भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल अब केवल टेक्नोलॉजी या फाइनेंस तक सीमित नहीं रहा। हेल्थकेयर सेक्टर में भी एआई तेजी से बदलाव ला रहा है। इसी कड़ी में एक भारतीय हेल्थ-टेक स्टार्टअप “एआई ग्नोसिस” (AI Gnosis) चर्चा में है, जो दावा करता है कि वह बचपन में ही ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) की शुरुआती पहचान कर इलाज की राह आसान बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म की पहचान जितनी जल्दी हो, बच्चे के विकास की संभावनाएं उतनी बेहतर होती हैं। लेकिन भारत जैसे देश में अब भी जागरूकता, विशेषज्ञों की कमी और महंगे डायग्नोस्टिक प्रोसेस के कारण समय पर पहचान नहीं हो पाती। एआई ग्नोसिस इसी गैप को भरने की कोशिश कर रहा है।
कैसे काम करता है एआई ग्नोसिस का मॉडल?
एआई ग्नोसिस का प्लेटफॉर्म बच्चों के व्यवहार, चेहरे के हावभाव, आवाज की प्रतिक्रिया और संवाद पैटर्न का विश्लेषण करता है। इसके लिए एक छोटा-सा वीडियो टेस्ट लिया जाता है, जिसमें बच्चा स्क्रीन पर दिखाई जा रही गतिविधियों पर प्रतिक्रिया देता है।
यह सिस्टम मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म की मदद से माइक्रो-एक्सप्रेशन, आंखों की मूवमेंट, प्रतिक्रिया समय और सामाजिक संकेतों का अध्ययन करता है। इसके बाद एक रिपोर्ट तैयार होती है, जो यह संकेत देती है कि बच्चे में ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण हैं या नहीं।
स्टार्टअप का दावा है कि यह प्रक्रिया पारंपरिक टेस्ट की तुलना में तेज, किफायती और सुलभ है। जहां पारंपरिक निदान में कई सत्र और विशेषज्ञों की टीम की जरूरत होती है, वहीं एआई आधारित स्क्रीनिंग कुछ ही मिनटों में प्राथमिक आकलन दे सकती है।
पारंपरिक प्रक्रिया बनाम एआई स्क्रीनिंग
आमतौर पर अगर माता-पिता को संदेह होता है कि बच्चे का विकास सामान्य से अलग है, तो वे पीडियाट्रिशियन या डेवलपमेंटल साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करते हैं। इसके बाद कई चरणों की जांच, इंटरव्यू और ऑब्जर्वेशन होते हैं, जिनमें हफ्तों से महीनों का समय लग सकता है।
एआई ग्नोसिस का उद्देश्य इस शुरुआती चरण को छोटा करना है। प्लेटफॉर्म प्राथमिक स्क्रीनिंग प्रदान करता है, जिससे डॉक्टर आगे की जांच और थेरेपी की दिशा तय कर सकें।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि एआई केवल एक स्क्रीनिंग टूल है, अंतिम निदान विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा ही किया जाना चाहिए।
11 सदस्यों की टेक और मेडिकल टीम
स्टार्टअप की टीम में टेक इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट और मेडिकल कंसल्टेंट शामिल हैं। कंपनी का कहना है कि उन्होंने हजारों डेटा पॉइंट्स पर मॉडल को ट्रेन किया है, ताकि भारतीय बच्चों के व्यवहारिक पैटर्न के अनुसार सटीक विश्लेषण किया जा सके।
एआई ग्नोसिस ने अपने मॉडल को इस तरह डिजाइन किया है कि यह क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक विविधताओं को भी समझ सके। भारत जैसे विविध देश में यह एक अहम पहलू माना जा रहा है।
माता-पिता और डॉक्टरों के लिए राहत
ऑटिज्म की पहचान में देरी होने पर बच्चे की भाषा, सामाजिक और संज्ञानात्मक क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। जल्दी पहचान से स्पीच थेरेपी, बिहेवियरल थेरेपी और विशेष शिक्षा कार्यक्रम समय पर शुरू किए जा सकते हैं।
कई माता-पिता के लिए यह प्लेटफॉर्म शुरुआती मार्गदर्शन का माध्यम बन सकता है। ग्रामीण या छोटे शहरों में जहां विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं, वहां एआई आधारित स्क्रीनिंग एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।
फंडिंग और विस्तार की योजना
रिपोर्ट्स के अनुसार स्टार्टअप को शुरुआती चरण में एंजेल निवेश और हेल्थ-टेक इनक्यूबेशन सपोर्ट मिला है। कंपनी का लक्ष्य है कि अगले दो वर्षों में देश के प्रमुख अस्पतालों और क्लीनिकों के साथ साझेदारी की जाए।
इसके अलावा कंपनी टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म के जरिए डॉक्टरों से कनेक्टिविटी बढ़ाने पर भी काम कर रही है, ताकि स्क्रीनिंग रिपोर्ट के बाद तुरंत परामर्श मिल सके।
सामाजिक प्रभाव और चुनौतियां
भारत में ऑटिज्म को लेकर अब भी कई मिथक और भ्रांतियां हैं। एआई ग्नोसिस जैसे स्टार्टअप जागरूकता बढ़ाने में भी भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि डेटा प्राइवेसी, एल्गोरिद्म की पारदर्शिता और गलत सकारात्मक (False Positive) रिपोर्ट की आशंका जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। कंपनी का कहना है कि वह डेटा सुरक्षा मानकों का पालन कर रही है और उपयोगकर्ता की अनुमति के बिना डेटा साझा नहीं किया जाता।
हेल्थ-टेक सेक्टर में एआई का बढ़ता दायरा
एआई अब कैंसर डिटेक्शन, कार्डियक एनालिसिस और रेडियोलॉजी में भी इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआई का प्रवेश एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में एआई और डॉक्टर का संयोजन हेल्थकेयर का नया मॉडल बन सकता है, जहां तकनीक प्रारंभिक स्क्रीनिंग करे और विशेषज्ञ अंतिम निर्णय लें।
एआई ग्नोसिस जैसे स्टार्टअप यह साबित कर रहे हैं कि तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता सुधारने का माध्यम भी बन सकती है। बचपन में ऑटिज्म की पहचान आसान बनाकर यह पहल हजारों परिवारों को समय पर मार्गदर्शन और उपचार का अवसर दे सकती है।
हालांकि अंतिम निदान और उपचार हमेशा विशेषज्ञों की निगरानी में होना चाहिए, लेकिन एआई आधारित स्क्रीनिंग एक महत्वपूर्ण सहायक उपकरण के रूप में उभर रही है।
भारत में हेल्थ-टेक क्रांति के इस दौर में एआई ग्नोसिस जैसी पहल भविष्य की दिशा तय कर सकती है।













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