राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारत की सुरक्षा, किसानों के हित और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार की नीतियों और प्रयासों का उल्लेख किया है। सिंधु जल संधि को निलंबित रखने के फैसले को भारत की व्यापक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बताया गया है, जबकि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। सिंधु जल संधि के मुद्दे पर भारत का रुख 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद और सख्त हुआ था। भारत ने तब इस संधि को ‘abeyance’ यानी निलंबित स्थिति में रखने का फैसला किया था और 2026 में भी सरकार ने इसे बहाल नहीं किया है। राष्ट्रपति मुर्मु ने संसद में इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी व्यापक रणनीति के संदर्भ में रेखांकित किया था।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे से जुड़ा 1960 का समझौता है। यह समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार हुआ था और 19 सितंबर 1960 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों के रूप में बांटा गया। रावी, ब्यास और सतलुज पर भारत को प्रमुख अधिकार मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी के उपयोग में पाकिस्तान को प्राथमिक अधिकार मिला। भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का कुछ निर्धारित उपयोग करने की अनुमति थी, लेकिन परियोजनाओं और भंडारण से जुड़े कई नियम भी लागू होते थे।
भारत सरकार लंबे समय से इस बात पर जोर देती रही है कि संधि की मौजूदा व्यवस्था से जम्मू-कश्मीर और देश के दूसरे हिस्सों में उपलब्ध जल संसाधनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। सरकार का तर्क है कि पश्चिमी नदियों पर भारत को अपने हिस्से के जल का बेहतर इस्तेमाल करने, सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने तथा स्थानीय लोगों को लाभ पहुंचाने की जरूरत है। 2025 में संधि को निलंबित करने के बाद सरकार ने अपने जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में काम तेज करने की बात कही थी।
राष्ट्रपति के बयान को इसी व्यापक नीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। भारत का आधिकारिक रुख यह है कि पाकिस्तान की ओर से सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में सामान्य सहयोग पहले की तरह नहीं चल सकता। मार्च 2026 में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने भी कहा था कि सिंधु जल संधि तब तक निलंबित रहेगी, जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता।
सिंधु जल संधि को लेकर भारत का तर्क केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध देश की जल सुरक्षा, खेती, बिजली उत्पादन और जम्मू-कश्मीर के विकास से भी जोड़ा जा रहा है। सरकार का कहना है कि यदि भारत अपने उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करता है तो इससे सिंचाई क्षमता बढ़ सकती है और किसानों को लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में जल प्रबंधन और सिंचाई से जुड़े अवसरों पर चर्चा होती रही है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी 2025 में कहा था कि संधि के निलंबन से जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों के किसानों को फायदा हो सकता है और भारत को पानी के उपयोग के लिए व्यापक रणनीति बनानी चाहिए।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि संधि निलंबित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत तुरंत पश्चिमी नदियों का पूरा पानी रोककर अपने खेतों में पहुंचा सकता है। भारत के पास जल भंडारण और उसे दूसरी जगह ले जाने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा हर स्थान पर मौजूद नहीं है। जल संसाधनों का इस्तेमाल बांध, नहर, जलाशय, सिंचाई नेटवर्क और बिजली परियोजनाओं जैसी लंबी अवधि की योजनाओं से जुड़ा होता है। इसलिए संधि के निलंबन का वास्तविक कृषि लाभ धीरे-धीरे बुनियादी ढांचे और जल प्रबंधन परियोजनाओं की प्रगति पर निर्भर करेगा। विश्लेषणों में भी भारत की सीमित भंडारण क्षमता को एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक चुनौती बताया गया है।
यही वजह है कि सिंधु जल संधि का मुद्दा केवल भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव नहीं है। यह भारत के लिए जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की एक बड़ी चुनौती भी है। यदि भारत अपने हिस्से के पानी को प्रभावी ढंग से संग्रहित और उपयोग नहीं करता तो केवल संधि के निलंबन से किसानों को तुरंत बड़ा लाभ नहीं मिल सकता। इसके लिए सरकार को सिंचाई नेटवर्क, जलाशयों, बांधों, बिजली परियोजनाओं और पानी की बचत करने वाली तकनीकों पर लगातार निवेश करना होगा।
जम्मू-कश्मीर में यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि क्षेत्र की कई बड़ी नदियां सिंधु नदी प्रणाली का हिस्सा हैं। सरकार ने लंबे समय से जलविद्युत परियोजनाओं को जम्मू-कश्मीर की आर्थिक क्षमता बढ़ाने का महत्वपूर्ण साधन माना है। भारत ने किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान के साथ विवादों का सामना भी किया है। संधि के निलंबन के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह रुख दोहराया है कि मौजूदा परिस्थितियों में वह संधि की बाध्यताओं को पहले की तरह नहीं मानता।
इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद भी चल रहा है। मई 2026 में Permanent Court of Arbitration की ओर से सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं पर ‘maximum pondage’ यानी भंडारण क्षमता से संबंधित फैसला आया था। भारत ने इस प्रक्रिया और ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया और कहा कि सिंधु जल संधि पहले से ही निलंबित स्थिति में है। इससे साफ है कि पानी का मुद्दा भारत-पाकिस्तान के बीच आने वाले समय में भी कूटनीतिक और कानूनी बहस का विषय बना रह सकता है।
दूसरी तरफ राष्ट्रपति के संदेश में परीक्षा प्रणाली का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। भारत में पिछले कुछ वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा, डिजिटल सिस्टम और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। 2026 में NEET-UG और अन्य परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बीच छात्रों ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग की। इसके बाद सरकार ने परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई कदमों पर काम शुरू किया।
जुलाई 2026 में सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 लोकसभा में पेश किया। इसका उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य संगठित गड़बड़ियों पर रोक लगाने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचे को और मजबूत करना है। सरकार ने इसे परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
इस संशोधन प्रस्ताव में परीक्षा से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं पर सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। सरकारी जानकारी के अनुसार इसका उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें परीक्षा कराने वाली संस्थाओं, पेपर तैयार करने वालों और परीक्षा से जुड़े अन्य पक्षों की जवाबदेही मजबूत हो। सरकार का कहना है कि ईमानदारी से मेहनत करने वाले छात्रों के हितों की रक्षा करना परीक्षा सुधार का मुख्य उद्देश्य है।
नए संशोधन विधेयक में गंभीर परीक्षा अपराधों के लिए सजा और जुर्माने को बढ़ाने का प्रस्ताव है। उपलब्ध विधायी पाठ के अनुसार कुछ अपराधों में न्यूनतम सजा को बढ़ाने, अधिकतम सजा को 10 साल तक करने और कुछ मामलों में जुर्माने की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। संगठित परीक्षा अपराधों से जुड़े मामलों में आर्थिक दंड भी काफी अधिक करने का प्रावधान प्रस्तावित है।
परीक्षा सुधार का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जांच और मुकदमे की गति है। केवल कड़ा कानून बना देना पर्याप्त नहीं होता। अगर पेपर लीक या परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच वर्षों तक चलती रहे तो छात्रों का भरोसा आसानी से वापस नहीं आता। इसलिए संशोधन विधेयक में समयबद्ध जांच और विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है। सरकार ने कहा है कि इससे परीक्षा संबंधी अपराधों में तेजी से कार्रवाई करने और दोषियों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने वाले लाखों युवा कई साल तैयारी करते हैं। एक पेपर लीक होने से केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि छात्रों का समय, पैसा और मानसिक मेहनत भी प्रभावित होती है। कई उम्मीदवार एक ही परीक्षा के लिए महीनों या वर्षों तक तैयारी करते हैं। यदि पेपर लीक हो जाए या परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठें तो पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
2026 में परीक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों के आंदोलन ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया। व्यापक विरोध और परीक्षा संबंधी विवादों के बीच तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने स्वीकार किया। इसके बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ जब परीक्षा प्रणाली में सुधार और छात्रों का भरोसा बहाल करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन चुका था।
इसके साथ ही सरकार ने परीक्षा सुधार के लिए उच्च स्तरीय तंत्र और तकनीकी उपायों पर जोर दिया है। सरकार की ओर से कहा गया है कि परीक्षा प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम करना, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करना और पेपर की सुरक्षा बढ़ाना जरूरी है। जुलाई 2026 में परीक्षा सुधारों से जुड़ी चर्चाओं में तकनीक आधारित व्यवस्था और पारदर्शिता को महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने रखा गया।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि परीक्षा प्रणाली सुधार केवल पेपर लीक रोकने तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था में पेपर की छपाई से लेकर सुरक्षित परिवहन, परीक्षा केंद्र की निगरानी, डिजिटल सुरक्षा, प्रश्नपत्र की गोपनीयता, उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन, रिजल्ट प्रक्रिया और शिकायत निवारण तक हर चरण सुरक्षित होना चाहिए। यदि किसी एक चरण में भी बड़ी कमी रह जाती है तो पूरी परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं।
छात्रों की मांग भी केवल सजा बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि परीक्षा प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो, गड़बड़ी की स्थिति में समय पर जानकारी मिले और शिकायतों का निष्पक्ष समाधान हो। यही वजह है कि परीक्षा सुधार पर सरकार की नई पहल को केवल कानूनी बदलाव के रूप में देखने के बजाय व्यापक प्रशासनिक सुधार के हिस्से के रूप में देखना जरूरी है।
राष्ट्रपति के संदेश में शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि देश की बड़ी युवा आबादी प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए सरकारी नौकरियों, मेडिकल शिक्षा, इंजीनियरिंग, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में प्रवेश की कोशिश करती है। अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होता है तो छात्रों को यह विश्वास मिलता है कि उनकी मेहनत का परिणाम निष्पक्ष तरीके से सामने आएगा।
सिंधु जल संधि और परीक्षा सुधार—दोनों विषय अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों में सरकार की नीति और राष्ट्रीय हित का सवाल जुड़ा हुआ है। सिंधु जल संधि के मामले में सरकार इसे सुरक्षा, जल संसाधन और किसानों के हित से जोड़ रही है, जबकि परीक्षा सुधार के मामले में छात्रों के भविष्य, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता पर जोर दिया जा रहा है।
किसानों के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को अपने जल संसाधनों का अधिकतम और टिकाऊ उपयोग करना होगा। केवल पानी उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। पानी को सही समय पर सही क्षेत्र तक पहुंचाना, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना और जल संरक्षण को बढ़ावा देना भी जरूरी है। अगर इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ता है तो सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े भारतीय क्षेत्रों को लंबे समय में फायदा मिल सकता है।
इसी तरह परीक्षा प्रणाली में सुधार का असली परिणाम तब दिखाई देगा जब छात्र यह महसूस करेंगे कि परीक्षा सुरक्षित है, पेपर लीक की संभावना कम है, गड़बड़ी करने वालों पर जल्दी कार्रवाई होती है और परिणाम प्रक्रिया निष्पक्ष है। कानून की सख्ती तभी प्रभावी होगी जब उसे जमीन पर मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था और तकनीकी सुरक्षा का समर्थन मिले।
सिंधु जल संधि के मामले में भी सरकार के सामने लंबी अवधि की चुनौती है। भारत ने संधि को निलंबित कर अपना राजनीतिक और रणनीतिक रुख स्पष्ट किया है, लेकिन अपने जल संसाधनों का वास्तविक लाभ लेने के लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। जलाशय, सिंचाई परियोजनाएं और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट वर्षों में तैयार होते हैं। इसलिए इस नीति का प्रभाव तत्काल आंकड़ों के बजाय आने वाले वर्षों में ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों में पानी का मुद्दा आगे भी संवेदनशील बना रहेगा। 1960 की संधि ने दोनों देशों के बीच कई दशकों तक जल बंटवारे का ढांचा बनाए रखा था, लेकिन 2025 के बाद दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव ने इस व्यवस्था को नई स्थिति में पहुंचा दिया। भारत अब साफ तौर पर आतंकवाद और सामान्य सहयोग को अलग-अलग देखने के पुराने मॉडल से आगे बढ़ने की बात कर रहा है।
वहीं छात्रों के लिए सरकार की परीक्षा सुधार पहल का संदेश यह है कि परीक्षा में अनियमितता को केवल प्रशासनिक गलती मानकर छोड़ने के बजाय उसे गंभीर अपराध के रूप में देखा जा रहा है। प्रस्तावित कानून में सख्त सजा, समयबद्ध जांच और फास्ट-ट्रैक अदालत जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में हैं।
हालांकि किसी भी सरकारी नीति का वास्तविक मूल्यांकन उसके क्रियान्वयन से होता है। सिंधु जल संधि के निलंबन का किसानों को कितना फायदा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपने जल संसाधनों का कितना प्रभावी उपयोग करता है। उसी तरह परीक्षा कानून कितना प्रभावी होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पेपर की सुरक्षा, परीक्षा संचालन और जांच व्यवस्था कितनी मजबूत बनाई जाती है।
कुल मिलाकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के संदेश में दो बड़े राष्ट्रीय मुद्दे सामने आते हैं—एक तरफ भारत के जल संसाधनों और किसानों के हित से जुड़ा सिंधु जल संधि का सवाल और दूसरी तरफ देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ी परीक्षा प्रणाली। भारत ने सिंधु जल संधि को 2025 से निलंबित रखा है और सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा तथा जल संसाधनों के बेहतर उपयोग से जोड़ रही है। दूसरी ओर 2026 में परीक्षा संबंधी विवादों के बाद केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई के लिए कानून में संशोधन की पहल की है।
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