तेल संचार का मुख्य मार्ग है। इस क्षेत्र में तनाव के कारण जहाजों का गुजरना बंद हो गया और तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ।
गल्फ के राजशाही देश, जिनकी पहले से अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग संबंध थे, अब एक चुनाव के सामने खड़े हैं — कूटनीति अपनाएं या युद्ध को आगे बढ़ाएं। काफी राजनैतिक तथा आर्थिक दबाव के बीच उन्हें अपने निर्णयों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया गया है।
इसके अलावा, लेबनान की हेज्बोल्लाह संगठन ने भी इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका ली है और इस्राइल पर मिसाइलें दागीं, जिससे लेबनान में प्रतिकूल स्थिति बन गई। इस हिंसा ने सीधी तौर पर क्षेत्र में लड़ाई का दायरा व्यापक कर दिया है।
नया नेतृत्व और ईरानी राजनीति की दिशा
खामनेई के निधन के बाद ईरान में अंतरिम नेतृत्व परिषद ने अयातुल्लाह अली रेजा अराफी को अस्थायी सुप्रीम लीडर के रूप में नियुक्त किया है, जैसा कि देश के संविधान के तहत किया जाता है। अराफी अब अगले स्थायी सर्वोच्च नेता के चयन तक देश का मार्गदर्शन करेंगे।
ईरान के विदेश मंत्री और सुरक्षा सलाहकारों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं करेंगे जब तक वे अपनी सैन्य कार्रवाई बंद नहीं करेंगे। उनका कहना है कि यह संघर्ष ‘आत्म-संरक्षण’ का हिस्सा है न कि केवल बदला।
अमेरिका की प्रतिक्रिया और संघर्ष की लंबी लड़ाई
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि वे ईरान को “नष्ट करने” जैसा विकल्प चुन रहे हैं यदि उसने आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ईरान विरोध नहीं करेगा तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही उन्होंने खिलाफ जारी ऑपरेशन को चार से पांच हफ्तों तक जारी रहने का संकेत दिया है।
संयुक्त राज्य की ओर से यह भी कहा गया है कि वे अपने सैनिकों और सहयोगी देशों को सुरक्षित रखने के लिए दबाव नहीं छोड़ेंगे।
नागरिक, वैश्विक सुरक्षा और मानवीय संकट
इस संघर्ष में आम नागरिक भी जख्मी और प्रभावित हुए हैं। ईरानी रेड क्रेसेंट ने कहा है कि अब तक सैकड़ों लोग हताहत हो चुके हैं। मिसाइलें और ड्रोन हमले शहरों, स्कूलों और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बना चुके हैं, जिससे मानवीय संकट गहराया है और श्रोताएं भी चिंता जता रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने संघर्ष को “गंभीर क्षेत्रीय संकट” बताया है और सभी पक्षों से तुरंत संघर्ष विराम करने और कूटनीतिक निर्णय लेने की मांग की है।
क्या आगे और भी बदले की आग भड़केगी?
विशेषज्ञों के अनुसार यह युद्ध केवल कुछ दिनों या हफ्तों तक सीमित नहीं रह सकता। दोनों पक्षों की ओर से सख्त बयानबाजी, बदले की धमकियां और सैन्य हमलों से यह संघर्ष और भी लंबा खिंच सकता है, जिससे पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।
यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय बाजार, और सुरक्षा गठबंधन सभी पर बड़ा असर होगा। पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की तथा चीन जैसे देश इस पूरे संकट को नजदीकी निगाह से देख रहे हैं क्योंकि इसकी अपेक्षित प्रतिक्रिया उनके राष्ट्रीय हितों को भी प्रभावित कर सकती है।















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