1990 का दशक भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए उथल-पुथल का समय था। देश में मारुति जैसी कंपनियां छोटी, किफायती और भरोसेमंद कारों के दम पर बाजार पर कब्जा कर रही थीं। ऐसे दौर में महिंद्रा एंड महिंद्रा को कार बाजार से बाहर होने की सलाह तक मिल गई थी। कहा गया कि यह कंपनी ट्रैक्टर, यूटिलिटी व्हीकल और जीप तक ही सीमित रहे तो बेहतर होगा। लेकिन समय ने साबित किया कि यह सलाह इतिहास की सबसे बड़ी गलत भविष्यवाणियों में से एक थी।
महिंद्रा ने न सिर्फ उस दौर की चुनौतियों का सामना किया, बल्कि आज वह देश की शीर्ष ऑटोमोबाइल कंपनियों में गिनी जाती है। यह कहानी सिर्फ गाड़ियों की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य और लगातार खुद को बदलते रहने की जिद की कहानी है।
90 के दशक में महिंद्रा की सबसे बड़ी पहचान मजबूत लेकिन भारी-भरकम यूटिलिटी व्हीकल्स की थी। शहरों में लोग हल्की, कम ईंधन खपत वाली और आरामदायक कारें चाहते थे। महिंद्रा की गाड़ियां गांवों, पुलिस और सरकारी विभागों तक तो चल रही थीं, लेकिन निजी ग्राहकों के बीच उनकी पकड़ कमजोर होती जा रही थी। यही वजह थी कि कई विशेषज्ञों ने कंपनी को कार सेगमेंट छोड़ने की सलाह दे डाली।
उस समय महिंद्रा के सामने चार बड़ी समस्याएं थीं। पहली, ब्रांड इमेज। लोग महिंद्रा को ट्रैक्टर और जीप बनाने वाली कंपनी के रूप में जानते थे, न कि फैमिली कार निर्माता के रूप में। दूसरी, तकनीक की कमी। उस दौर में महिंद्रा के पास अपना मजबूत कार इंजन प्लेटफॉर्म नहीं था। तीसरी, विदेशी कंपनियों के साथ असफल साझेदारी। फोर्ड के साथ की गई साझेदारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। चौथी, डीजल पर अत्यधिक निर्भरता, जबकि पेट्रोल कारों की मांग तेजी से बढ़ रही थी।
इन चुनौतियों के बीच 1997 से 2002 का समय महिंद्रा के लिए सबसे कठिन माना जाता है। इस दौर में कंपनी के पास कोई बड़ा हिट मॉडल नहीं था। बाजार में चर्चा होने लगी थी कि अगर हालात नहीं बदले तो महिंद्रा कार सेगमेंट से बाहर हो सकती है।
लेकिन यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया। महिंद्रा ने तय किया कि वह सलाह मानकर पीछे हटने के बजाय अपनी ताकत पहचानेगी और उसी पर फोकस करेगी। कंपनी ने यह समझा कि उसकी असली ताकत मजबूत बॉडी, खराब सड़कों पर चलने की क्षमता और भरोसेमंद इंजीनियरिंग है।
2002 में स्कॉर्पियो की लॉन्चिंग इसी सोच का नतीजा थी। यह एक ऐसा मॉडल था जिसने भारतीय एसयूवी बाजार की परिभाषा ही बदल दी। स्कॉर्पियो ने साबित किया कि महिंद्रा सिर्फ ट्रैक्टर या जीप ही नहीं, बल्कि स्टाइलिश और पावरफुल कार भी बना सकती है। यह गाड़ी कंपनी के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
इसके बाद महिंद्रा ने एक के बाद एक नए कीर्तिमान बनाए। बोलेरो ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजार में जबरदस्त पकड़ बनाई। एक्सयूवी सीरीज ने शहरी ग्राहकों को आकर्षित किया। कंपनी ने यह भी सीखा कि सिर्फ गाड़ी बनाना काफी नहीं, बल्कि सेफ्टी, फीचर्स और ड्राइविंग एक्सपीरियंस भी उतने ही जरूरी हैं।
आज हालात यह हैं कि महिंद्रा 100 से ज्यादा देशों में कारोबार कर रही है। भारत में 2025 तक कंपनी ने करीब 4.76 लाख वाहन बेचे। दुनिया भर में करीब 3.24 लाख कर्मचारी महिंद्रा समूह के साथ काम कर रहे हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर में महिंद्रा का मार्केट कैप कई लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
महिंद्रा की सफलता का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि कंपनी ने समय रहते इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की दिशा में कदम बढ़ा दिया। आज इलेक्ट्रिक कारों के मामले में भी महिंद्रा देश की टॉप-3 कंपनियों में शामिल है। यह वही कंपनी है, जिसे कभी कहा गया था कि वह कार बाजार में टिक नहीं पाएगी।
महिंद्रा एंड महिंद्रा की शुरुआत भी संघर्षों से भरी रही। 1945 में दो भाइयों ने दोस्त के साथ मिलकर इसकी नींव रखी। शुरुआत में कंपनी का नाम ‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ था, जिसे बाद में बदला गया। आजादी के बाद भारत में विलीज जीप के असेंबली से कंपनी ने ऑटोमोबाइल सफर शुरू किया। 1949 में भारत में पहली जीप की असेंबली इसी कंपनी ने की थी।
समय के साथ महिंद्रा ने खुद को बार-बार बदला। जहां जरूरत पड़ी, वहां तकनीक अपनाई, जहां बाजार बदला, वहां रणनीति बदली। कंपनी ने यह कभी नहीं छोड़ा कि उसकी पहचान मजबूत और भरोसेमंद गाड़ियों की है।
महिंद्रा की कहानी यह सिखाती है कि असफलता या आलोचना अंत नहीं होती। 90 के दशक में कार बाजार से बाहर होने की सलाह मिलने के बावजूद महिंद्रा ने हार नहीं मानी। उसने अपनी कमजोरियों को पहचाना, लेकिन अपनी ताकत को कभी नहीं छोड़ा।
आज जब भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की बात होती है, तो महिंद्रा का नाम गर्व से लिया जाता है। यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग की आत्मनिर्भर सोच का प्रतीक है। जो कंपनी कभी बाजार से बाहर होने की कगार पर थी, वही आज देश की शिखर ऑटो कंपनियों में खड़ी है।
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