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डार्लिंग शुरू करो’ और विमान हुआ हाईजैक: खून दिखाकर बची महिला, 245 यात्रियों की Entebbe Hijacking की कहानी

यह किसी आज की विमान अपहरण घटना की खबर नहीं, बल्कि 27 जून 1976 के Air France Flight 139 hijacking और Operation Entebbe की ऐतिहासिक कहानी है। 2026 में इस घटना के 50 साल पूरे होने पर इससे जुड़े नए दस्तावेज और पुराने किरदार फिर चर्चा में आए हैं। अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में यात्रियों की संख्या 245, 246 या 248 तक बताई गई है; इसलिए संख्या में अंतर मिलता है। हाल में जारी दस्तावेजों के अनुसार अंततः 106 बंधक Entebbe में रोके गए थे।

27 जून 1976। एयर फ्रांस का एक विमान इजराइल के तेल अवीव से पेरिस के लिए निकला था। सफर के बीच एथेंस में उसका निर्धारित ठहराव था। आम यात्रियों को अंदाजा भी नहीं था कि एथेंस से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद उनका सफर दुनिया के सबसे चर्चित विमान अपहरण और बंधक संकटों में बदल जाएगा।

विमान था Air France Flight 139। एथेंस से कई नए यात्री इसमें सवार हुए और इन्हीं के बीच चार अपहरणकर्ता भी थे। इनमें दो फिलिस्तीनी और दो जर्मन उग्रवादी शामिल थे। जर्मन अपहरणकर्ताओं में Wilfried Böse और Brigitte Kuhlmann के नाम इतिहास में दर्ज हैं।

फ्लाइट सामान्य तरीके से आगे बढ़ रही थी। यात्रियों में कोई अपने परिवार के पास जा रहा था, कोई छुट्टी मनाकर लौट रहा था तो कोई काम के सिलसिले में यात्रा कर रहा था। कुछ ही देर में विमान के अंदर माहौल पूरी तरह बदल गया।

हथियार निकाले गए और विमान को कब्जे में ले लिया गया।

इस अपहरण की कहानी को लेकर बाद में कई किताबें, डॉक्यूमेंट्री और फिल्में बनीं। इनमें विमान पर कब्जा करने के शुरुआती क्षणों को बेहद नाटकीय अंदाज में दिखाया गया है। इसी घटनाक्रम से लोकप्रिय विवरणों में “Darling, start” जैसी लाइन भी जोड़ी जाती रही है। हालांकि उपलब्ध विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोत इस सटीक संवाद की पुष्टि नहीं करते, इसलिए इसे घटना का प्रमाणित शब्दशः उद्धरण मानना ठीक नहीं होगा।

जो बात निश्चित है, वह कहीं अधिक भयावह थी—एक यात्री विमान हथियारबंद अपहरणकर्ताओं के कब्जे में था और उसमें सवार सैकड़ों लोगों को नहीं मालूम था कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है।

विमान को पेरिस जाने देने के बजाय लीबिया के Benghazi की ओर मोड़ दिया गया। वहां विमान घंटों खड़ा रहा और उसमें ईंधन भरा गया। अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के उस समय के दस्तावेज में भी दर्ज है कि विमान को एथेंस से उड़ान भरने के बाद लीबिया के Benghazi Airport ले जाया गया था।

लेकिन Benghazi में एक ऐसी घटना हुई जिसने आगे चलकर पूरे संकट की तस्वीर समझने में खुफिया एजेंसियों की मदद की।

विमान में Patricia Martell नाम की ब्रिटिश-इजराइली नागरिक मौजूद थीं। वह पेशे से नर्स थीं। उन्हें किसी तरह विमान से बाहर निकलना था।

इसके लिए उन्होंने बेहद जोखिम भरा नाटक किया।

कुछ विवरणों के मुताबिक Patricia ने खुद को घायल कर खून बहाया और ऐसा दिखाया कि उनका गर्भपात हो रहा है। अपहरणकर्ताओं को लगा कि उनकी हालत गंभीर है और उन्हें चिकित्सा सहायता की जरूरत है। आखिरकार उन्हें Benghazi में विमान से उतरने दिया गया। बाद में सामने आया कि वह गर्भवती नहीं थीं और उन्होंने बाहर निकलने के लिए miscarriage का नाटक किया था।

यानी वायरल या लोकप्रिय शीर्षकों में इसे कभी-कभी “पीरियड का खून दिखाकर भागी महिला” कहा जाता है, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय विवरण अधिक सावधानी से बताते हैं कि उन्होंने खुद को काटकर/घायल कर खून बहाया और गर्भपात होने का नाटक किया था। इस अंतर को खबर में स्पष्ट रखना जरूरी है।

विमान से बाहर निकलने के बाद Patricia केवल अपनी जान बचाकर नहीं रुकीं।

वह लंदन पहुंचीं, जहां उनसे ब्रिटिश और इजराइली खुफिया अधिकारियों ने पूछताछ की। उन्होंने विमान में मौजूद अपहरणकर्ताओं की संख्या, उनके हुलिए और हथियारों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। कुछ विवरणों के अनुसार तस्वीरें दिखाए जाने पर उन्होंने अपहरणकर्ताओं की पहचान करने में भी मदद की।

उस समय विमान में फंसे बाकी यात्रियों की मुश्किलें खत्म नहीं हुई थीं।

Benghazi से विमान ने दोबारा उड़ान भरी। इस बार मंजिल थी अफ्रीकी देश Uganda का Entebbe Airport

विमान के Uganda पहुंचने के बाद संकट और गंभीर हो गया। वहां अपहरणकर्ताओं को अतिरिक्त सहयोग मिला और यात्रियों को पुराने एयरपोर्ट टर्मिनल में ले जाया गया। उस समय Uganda पर तानाशाह Idi Amin का शासन था। उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अपहरणकर्ताओं को वहां स्थानीय समर्थन मिला था।

अब विमान का अपहरण एक अंतरराष्ट्रीय बंधक संकट बन चुका था।

यात्रियों को घंटों और फिर दिनों तक अनिश्चितता में रहना पड़ा। किसी को नहीं पता था कि बातचीत सफल होगी या उन्हें मार दिया जाएगा।

अपहरणकर्ताओं ने कैदियों की रिहाई जैसी मांगें रखीं और समयसीमा तय की। दूसरी ओर इजराइल में प्रधानमंत्री Yitzhak Rabin की सरकार के सामने कठिन फैसला था—बातचीत करके मांगें मानें या हजारों किलोमीटर दूर सैन्य अभियान चलाकर बंधकों को छुड़ाने का प्रयास करें।

2026 में सार्वजनिक किए गए पहले गोपनीय दस्तावेजों से पता चलता है कि इजराइली नेतृत्व के भीतर इस मुद्दे पर काफी गंभीर चर्चा हुई थी। शुरुआत में बातचीत के खिलाफ रुख था, लेकिन समय बीतने और बंधकों के परिवारों का दबाव बढ़ने के साथ वार्ता का विकल्प भी गंभीरता से लिया गया। साथ ही सैन्य विकल्प पर तैयारी चलती रही।

इसी संकट के बीच एक और व्यक्ति की कहानी सामने आती है—Michel Cojot-Goldberg

Michel स्वयं विमान के यात्रियों में थे और आगे बंधकों तथा अपहरणकर्ताओं के बीच संपर्क में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी Entebbe से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।

उनके परिवार का संबंध द्वितीय विश्व युद्ध और Holocaust की भयावहता से था। Michel को पता चला था कि उनके पिता Auschwitz में मारे गए थे और दस्तावेजों में Gestapo अधिकारी Klaus Barbie का नाम सामने आया था।

Klaus Barbie को उसके क्रूर इतिहास के कारण “Butcher of Lyon” यानी “लियोन का कसाई” कहा जाता था। 2026 में Michel Cojot पर केंद्रित नई डॉक्यूमेंट्री To Kill a Nazi ने इस कहानी को फिर चर्चा में ला दिया। रिपोर्ट के मुताबिक Cojot ने Barbie को खोजने के लिए दक्षिण अमेरिका तक उसका पीछा किया था।

Michel ने पत्रकार बनकर Klaus Barbie तक पहुंचने की कोशिश की। कहानी यहां लगभग किसी जासूसी फिल्म जैसी हो जाती है।

उन्होंने Barbie को खोज निकाला और कथित तौर पर उसे मारने का अवसर भी उनके सामने आया, लेकिन वह गोली नहीं चला पाए। यह घटना उनके जीवन में लंबे समय तक बनी रही। कुछ समय बाद वही Michel खुद Air France Flight 139 में बैठा था और अचानक अपहरणकर्ताओं के बीच फंस गया।

यानी जिस व्यक्ति ने Nazi युद्ध अपराधी को खोजने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी, अब वह खुद एक अंतरराष्ट्रीय बंधक संकट में था।

The Guardian ने भी Cojot की भूमिका पर लिखा है कि वह अपहरणकर्ताओं और यात्रियों के बीच एक तरह के मध्यस्थ बने और उनके काम ने कई बंधकों की मदद की।

इस बीच Entebbe में हालात लगातार बदल रहे थे।

अपहरणकर्ताओं ने यात्रियों को अलग करना शुरू किया। इजराइली और कुछ यहूदी यात्रियों को दूसरे यात्रियों से अलग रखा गया। बाकी कई गैर-इजराइली यात्रियों को बाद में रिहा कर दिया गया।

इस अलगाव ने Holocaust से बचे कुछ लोगों के लिए पुराने डर को फिर जीवित कर दिया। German hijackers की मौजूदगी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया।

इधर हजारों किलोमीटर दूर इजराइल में एक ऐसा मिशन तैयार हो रहा था, जिसे बाद में दुनिया Operation Entebbe या Operation Thunderbolt के नाम से जानने वाली थी।

समस्या सिर्फ बंधकों तक पहुंचने की नहीं थी।

Entebbe इजराइल से करीब 4,000 किलोमीटर दूर था। कमांडो को इतनी लंबी दूरी तय करके Uganda पहुंचना था, बिना अपहरणकर्ताओं को पहले से खबर लगे एयरपोर्ट पर उतरना था, बंधकों की सही लोकेशन पता करनी थी और बेहद कम समय में ऑपरेशन पूरा करके सभी को वापस निकालना था। इजराइली संसद Knesset के रिकॉर्ड बताते हैं कि सरकार के भीतर इस बात पर भी संदेह था कि इतनी दूर सैन्य कार्रवाई करके सैनिक सुरक्षित लौट भी पाएंगे या नहीं।

3 जुलाई 1976 को इजराइली सरकार के सामने अंतिम सैन्य योजना पेश की गई। कुछ घंटे की चर्चा के बाद सरकार ने ऑपरेशन को मंजूरी दे दी।

फिर शुरू हुई तैयारी।

इजराइली कमांडो C-130 Hercules विमानों से Uganda की ओर निकले। योजना का बड़ा हिस्सा surprise पर निर्भर था।

रात के अंधेरे में विमान Entebbe पहुंचे।

कमांडो के साथ वाहन भी उतारे गए। एक काली Mercedes का इस्तेमाल किया गया, जिसका उद्देश्य Idi Amin के काफिले जैसा भ्रम पैदा करना बताया जाता है। कमांडो टर्मिनल की ओर तेजी से बढ़े।

लेकिन ऑपरेशन पूरी तरह योजना के अनुसार नहीं चला।

सुरक्षा बलों से सामना हुआ और गोलीबारी शुरू हो गई। इसके बाद इजराइली सैनिक टर्मिनल के भीतर पहुंचे, जहां बंधकों को रखा गया था।

कुछ ही मिनटों में पूरा परिसर गोलियों की आवाज से गूंज उठा।

बंधकों को नीचे रहने के लिए कहा गया। अपहरणकर्ताओं को निशाना बनाया गया और यात्रियों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई।

ऑपरेशन बेहद तेज था। हाल में जारी दस्तावेजों पर आधारित AP की रिपोर्ट के अनुसार उस समय Entebbe में 106 बंधक थे और सैन्य कार्रवाई एक घंटे से भी कम चली। अधिकांश बंधकों को सुरक्षित निकाल लिया गया, हालांकि तीन बंधकों और इजराइली कमांडो अधिकारी Yonatan Netanyahu की मौत हुई।

Yonatan Netanyahu ऑपरेशन में शामिल प्रमुख कमांडो अधिकारी थे और भविष्य में इजराइल के प्रधानमंत्री बने Benjamin Netanyahu के बड़े भाई थे।

बाद में इस ऑपरेशन का नाम उनके सम्मान में Operation Jonathan भी रखा गया। इजराइली आधिकारिक अभिलेख इस ऑपरेशन को देश के सैन्य इतिहास के सबसे साहसी अभियानों में गिनते हैं।

लेकिन कहानी यहां भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

एक बुजुर्ग बंधक Dora Bloch ऑपरेशन के समय Entebbe terminal में मौजूद नहीं थीं। तबीयत खराब होने के कारण उन्हें पहले Kampala के अस्पताल ले जाया गया था। इसलिए कमांडो उन्हें साथ नहीं ला पाए। बाद में उनकी हत्या कर दी गई।

यही वजह है कि Operation Entebbe की कहानी को केवल “सफल कमांडो मिशन” कह देना उसके कई मानवीय पहलुओं को पीछे छोड़ देता है। इसमें विमान के भीतर डरे हुए सैकड़ों लोग थे, परिवारों की चिंता थी, कई देशों की कूटनीति थी, बंधकों की मौत हुई और सैन्य कार्रवाई से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद भी थे।

50 साल बाद भी इस कहानी पर नई सामग्री सामने आ रही है।

जून 2026 में इजराइल ने इस ऑपरेशन से जुड़े कई पहले गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए। इनमें Yitzhak Rabin सरकार के भीतर हुई चर्चाओं, बातचीत के विकल्प और सैन्य ऑपरेशन की तैयारियों से जुड़ी जानकारियां सामने आईं। इन दस्तावेजों से यह तस्वीर भी बनती है कि अंतिम सैन्य अभियान अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि कई दिनों तक कूटनीतिक और सैन्य विकल्पों पर विचार हुआ था।

इसी समय Michel Cojot की जिंदगी पर बनी डॉक्यूमेंट्री ने Entebbe के एक कम चर्चित किरदार को दोबारा सामने ला दिया। वह व्यक्ति जिसने अपने पिता की मौत का सच खोजते हुए “Butcher of Lyon” Klaus Barbie तक पहुंचने की कोशिश की थी, कुछ समय बाद खुद एक अपहृत विमान में फंस गया और फिर बंधकों की मदद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वहीं Patricia Martell की कहानी दिखाती है कि संकट के बीच एक व्यक्ति की सूझबूझ कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। उनका miscarriage का नाटक सिर्फ विमान से बाहर निकलने का तरीका नहीं बना; बाहर आने के बाद उनके द्वारा दी गई जानकारी खुफिया एजेंसियों तक पहुंची।

27 जून से 4 जुलाई 1976 तक चले इस संकट ने दुनिया को कई ऐसी तस्वीरें दीं जिन्हें दशकों बाद भी याद किया जाता है—एक अपहृत Airbus, हजारों किलोमीटर दूर Entebbe का पुराना terminal, हथियारबंद अपहरणकर्ता, डरे हुए यात्री, Uganda का Idi Amin शासन और रात के अंधेरे में पहुंचे कमांडो।

और इन सबके बीच कई छोटी-बड़ी व्यक्तिगत कहानियां थीं।

किसी ने गंभीर बीमारी का नाटक कर विमान से निकलने का रास्ता बनाया। किसी ने बंधकों और अपहरणकर्ताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। किसी ने हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सैन्य योजना तैयार की और किसी ने बंधकों को निकालते समय अपनी जान गंवा दी।

इसी कारण करीब आधी सदी बाद भी Air France Flight 139 और Operation Entebbe की कहानी केवल इतिहास की किताबों में बंद घटना नहीं है। 2026 में जारी दस्तावेजों और नई डॉक्यूमेंट्री ने एक बार फिर दिखाया है कि उस एक सप्ताह के भीतर कितनी अलग-अलग मानवीय और राजनीतिक कहानियां छिपी हुई थीं।


ऑपरेशन गंगा पार्ट-1: जब कश्मीरी आतंकियों ने भारतीय विमान हाईजैक कर पाकिस्तान में जला दिया

http://Air France Flight 139 Hijacking and Operation Entebbe 1976

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