भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर सीमा विवाद चर्चा में आ गया है। नेपाल सरकार ने हाल ही में बयान जारी करते हुए कहा है कि भारतीय यात्री Lipulekh Pass के रास्ते मानसरोवर यात्रा के लिए न जाएं, क्योंकि यह क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब हर साल हजारों श्रद्धालु Kailash Mansarovar की यात्रा के लिए इसी मार्ग का उपयोग करते हैं।
नेपाल का कहना है कि लिपुलेख पास उसके क्षेत्र में आता है और इस पर उसका अधिकार है। हालांकि भारत इस क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है और यहां से यात्रा की अनुमति देता रहा है।
यह विवाद नया नहीं है। Nepal पहले भी इस इलाके पर दावा करता रहा है, खासतौर पर तब जब भारत ने इस मार्ग से जुड़ी सड़क परियोजनाओं को विकसित किया था।
वहीं India का कहना है कि लिपुलेख क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा है और यहां उसकी प्रशासनिक पकड़ मजबूत है।
लिपुलेख पास सामरिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह न केवल भारत-नेपाल-चीन के त्रिकोणीय क्षेत्र के पास स्थित है, बल्कि कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख मार्ग भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं, हालांकि भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक रूप से मजबूत संबंध रहे हैं।
यह मामला केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक और राजनीतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं।
नेपाल ने पहले भी अपने नए नक्शे में इस क्षेत्र को शामिल किया था, जिससे विवाद और बढ़ गया था।
भारत ने उस समय इस पर आपत्ति जताई थी और इसे अस्वीकार किया था।
कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
हर साल हजारों लोग इस यात्रा के लिए जाते हैं, और लिपुलेख मार्ग को अपेक्षाकृत आसान रास्ता माना जाता है।
इस बयान के बाद यात्रियों में असमंजस की स्थिति बन सकती है।
हालांकि अभी तक भारत सरकार की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाना जरूरी होता है।
भारत और नेपाल दोनों पड़ोसी देश हैं और उनके बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक संबंध काफी गहरे हैं।
कुल मिलाकर यह मामला आने वाले समय में और चर्चा का विषय बन सकता है, खासतौर पर जब मानसरोवर यात्रा का सीजन नजदीक आता है।
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