दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में पीएचडी एडमिशन को लेकर विवाद सामने आया है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग ने छात्रों के विरोध और चयन प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच पीएचडी इंटरव्यू का नोटिफिकेशन वापस ले लिया है। वहीं, जेएनयू में छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने 2026-27 के पीएचडी एडमिशन प्रॉस्पेक्टस में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए आरक्षित सीटों के आवंटन में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाया है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में विवाद की मुख्य वजह इंटरव्यू का शेड्यूल बहुत कम समय पहले जारी होना और सीमित संख्या में उम्मीदवारों को बुलाया जाना है। हिंदी विभाग ने 27 अक्टूबर की शाम को नोटिस जारी किया था, जिसमें अगले दिन यानी 28 अक्टूबर की सुबह 9:15 बजे उम्मीदवारों को रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था। विरोध के बाद 28, 29, 30 और 31 अक्टूबर तथा 2 नवंबर को होने वाले इंटरव्यू अगले आदेश तक वापस ले लिए गए। विश्वविद्यालय ने अभी नई तारीखों की घोषणा नहीं की है।
दूसरी ओर, जेएनयू में SFI का दावा है कि विश्वविद्यालय ने आरक्षण के नियमों के हिसाब से पर्याप्त सीटें नहीं दिखाई हैं। संगठन ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) में शिकायत से जुड़ी कार्रवाई का हवाला देते हुए सीटों के आवंटन में सुधार की मांग की है। संगठन के अनुसार, कुल 711 नियमित पीएचडी सीटों के मुकाबले ST, SC और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए घोषित सीटों में अंतर है।
दोनों विश्वविद्यालयों के मामले अलग-अलग हैं। DU में तत्काल विवाद इंटरव्यू के नोटिस, उम्मीदवारों को मिलने वाले अवसर और शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया को लेकर है। JNU में आरोप मुख्य रूप से आरक्षण के अनुपालन और सीटों के वितरण से जुड़े हैं। दोनों मामलों में छात्रों ने पारदर्शिता और निष्पक्ष चयन की मांग की है, लेकिन आरोपों को अंतिम रूप से साबित मानने से पहले विश्वविद्यालयों के स्पष्टीकरण और संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों को देखना जरूरी है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी ने हिंदी PhD इंटरव्यू का नोटिफिकेशन वापस लिया
दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग ने पीएचडी एडमिशन के लिए जारी इंटरव्यू शेड्यूल वापस ले लिया है। विभाग ने 27 अक्टूबर 2026 की शाम को नोटिस जारी किया था। इसके अनुसार, चयन प्रक्रिया के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को 28 अक्टूबर की सुबह 9:15 बजे रिपोर्ट करना था।
छात्रों ने इस समय-सारणी पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि नोटिस जारी होने और इंटरव्यू के बीच बहुत कम समय दिया गया था। दिल्ली से बाहर रहने वाले उम्मीदवारों के लिए इतनी जल्दी यात्रा की व्यवस्था करना और इंटरव्यू की तैयारी करना मुश्किल हो सकता था। विरोध के बाद निर्धारित इंटरव्यू अगले आदेश तक रद्द कर दिए गए।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हिंदी विभाग ने 28, 29, 30 और 31 अक्टूबर तथा 2 नवंबर को होने वाले इंटरव्यू का शेड्यूल वापस लिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पीएचडी एडमिशन की पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी गई है। फिलहाल इंटरव्यू की प्रक्रिया रोक दी गई है और नई तारीखों का इंतजार किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय ने नोटिफिकेशन वापस लेने के कारणों पर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इंटरव्यू केवल किसी एक संगठन के दबाव में रद्द किए गए। उपलब्ध रिपोर्टों से इतना स्पष्ट है कि छात्रों की आपत्तियों और विरोध के बीच इंटरव्यू शेड्यूल वापस लिया गया।
अभ्यर्थियों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे हिंदी विभाग और दिल्ली यूनिवर्सिटी की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी होने वाले नए नोटिस पर नजर रखें। जब तक संशोधित शेड्यूल जारी नहीं होता, तब तक पुरानी तारीखों के आधार पर यात्रा या अन्य व्यवस्था करना उचित नहीं होगा।
एक रात पहले नोटिस, अगली सुबह इंटरव्यू पर विवाद
DU के हिंदी विभाग के नोटिस को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी आपत्ति समय को लेकर थी। 27 अक्टूबर की शाम को जारी सूचना में उम्मीदवारों को अगले दिन सुबह रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था। इस कारण अभ्यर्थियों को तैयारी और यात्रा के लिए बहुत कम समय मिल पाया।
पीएचडी एडमिशन में इंटरव्यू एक महत्वपूर्ण चरण हो सकता है। उम्मीदवारों को अपने शोध विषय, प्रस्तावित शोध कार्य, अकादमिक पृष्ठभूमि और संबंधित विषय की समझ के बारे में सवालों के जवाब देने पड़ सकते हैं। कई उम्मीदवारों के लिए यह प्रक्रिया उनके भविष्य के शोध और करियर से जुड़ी होती है।
यदि इंटरव्यू की सूचना बहुत कम समय पहले दी जाए, तो दूसरे शहरों या राज्यों में रहने वाले उम्मीदवारों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं। टिकट, ठहरने की व्यवस्था, यात्रा का समय और दस्तावेजों की तैयारी जैसे काम अचानक करना आसान नहीं होता। इसी आधार पर छात्रों ने अधिक समय देने और चयन प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से चलाने की मांग की।
हालांकि, इंटरव्यू के लिए पर्याप्त समय कितना होना चाहिए और उम्मीदवारों को किस आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जाना चाहिए, इन सवालों का जवाब विश्वविद्यालय के नियमों, संबंधित विभाग की प्रक्रिया और आधिकारिक एडमिशन दिशा-निर्देशों के संदर्भ में देखना होगा।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के मामले में अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नए नोटिस में केवल तारीखें बदली जाएंगी या शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की संख्या और चयन प्रक्रिया में भी कोई संशोधन होगा। विश्वविद्यालय की ओर से नई जानकारी आने पर ही इसका पता चलेगा।
150 से अधिक सीटों के बावजूद सीमित उम्मीदवारों को बुलाने का आरोप
छात्रों ने हिंदी विभाग में पीएचडी की 150 से अधिक सीटें उपलब्ध होने के बावजूद इंटरव्यू के लिए सीमित संख्या में उम्मीदवारों को बुलाए जाने पर भी सवाल उठाए। ABVP और दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) से जुड़े प्रतिनिधियों ने मांग की कि सभी पात्र आवेदकों को चयन प्रक्रिया में उचित अवसर मिलना चाहिए।
कुछ उम्मीदवारों और छात्र संगठनों ने यह भी कहा कि UGC-NET और ‘Only for PhD’ श्रेणी के आवेदकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि चयन प्रक्रिया के नियम और शॉर्टलिस्टिंग के आधार स्पष्ट होने चाहिए, ताकि अभ्यर्थियों को पता चल सके कि उन्हें इंटरव्यू के लिए क्यों बुलाया गया या क्यों नहीं बुलाया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी विभाग में कुल सीटों की संख्या और इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या हमेशा एक जैसी नहीं होती। विश्वविद्यालय अपने लागू नियमों के अनुसार पात्रता, उपलब्ध सीटों, विषयवार जरूरतों और चयन प्रक्रिया के आधार पर उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट कर सकते हैं। लेकिन यदि शॉर्टलिस्टिंग को लेकर सवाल उठते हैं, तो स्पष्ट मानदंड और पारदर्शी जानकारी विवाद को दूर करने में मदद कर सकती है।
फिलहाल DU ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि संशोधित नोटिस में अधिक उम्मीदवारों को बुलाया जाएगा या नहीं। यह भी तय नहीं है कि सभी आवेदकों को इंटरव्यू में शामिल होने का अवसर मिलेगा। इसलिए इसे छात्रों की मांग के रूप में रिपोर्ट करना सही है, न कि विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकार किया गया फैसला मानना।
नई इंटरव्यू तारीखों का इंतजार कर रहे उम्मीदवार
इंटरव्यू नोटिफिकेशन वापस लिए जाने के बाद उम्मीदवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल नई तारीखों को लेकर है। अभी तक उपलब्ध रिपोर्टों में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने कोई नया शेड्यूल घोषित नहीं किया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि नया नोटिस कब जारी होगा।
पीएचडी में प्रवेश लेने वाले उम्मीदवारों के लिए समय पर जानकारी मिलना महत्वपूर्ण है। कई अभ्यर्थी नौकरी, दूसरे पाठ्यक्रम या अपने शहर से बाहर रहने की परिस्थितियों के साथ आवेदन करते हैं। अचानक तारीख बदलने से उन्हें अपनी योजनाओं में बदलाव करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में उम्मीदवारों को आधिकारिक वेबसाइट पर नियमित रूप से सूचना देखनी चाहिए और किसी अपुष्ट सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। नया नोटिस आने पर उसमें दी गई रिपोर्टिंग तारीख, समय, जरूरी दस्तावेज, विभाग का स्थान और अन्य निर्देश ध्यान से पढ़ना चाहिए।
यदि शॉर्टलिस्टिंग या पात्रता को लेकर कोई आपत्ति है, तो उम्मीदवारों को विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार विभाग या संबंधित प्रवेश कार्यालय से जानकारी लेने की कोशिश करनी चाहिए। आधिकारिक स्पष्टीकरण और दस्तावेज किसी भी अफवाह से अधिक विश्वसनीय आधार होते हैं।
JNU में PhD एडमिशन के आरक्षण पर विवाद
दिल्ली यूनिवर्सिटी के मामले के बीच जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में भी पीएचडी एडमिशन को लेकर विवाद सामने आया है। छात्र संगठन SFI ने आरोप लगाया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जारी पीएचडी प्रॉस्पेक्टस में SC, ST और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए आरक्षित सीटें निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं दिखाई गई हैं।
SFI ने 28 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह मुद्दा उठाया। संगठन के नेताओं ने विश्वविद्यालय से आरक्षण के नियमों के अनुपालन की समीक्षा करने और सीटों के आवंटन में कथित कमियों को सुधारने की मांग की। संगठन ने यह भी कहा कि प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए श्रेणीवार और केंद्रवार सीटों का स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए।
यह आरोप JNU के पीएचडी एडमिशन प्रॉस्पेक्टस और उसमें दिखाई गई सीटों के वितरण से संबंधित है। अभी इसे छात्र संगठन का दावा समझना जरूरी है। विश्वविद्यालय की ओर से इस विषय पर पूरा स्पष्टीकरण और संबंधित आधिकारिक आंकड़े सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि सीटों के आवंटन में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
आरक्षण नीति का उद्देश्य पात्र उम्मीदवारों को निर्धारित नियमों के अनुसार अवसर उपलब्ध कराना है। इसलिए किसी भी विश्वविद्यालय के लिए यह महत्वपूर्ण होता है कि वह अपने प्रवेश प्रॉस्पेक्टस में लागू नियमों और सीटों के वितरण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करे। यदि किसी संगठन को विसंगति दिखाई देती है, तो संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर उसका समाधान किया जाना चाहिए।
SFI का दावा: 711 सीटों में ST उम्मीदवारों के लिए 38 सीटें
SFI के अनुसार, JNU ने UGC-NET, UGC-NET-JRF और GATE के तीन प्रवेश माध्यमों के तहत कुल 711 नियमित पीएचडी सीटें घोषित की हैं। संगठन का दावा है कि ST उम्मीदवारों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से लगभग 53 सीटें होनी चाहिए थीं, जबकि प्रॉस्पेक्टस में 38 सीटें दिखाई गई हैं।
इस हिसाब से संगठन लगभग 15 सीटों की कमी का आरोप लगा रहा है। SFI ने SC उम्मीदवारों के लिए भी अंतर का दावा किया है। संगठन के अनुसार, 15 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से करीब 107 सीटें होनी चाहिए थीं, जबकि प्रॉस्पेक्टस में 103 सीटें दिखाई गई हैं।
दिव्यांग उम्मीदवारों यानी बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों (PwBD) के लिए भी संगठन ने सवाल उठाए हैं। SFI का दावा है कि उपलब्ध 711 सीटों के आधार पर लगभग 36 सीटें होनी चाहिए थीं, जबकि प्रॉस्पेक्टस में 17 सीटें दिखाई गई हैं।
इन आंकड़ों को विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकार की गई गड़बड़ी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। ये SFI द्वारा प्रॉस्पेक्टस के अपने विश्लेषण के आधार पर लगाए गए आरोप हैं। सीटों की वास्तविक संख्या और आरक्षण नियमों के अनुपालन की जांच के लिए लागू नियमों, केंद्रवार सीटों, विषयवार उपलब्धता और विश्वविद्यालय के आधिकारिक जवाब को साथ में देखना जरूरी है।
SFI ने मांग की है कि विश्वविद्यालय सीटों के आवंटन की समीक्षा करे और कथित कमियों को दूर करे। संगठन का कहना है कि दाखिले की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले इस विषय पर स्पष्टता आनी चाहिए।
‘माइक्रो-यूनिट’ तरीके पर उठे सवाल
SFI ने JNU में सीट आवंटन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे तरीके को भी विवाद की वजह बताया है। संगठन के अनुसार, विश्वविद्यालय में आरक्षण की गणना अलग-अलग केंद्रों और उप-विषयों के स्तर पर की जाती है। SFI ने इसे ‘माइक्रो-यूनिट’ पद्धति बताते हुए कहा कि छोटे केंद्रों में सीटों की संख्या कम होने के कारण कुछ श्रेणियों के लिए कोई सीट दिखाई नहीं देती।
विश्वविद्यालयों में पीएचडी सीटें अक्सर अलग-अलग विभागों, केंद्रों और शोध क्षेत्रों में बांटी जाती हैं। हर केंद्र में उपलब्ध सीटों की संख्या एक जैसी नहीं होती। किसी केंद्र में कई सीटें हो सकती हैं, जबकि किसी दूसरे केंद्र में बहुत कम सीटें उपलब्ध हो सकती हैं। इसी कारण आरक्षण की गणना किस स्तर पर की जाती है, यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक सवाल बन जाता है।
SFI का दावा है कि जब सीटों को UGC-NET, UGC-NET-JRF और GATE जैसे अलग-अलग प्रवेश माध्यमों में बांटा जाता है, तो कुछ केंद्रों में SC और ST उम्मीदवारों के लिए सीटें शून्य हो जाती हैं। संगठन ने दावा किया कि मौजूदा प्रवेश चक्र में 29 केंद्र ऐसे हैं, जहां SC और ST दोनों श्रेणियों के लिए कोई सीट नहीं दिखाई गई।
यह आंकड़ा भी SFI के दावे के रूप में ही समझा जाना चाहिए। यह निर्धारित करने के लिए कि आरक्षण नियमों का सही पालन हुआ है या नहीं, विश्वविद्यालय के वास्तविक सीट आवंटन रिकॉर्ड और संबंधित कानूनी प्रावधानों की समीक्षा आवश्यक होगी।
इस विवाद का समाधान केवल कुल सीटों की संख्या गिनने से नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि लागू नियम किस स्तर पर आरक्षण की गणना की मांग करते हैं, अलग-अलग केंद्रों की सीटों का वितरण कैसे किया गया और क्या किसी श्रेणी के पात्र उम्मीदवारों को निर्धारित अवसर मिला।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने JNU से जवाब मांगा
SFI ने दावा किया कि उसकी शिकायत पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने कार्रवाई की है। संगठन के मुताबिक, 29 सितंबर 2026 को शिकायत दर्ज कराई गई थी और आयोग ने 8 अक्टूबर को JNU के रजिस्ट्रार को नोटिस भेजकर संबंधित जानकारी तथा उठाए गए कदमों का विवरण मांगा था।
SFI का आरोप है कि विश्वविद्यालय ने 23 अक्टूबर तक जवाब नहीं दिया। इसके बाद 27 अक्टूबर को आयोग ने सात दिन के भीतर जवाब देने या जरूरी कार्रवाई करने के लिए नया निर्देश जारी किया। संगठन ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने मामले का संज्ञान लिया है।
आयोग की ओर से जवाब मांगा जाना शिकायत पर विचार करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि विश्वविद्यालय के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप प्रमाणित हो गए हैं। आयोग संबंधित पक्ष से जानकारी लेकर तथ्यों की जांच कर सकता है और फिर अपनी प्रक्रिया के अनुसार आगे कदम उठा सकता है।
इस मामले में अब JNU के जवाब और संबंधित आयोगों की आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। यदि विश्वविद्यालय सीट आवंटन के बारे में विस्तृत आंकड़े और नियमों का आधार सामने रखता है, तो विवाद की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।
SFI ने मांग की है कि कथित आरक्षण विसंगतियों को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय तत्काल कदम उठाए। संगठन ने सीटों की श्रेणीवार जानकारी सार्वजनिक करने और पहले के वर्षों में खाली रह गई आरक्षित सीटों के बारे में भी पारदर्शिता की मांग की है।
खाली आरक्षित सीटों और RTI के जवाब पर भी सवाल
JNU में विवाद सिर्फ 2026-27 के प्रॉस्पेक्टस तक सीमित नहीं है। SFI ने पिछले प्रवेश चक्रों में खाली रह गई आरक्षित सीटों और उनके बाद की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि यह जानना जरूरी है कि ऐसी सीटें खाली क्यों रहीं, क्या उन्हें नियमों के अनुसार भरा गया और क्या किसी स्थिति में उनका डी-रिजर्वेशन किया गया।
डी-रिजर्वेशन का अर्थ कुछ परिस्थितियों में किसी आरक्षित श्रेणी की खाली सीट को निर्धारित नियमों के तहत दूसरी श्रेणी के लिए उपलब्ध कराना हो सकता है। यह प्रक्रिया नियमों और संबंधित प्रावधानों के अधीन होती है। इसलिए किसी सीट के खाली रहने या उसका बाद में उपयोग किए जाने का मूल्यांकन संबंधित रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
SFI के मुताबिक, संगठन ने 23 सितंबर को सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन देकर 2025-26 के पीएचडी एडमिशन से संबंधित जानकारी मांगी थी। संगठन का दावा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने मांगी गई जानकारी को ‘वॉल्यूमिनस’ यानी बहुत अधिक बताया था।
RTI के जरिए मांगी गई जानकारी और उसके जवाब की वास्तविक भाषा को संबंधित दस्तावेज देखकर ही पूरी तरह समझा जा सकता है। केवल संगठन के बयान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विश्वविद्यालय ने जानबूझकर जानकारी छिपाई। हालांकि, प्रवेश और आरक्षण से जुड़े आंकड़ों की उपलब्धता पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
छात्र संगठन ने मांग की है कि विश्वविद्यालय आरक्षित सीटों की स्थिति, खाली पदों और पिछले प्रवेश चक्रों के रिकॉर्ड के बारे में स्पष्ट जानकारी दे। इससे उम्मीदवारों और अन्य हितधारकों को नियमों के अनुपालन का मूल्यांकन करने में मदद मिल सकती है।
DU और JNU के विवाद में क्या अंतर है?
दोनों विश्वविद्यालयों में पीएचडी एडमिशन को लेकर विवाद सामने आया है, लेकिन दोनों के मुद्दे अलग हैं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में विवाद मुख्य रूप से इंटरव्यू नोटिस के कम समय पहले जारी होने, उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्टिंग और सभी पात्र आवेदकों को उचित अवसर मिलने से जुड़ा है। विरोध के बाद इंटरव्यू शेड्यूल वापस ले लिया गया है, लेकिन नई तारीखों और संशोधित चयन प्रक्रिया की घोषणा अभी बाकी है।
JNU में SFI ने आरक्षण की गणना और SC, ST तथा PwBD उम्मीदवारों के लिए सीटों की संख्या पर सवाल उठाए हैं। संगठन ने आयोगों की कार्रवाई का हवाला देते हुए सीट आवंटन की समीक्षा और कथित कमियों को दूर करने की मांग की है। इन आरोपों की अंतिम स्थिति विश्वविद्यालय के जवाब और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा के बाद ही स्पष्ट होगी।
दोनों मामलों में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। उम्मीदवारों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि चयन के लिए कौन-से नियम लागू हैं, इंटरव्यू का शेड्यूल कब और कैसे जारी होगा, शॉर्टलिस्टिंग का आधार क्या है और आरक्षण की गणना किस तरह की गई है।
लेकिन दोनों घटनाओं को एक ही प्रकार की गड़बड़ी मानना उचित नहीं होगा। DU में इंटरव्यू का नोटिस वापस लिया गया है, जबकि JNU में आरक्षण से जुड़े आरोपों पर विवाद और शिकायत प्रक्रिया जारी है। इन अंतर को समझना जरूरी है, ताकि खबर पढ़ने वाले सही स्थिति जान सकें।
PhD उम्मीदवारों को अब क्या करना चाहिए?
DU और JNU में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को फिलहाल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करना चाहिए। DU के हिंदी विभाग के उम्मीदवारों को नए इंटरव्यू शेड्यूल का इंतजार करना चाहिए। किसी भी नई तारीख के जारी होने पर रिपोर्टिंग समय, स्थान, आवश्यक दस्तावेज और अन्य निर्देशों की पुष्टि कर लेनी चाहिए।
जिन उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्टिंग को लेकर सवाल हैं, वे विश्वविद्यालय की घोषित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित विभाग या प्रवेश कार्यालय से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें अपने आवेदन का विवरण, पात्रता से जुड़े दस्तावेज और संबंधित नोटिस संभालकर रखने चाहिए।
DU Hindu College Admission Row: तय सीटों से ज्यादा एडमिशन पर विवाद, Teachers ने मांगा DU Takeover

