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6 बार संकट में फंसी, 15 साल तक घाटा उठाया: फिर भी कैसे बनी Zomato देश की सबसे बड़ी फूड डिलीवरी कंपनी

भारत की स्टार्टअप दुनिया में ऐसी कहानियाँ कम हैं जहाँ गिरने की संख्या, उठने की ताकत से कम हो। Zomato की कहानी ठीक ऐसी ही है—बार-बार झटके, लंबा नुकसान, मॉडल में बदलाव, छंटनी, कैश की किल्लत… और फिर वापसी। आज कंपनी लाखों ऑर्डर संभालती है, हजारों शहरों में मौजूद है और निवेशकों के साथ-साथ ग्राहकों के भरोसे का भी बड़ा नाम बन चुकी है।

लेकिन यहाँ तक पहुँचने का रास्ता सीधा नहीं था।


शुरुआत: रेस्टोरेंट खोज से डिलीवरी तक

2008 में कंपनी ने एक साधारण आइडिया से शुरुआत की—लोगों को मेन्यू और रेस्टोरेंट की जानकारी ऑनलाइन देना। उस समय ऑनलाइन फूड ऑर्डरिंग भारत में नई थी। धीरे-धीरे यूजर्स बढ़े, रेस्टोरेंट जुड़े और प्लेटफॉर्म ने डेटा व टेक्नोलॉजी के दम पर अपनी पहचान बनाई।

फिर आया बड़ा मोड़—डिलीवरी बिजनेस में उतरना। यहीं से खर्च, ऑपरेशन, डिस्काउंट और प्रतिस्पर्धा का असली खेल शुरू हुआ।


संकट #1: तेज विस्तार, लेकिन कमाई कम

कंपनी ने कई शहरों और देशों में तेजी से कदम बढ़ाए। ऑफिस, टीम, टेक्नोलॉजी, मार्केटिंग—सब पर भारी खर्च हुआ। मगर आमदनी उतनी तेज़ नहीं बढ़ी। निवेशकों का पैसा था, लेकिन मुनाफा दूर दिख रहा था।


संकट #2: प्राइस वॉर और भारी डिस्काउंट

ग्राहक जोड़ने के लिए भारी छूट दी गई। इससे ऑर्डर बढ़े जरूर, लेकिन हर डिलीवरी पर कंपनी का नुकसान भी बढ़ा। यह रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं थी।


संकट #3: रेस्टोरेंट्स से टकराव

कमीशन दरों और ऑफर को लेकर कई बार रेस्टोरेंट पार्टनर्स नाराज़ हुए। कुछ ने प्लेटफॉर्म छोड़ने की धमकी दी। सप्लाई साइड कमजोर होती तो पूरा मॉडल हिल सकता था।


संकट #4: बिजनेस मॉडल बदलते रहना

कभी विज्ञापन, कभी डिलीवरी, कभी सब्सक्रिप्शन, कभी अलग-अलग वर्टिकल—लगातार बदलाव से फोकस बिखरता रहा। संसाधन खर्च हुए, पर स्थिरता नहीं मिली।


संकट #5: महामारी का झटका

2020 में लॉकडाउन लगा। ऑर्डर रुक गए। रेस्टोरेंट बंद। डिलीवरी लगभग ठप। कंपनी को लागत घटानी पड़ी, कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी और कैश बचाना प्राथमिकता बन गया।


संकट #6: निवेशकों का दबाव

लंबे समय तक घाटे में रहने से सवाल उठे—मुनाफा कब? लिस्टिंग के बाद यह दबाव और बढ़ा। हर तिमाही के नतीजों पर बाजार की नजर रहने लगी।


फिर कैसे हुई वापसी?

1. गलतियों से सीख

कंपनी ने समझा कि अंधाधुंध छूट हमेशा काम नहीं करती। यूनिट इकॉनॉमिक्स सुधारना जरूरी है—यानी हर ऑर्डर पर फायदा या कम से कम सीमित नुकसान।

2. लागत पर नियंत्रण

ऑपरेशन को टेक-ड्रिवन बनाया गया। रूट, टाइम, डिलीवरी पार्टनर मैनेजमेंट—सब बेहतर हुआ।

3. नई कमाई के रास्ते

सब्सक्रिप्शन, क्विक कॉमर्स, विज्ञापन, ब्रांड प्रमोशन—इनसे रेवेन्यू के कई स्रोत बने।

4. ब्रांड की ताकत

ग्राहकों के बीच नाम भरोसेमंद बन चुका था। ऐप याद रहता है, उपयोग आसान है—यह बड़ी पूंजी है।


लंबा इंतजार, फिर मुनाफे की दस्तक

करीब डेढ़ दशक तक कंपनी घाटे की खबरों में रही। लेकिन धीरे-धीरे हालात बदले। खर्च पर लगाम, बेहतर मार्जिन और स्थिर मांग ने तस्वीर बदली। पहली बार मुनाफे की खबर आई तो यह सिर्फ बैलेंस शीट नहीं, बल्कि धैर्य की जीत थी।


आज की स्थिति

Zomato अब देश के सैकड़ों शहरों में सक्रिय है। लाखों ग्राहक रोजाना ऐप खोलते हैं। डिलीवरी नेटवर्क विशाल है और टेक प्लेटफॉर्म मजबूत।

प्रतिस्पर्धा अभी भी है, लेकिन कंपनी शुरुआती सालों की तुलना में कहीं ज्यादा परिपक्व दिखती है।


संस्थापक की भूमिका

Deepinder Goyal ने कई बार माना कि फैसलों में गलतियाँ हुईं। पर उन्होंने दिशा बदलने से हिचक नहीं दिखाई। निवेशकों और कर्मचारियों के साथ संवाद बनाए रखा—यह नेतृत्व का अहम पहलू रहा।


क्या चुनौतियाँ खत्म हो गईं?

नहीं।
डिलीवरी का बिजनेस बेहद पतले मार्जिन पर चलता है। ईंधन, वेतन, ऑफर, प्रतियोगिता—सब असर डालते हैं। ग्राहकों की उम्मीदें भी लगातार बढ़ती हैं।


स्टार्टअप्स के लिए सीख

  • तेज बढ़ो, पर टिकाऊ तरीके से

  • डिस्काउंट से ग्राहक आते हैं, पर मुनाफा नहीं

  • टेक्नोलॉजी ऑपरेशन का दिल है

  • मुश्किल समय में कैश सबसे बड़ा हथियार है

  • ब्रांड भरोसा सबसे बड़ी संपत्ति है

Zomato की यात्रा बताती है कि असफलता अंत नहीं, रणनीति सुधारने का मौका है। छह बड़े संकट, लंबा घाटा और अनगिनत चुनौतियों के बाद भी कंपनी खड़ी रही। यही जिद आज उसे देश के सबसे बड़े फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स में शामिल करती है।

http://zomato-6-crisis-success-story


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