भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध, जासूसी और परमाणु हथियारों की होड़ से जुड़ी कई कहानियां सामने आ चुकी हैं, लेकिन ऑपरेशन कहूटा की कहानी इनमें सबसे रहस्यमय घटनाओं में गिनी जाती है। इस कहानी के केंद्र में थे अब्दुल कदीर खान, जिनका जन्म भोपाल में हुआ था और जो बाद में पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे चर्चित चेहरा बने।
पाकिस्तान में अब्दुल कदीर खान को लंबे समय तक राष्ट्रीय नायक की तरह देखा गया, लेकिन पश्चिमी देशों में उनका नाम परमाणु तकनीक की चोरी और परमाणु प्रसार से जुड़े विवादों के कारण चर्चा में रहा। उनके यूरोप में काम करने, यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी संवेदनशील तकनीकी जानकारी तक पहुंच और फिर पाकिस्तान लौटने की कहानी किसी जासूसी फिल्म जैसी लगती है।
इस कहानी का भारतीय पक्ष भी कम रोमांचक नहीं है। सार्वजनिक रिपोर्टों और बाद के विवरणों में दावा किया गया कि भारतीय खुफिया एजेंटों ने पाकिस्तान के कहूटा क्षेत्र में वैज्ञानिकों और कर्मचारियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली नाई की दुकानों से कटे हुए बालों के नमूने हासिल किए। कथित तौर पर इन नमूनों की जांच से यूरेनियम से जुड़े संकेत मिले और भारत की आशंका मजबूत हुई कि पाकिस्तान तेजी से परमाणु क्षमता विकसित कर रहा है।
हालांकि ऑपरेशन कहूटा से जुड़ी कई कहानियां खुफिया अभियानों के बाद सामने आए विवरणों और पुस्तकों पर आधारित हैं। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को पढ़ते समय प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों और बाद में सामने आए खुफिया दावों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
कहानी की शुरुआत 1 अप्रैल 1936 से होती है। अब्दुल कदीर खान का जन्म भोपाल में हुआ था। उस समय भारत का विभाजन नहीं हुआ था। विभाजन के कुछ वर्षों बाद, 1952 में वह पाकिस्तान चले गए।
पाकिस्तान में शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद खान उच्च शिक्षा के लिए यूरोप पहुंचे। उन्होंने जर्मनी, नीदरलैंड और बेल्जियम में पढ़ाई की। उनकी विशेषज्ञता metallurgy और materials science से जुड़ी थी।
यूरोप में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें एक ऐसी संस्था से जुड़ने का अवसर मिला, जिसका काम यूरेनियम संवर्धन तकनीक से संबंधित था। यही मोड़ आगे चलकर दक्षिण एशिया के परमाणु इतिहास को प्रभावित करने वाला साबित हुआ।
1970 के दशक की शुरुआत में खान नीदरलैंड में FDO नाम की कंपनी से जुड़े। यह कंपनी URENCO से जुड़े काम करती थी। URENCO यूरोपीय देशों से जुड़ा एक uranium enrichment consortium था।
यहां गैस सेंट्रीफ्यूज तकनीक पर काम होता था। सरल भाषा में समझें तो प्राकृतिक यूरेनियम को परमाणु ऊर्जा या हथियार कार्यक्रम के लिए उपयोगी स्तर तक समृद्ध करने के लिए जटिल प्रक्रिया की जरूरत होती है। Gas centrifuge इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्सा है।
अब्दुल कदीर खान को अपने काम के दौरान centrifuge technology से जुड़ी तकनीकी सामग्री तक पहुंच मिली। बाद में उन पर आरोप लगे कि उन्होंने संवेदनशील डिजाइन और तकनीकी जानकारी हासिल की और इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में किया।
यह समझना जरूरी है कि वह किसी तैयार परमाणु बम को चुराकर पाकिस्तान नहीं ले गए थे। विवाद मुख्य रूप से centrifuge designs, uranium enrichment know-how और यूरोपीय suppliers के नेटवर्क से जुड़ी जानकारी को लेकर था।
इस बीच 18 मई 1974 को भारत ने राजस्थान के पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण को Smiling Buddha के नाम से जाना गया। भारत के इस कदम ने पाकिस्तान की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया और उसके परमाणु कार्यक्रम को तेज करने की राजनीतिक इच्छा मजबूत हुई।
रिपोर्टों के अनुसार अब्दुल कदीर खान ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से संपर्क किया और अपनी विशेषज्ञता की पेशकश की।
इसके बाद घटनाएं तेजी से आगे बढ़ीं। यूरोप में खान की गतिविधियों पर संदेह बढ़ने लगा। 1975 में उन्हें कम संवेदनशील काम की ओर स्थानांतरित किया गया और उसी वर्ष के अंत में वह अपनी पत्नी और बेटियों के साथ पाकिस्तान लौट गए।
लोकप्रिय कहानियों में इसे अक्सर “रातों-रात भागकर पाकिस्तान पहुंचना” कहा जाता है, लेकिन ऐतिहासिक घटनाक्रम अधिक जटिल था। वह परिवार के साथ पाकिस्तान लौटे और इसके बाद वहां के uranium enrichment program में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।
पाकिस्तान के सामने उस समय एक बड़ी चुनौती थी। राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद थी, लेकिन परमाणु कार्यक्रम के लिए केवल वैज्ञानिक जानकारी पर्याप्त नहीं थी। Precision engineering, specialized materials, vacuum systems, frequency converters और हजारों components की जरूरत थी।
अब्दुल कदीर खान की उपयोगिता यहां केवल उनकी वैज्ञानिक जानकारी तक सीमित नहीं थी। यूरोप में काम करने के कारण उन्हें suppliers और industrial network की भी जानकारी थी। आगे चलकर पाकिस्तान ने अलग-अलग देशों और कंपनियों से components हासिल करने का जटिल procurement network विकसित किया।
1976 में पाकिस्तान ने कहूटा क्षेत्र में Engineering Research Laboratories स्थापित कीं। अब्दुल कदीर खान को कार्यक्रम में केंद्रीय भूमिका मिली। बाद में इस संस्था का नाम Khan Research Laboratories यानी KRL रखा गया।
कहूटा इस्लामाबाद के पास एक पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति संवेदनशील परियोजना के लिए उपयोगी मानी गई। यहां सुरक्षा कड़ी रखी गई और कार्यक्रम को लंबे समय तक गोपनीय बनाए रखने की कोशिश हुई।
भारत की खुफिया एजेंसियों के लिए यह गतिविधि गंभीर चिंता का विषय थी। 1971 के युद्ध के कुछ ही वर्षों बाद पाकिस्तान का संभावित परमाणु कार्यक्रम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता था।
यहीं से ऑपरेशन कहूटा से जुड़ी जासूसी कहानी सामने आती है।
रिपोर्टेड विवरणों के मुताबिक भारतीय खुफिया नेटवर्क ने कहूटा के आसपास होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना शुरू किया। किसी परमाणु सुविधा के अंदर सीधे प्रवेश करना बेहद मुश्किल था। इसलिए वैज्ञानिक गतिविधियों के बाहरी संकेत तलाशने की कोशिश की गई।
इसी दौरान बालों के नमूनों वाली कहानी सामने आती है। दावा किया गया कि कहूटा की परमाणु सुविधा में काम करने वाले वैज्ञानिक और कर्मचारी आसपास की नाई की दुकानों पर बाल कटवाने जाते थे।
खुफिया एजेंटों ने कथित रूप से ऐसी दुकानों से कटे हुए बालों के नमूने जुटाए और उन्हें जांच के लिए भारत भेजा। बाद की रिपोर्टों में दावा किया गया कि जांच में यूरेनियम और रेडिएशन से जुड़े संकेत मिले।
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कई सनसनीखेज विवरणों में कहा जाता है कि भारतीय जासूसों ने सीधे अब्दुल कदीर खान के बाल चुरा लिए थे। सार्वजनिक विवरणों में आम तौर पर कहूटा से जुड़े वैज्ञानिकों और कर्मचारियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली barber shops से hair samples जुटाने की कहानी मिलती है। इसलिए सीधे AQ Khan के व्यक्तिगत बाल चुराने का दावा सावधानी से देखा जाना चाहिए।
खुफिया दुनिया में environmental sampling कोई असामान्य विचार नहीं है। किसी संवेदनशील औद्योगिक या परमाणु गतिविधि के संकेत मिट्टी, पानी, हवा या दूसरी वस्तुओं के नमूनों से खोजे जा सकते हैं।
कहूटा के मामले में बालों के नमूनों की कहानी इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि एक बेहद सामान्य चीज से कथित रूप से अत्यंत गोपनीय कार्यक्रम के संकेत मिलने का दावा किया गया।
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि पाकिस्तान का कार्यक्रम किस स्तर तक पहुंच चुका है। यदि कहूटा में weapons-grade enriched uranium तैयार करने की क्षमता विकसित हो जाती, तो दक्षिण एशिया का सामरिक संतुलन बदल सकता था।
Gas centrifuge program की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसे बड़े nuclear reactor की तुलना में अपेक्षाकृत सीमित औद्योगिक परिसर में चलाया जा सकता था। हालांकि हजारों centrifuges को स्थिरता के साथ चलाना अत्यंत कठिन engineering challenge था।
कहूटा में पाकिस्तान ने धीरे-धीरे अपना infrastructure विकसित किया। केवल अब्दुल कदीर खान अकेले इस पूरे कार्यक्रम के निर्माता नहीं थे। पाकिस्तान के कई वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, सरकारी संस्थानों और सैन्य ढांचे की इसमें भूमिका थी।
फिर भी AQ Khan इस कार्यक्रम का सबसे प्रसिद्ध चेहरा बने क्योंकि उनका नाम यूरोपीय centrifuge technology और international procurement network से जुड़ा था।
इस दौरान भारत के सामने कई विकल्पों पर विचार किए जाने के दावे सामने आए। क्या कहूटा के कार्यक्रम को sabotage किया जा सकता था? क्या परमाणु सुविधा पर सैन्य कार्रवाई संभव थी? क्या किसी दूसरे देश के साथ मिलकर ऑपरेशन किया जा सकता था?
इन सवालों ने ऑपरेशन कहूटा की कहानी को केवल जासूसी अभियान से आगे बढ़ाकर सैन्य और राजनीतिक निर्णयों की कहानी बना दिया।
लेकिन पार्ट-1 का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि भोपाल में जन्मे एक छात्र का सफर किस तरह पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम तक पहुंचा।
अब्दुल कदीर खान ने यूरोप में उच्च शिक्षा हासिल की, uranium enrichment technology से जुड़े industrial environment में काम किया और फिर पाकिस्तान लौटकर centrifuge-based enrichment program को आगे बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
भारत की खुफिया व्यवस्था ने कहूटा की गतिविधियों को समझने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए। बालों के नमूनों वाली कहानी इसी खुफिया इतिहास का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई।
आगे चलकर अब्दुल कदीर खान का नाम केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा। उन पर ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया तक परमाणु तकनीक या संबंधित सामग्री पहुंचाने वाले proliferation network से जुड़े आरोप लगे।
2004 में उन्होंने पाकिस्तान के सरकारी टेलीविजन पर परमाणु प्रसार गतिविधियों की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए माफी मांगी। हालांकि बाद में उन्होंने अपने बयान की परिस्थितियों को लेकर अलग दावे किए।
पाकिस्तान में उनकी छवि फिर भी बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय नायक की बनी रही। वहीं अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों की नजर में वह आधुनिक इतिहास के सबसे विवादास्पद nuclear proliferation figures में शामिल रहे।
10 अक्टूबर 2021 को इस्लामाबाद में अब्दुल कदीर खान का निधन हो गया। लेकिन उनकी कहानी आज भी कई सवाल छोड़ती है।
क्या यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था ने समय रहते खतरे को नहीं पहचाना? पाकिस्तान ने इतनी बड़ी procurement chain कैसे बनाई? भारतीय खुफिया एजेंट कहूटा की गतिविधियों के कितने करीब पहुंच चुके थे? और अगर भारत के पास कार्यक्रम की जानकारी थी, तो आगे क्या हुआ?
ऑपरेशन कहूटा पार्ट-1 का अंत इन्हीं सवालों के साथ होता है। भोपाल में जन्मे अब्दुल कदीर खान का यूरोप पहुंचना, centrifuge technology से जुड़ी संवेदनशील जानकारी हासिल करने के आरोप, पाकिस्तान वापसी और कहूटा में uranium enrichment program का विकास—इन घटनाओं ने दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया।
बालों के नमूनों की कहानी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रहस्यमय हिस्सा बनी रही। यह दिखाती है कि खुफिया दुनिया में जानकारी का स्रोत कभी-कभी कोई satellite image या secret document ही नहीं, बल्कि नाई की दुकान के फर्श पर पड़े कुछ बाल भी हो सकते हैं।
ऑपरेशन कहूटा की असली राजनीतिक और रणनीतिक कहानी इसके बाद और गहरी होती है। भारतीय खुफिया नेटवर्क के पास जानकारी आने के बाद क्या हुआ, किस स्तर पर कार्रवाई की चर्चा हुई और यह अभियान अपने अंतिम उद्देश्य तक क्यों नहीं पहुंच सका—यह कहानी पार्ट-2 का विषय है।
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