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स्कूल के बाहर तिरपाल के नीचे पढ़ रहे बच्चे, जर्जर भवन कभी भी गिरने का खतरा

देश में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और सरकारी स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने के दावे लगातार किए जाते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के मंडला जिले से सामने आई एक तस्वीर इन दावों के बीच कई सवाल खड़े करती है। यहां एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बच्चे अपने स्कूल भवन के अंदर बैठकर पढ़ाई करने के बजाय स्कूल के बाहर तिरपाल के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। वजह है स्कूल की जर्जर इमारत, जिसकी दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें बताई जा रही हैं और जिसके बारे में कहा गया है कि वह कभी भी धराशायी हो सकती है। बारिश के दौरान समस्या और बढ़ जाती है, क्योंकि पानी से बचने के लिए लगाई गई अस्थायी तिरपाल भी बच्चों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख पा रही है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार स्कूल भवन को जर्जर घोषित किया जा चुका है और बच्चों की कक्षाएं भवन के बाहर संचालित की जा रही हैं।

मामला मंडला जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित तलैयाटोला का बताया जा रहा है। यहां नवीन प्राथमिक शाला का पुराना भवन लंबे समय से खराब स्थिति में है। भवन की हालत ऐसी हो गई है कि बच्चों को उसके अंदर बैठाकर पढ़ाना जोखिम भरा माना जा रहा है। इसी वजह से स्कूल के सामने तिरपाल लगाकर बच्चों के लिए अस्थायी पढ़ाई की व्यवस्था की गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक इस स्कूल में करीब 25 बच्चे पढ़ते हैं और बारिश के दौरान उनकी पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।

सबसे बड़ी चिंता स्कूल भवन की सुरक्षा को लेकर है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भवन में जगह-जगह बड़ी दरारें दिखाई देती हैं और इसे कभी भी गिरने की आशंका वाला भवन बताया गया है। ऐसे में बच्चों को पुराने भवन के कमरों में बैठाने के बजाय बाहर वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था सुनने में अस्थायी समाधान लगती है, लेकिन जमीन पर बच्चों के लिए यह भी आसान नहीं है। गर्मी में धूप, बारिश में पानी और तेज हवा में तिरपाल का हिलना पढ़ाई को लगातार प्रभावित कर सकता है।

बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए तिरपाल जरूर लगा दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या तिरपाल एक स्थायी स्कूल का विकल्प हो सकता है? जाहिर है, इसका जवाब नहीं है। तिरपाल बारिश और धूप से कुछ हद तक बचाव कर सकता है, लेकिन यह पक्की दीवारों, मजबूत छत, सुरक्षित फर्श, बिजली, शौचालय और दूसरे जरूरी स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर की जगह नहीं ले सकता।

मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि बच्चों की पढ़ाई ऐसे समय में हो रही है जब बारिश का मौसम स्कूल भवन की कमजोरी को और सामने ला देता है। तेज बारिश होने पर तिरपाल के नीचे बैठना मुश्किल हो जाता है। बारिश का पानी आसपास जमा होने से बच्चों की किताबें और कॉपियां भी खराब होने का खतरा रहता है। इससे शिक्षक के लिए पढ़ाना और बच्चों के लिए ध्यान लगाकर पढ़ना दोनों मुश्किल हो जाते हैं। रिपोर्ट में स्कूल के प्रधानपाठक संतोष सोनी के हवाले से बताया गया है कि भवन जर्जर घोषित हो चुका है और उपलब्ध व्यवस्था के अनुसार बाहर कक्षाएं संचालित की जा रही हैं।

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि स्कूल भवन की समस्या अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं लगती। रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल प्रबंधन ने नए भवन के निर्माण के लिए शासन और संबंधित विभाग को कई बार पत्र भेजे हैं। अभिभावकों ने भी जनसुनवाई सहित अलग-अलग माध्यमों से प्रशासन का ध्यान इस समस्या की ओर खींचने की कोशिश की है। इसके बावजूद नया भवन स्वीकृत नहीं होने के कारण बच्चे अस्थायी व्यवस्था में पढ़ने को मजबूर हैं।

यानी यहां समस्या सिर्फ बारिश की नहीं है। असली समस्या है सुरक्षित स्कूल भवन का अभाव। बारिश खत्म हो जाने के बाद भी अगर भवन जर्जर है तो बच्चों को उसके अंदर बैठाना जोखिम भरा रहेगा। गर्मी में तिरपाल के नीचे तापमान बढ़ सकता है और सर्दियों में ठंडी हवा बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है। इस तरह एक अस्थायी व्यवस्था पूरे शैक्षणिक सत्र को प्रभावित कर सकती है।

स्थानीय अभिभावकों के लिए यह स्थिति और चिंता की वजह है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित वातावरण में स्कूल जाए, शिक्षक से पढ़े और बिना किसी डर के अपना भविष्य बनाए। लेकिन जब स्कूल की इमारत ही असुरक्षित हो तो अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा सवाल बच्चों की सुरक्षा का बन जाता है। रिपोर्ट में अभिभावकों ने बच्चों के लिए नए भवन की मांग की है।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि जर्जर स्कूल भवन केवल मंडला की समस्या नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों से समय-समय पर ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं, जहां बच्चे टपकती छत, टूटे प्लास्टर और अस्थायी शेड के बीच पढ़ाई करते दिखाई देते हैं। मध्य प्रदेश के बड़वानी में भी जर्जर स्कूल भवनों में बारिश के दौरान छत से पानी टपकने और बच्चों की किताबें भीगने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। वहां भी स्कूल के अंदर प्लास्टिक की तिरपाल का इस्तेमाल किया गया था।

छत्तीसगढ़ के धमतरी में भी एक सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत में छत से पानी टपकने और प्लास्टर गिरने की खबर सामने आई थी। वहां बारिश से बचने के लिए स्कूल स्टाफ ने तिरपाल लगाकर अस्थायी व्यवस्था की थी। रिपोर्ट के मुताबिक छत का हिस्सा इतना खराब था कि सरिया तक दिखाई देने लगा था।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में भी जर्जर स्कूल भवन की वजह से बच्चों को तिरपाल के नीचे पढ़ाने की खबर सामने आई थी। वहां भवन में दरारें और प्लास्टर उखड़ने की समस्या के साथ हाईटेंशन लाइन का जोखिम भी बताया गया था। तेज बारिश में पानी तिरपाल के अंदर तक आने की शिकायत भी सामने आई थी।

इन घटनाओं को अलग-अलग देखें तो ये स्थानीय समस्याएं लग सकती हैं, लेकिन इन्हें एक साथ देखने पर सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर और रखरखाव को लेकर बड़ा सवाल सामने आता है। स्कूल की इमारत बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है समय-समय पर उसकी structural inspection और maintenance कराना।

स्कूल भवन में अगर छोटी दरार दिखाई देती है तो उसे तुरंत जांचना चाहिए। अगर छत से पानी टपक रहा है तो सिर्फ ऊपर से पन्नी या तिरपाल डाल देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। पानी का रिसाव लंबे समय में concrete और reinforcement को नुकसान पहुंचा सकता है। लगातार नमी से दीवारों और छत की मजबूती प्रभावित हो सकती है। इसलिए ऐसी समस्या को सिर्फ बारिश के मौसम की असुविधा मानकर छोड़ना बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं है।

तलैयाटोला स्कूल की स्थिति में भी यही सवाल उठता है कि अगर भवन को जर्जर घोषित किया जा चुका है तो नया भवन बनाने की प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी? बच्चों की पढ़ाई अस्थायी व्यवस्था में कितने समय तक चलेगी? और जब तक नया भवन नहीं बनता, तब तक बच्चों के लिए बारिश, गर्मी और दूसरे मौसमों में सुरक्षित वैकल्पिक कक्ष की व्यवस्था कौन करेगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग से मिलना जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल प्रबंधन ने पहले ही पत्राचार किया है। इसका मतलब है कि समस्या की जानकारी संबंधित स्तर तक पहुंचाई जा चुकी है। इसके बाद भी यदि स्थायी समाधान नहीं हुआ तो मामला केवल संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि प्रक्रिया में देरी का भी हो सकता है।

यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या करीब 25 बताई गई है। संख्या भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन हर बच्चा महत्वपूर्ण है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल कई परिवारों के लिए शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम होते हैं। अगर स्कूल की स्थिति खराब होने के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है तो इसका असर सिर्फ वर्तमान कक्षा पर नहीं, बल्कि उनके आगे के शैक्षणिक सफर पर भी पड़ सकता है।

एक सुरक्षित स्कूल बच्चों में सीखने का विश्वास पैदा करता है। इसके उलट अगर बच्चा रोज स्कूल पहुंचकर देखता है कि उसे पक्के कमरे में नहीं बल्कि तिरपाल के नीचे बैठना है, बारिश होते ही पढ़ाई रोकनी है और किताबों को पानी से बचाना है, तो शिक्षा का माहौल प्रभावित होना स्वाभाविक है।

शिक्षकों के लिए भी यह स्थिति आसान नहीं है। एक शिक्षक का काम केवल बच्चों को किताब पढ़ाना नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे सुरक्षित रहें। अगर सामने जर्जर इमारत हो, ऊपर तिरपाल हो और मौसम खराब हो रहा हो तो शिक्षक का ध्यान भी सुरक्षा पर लगा रहता है। ऐसे माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की उम्मीद करना मुश्किल हो सकता है।

इस मामले में स्थानीय समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अभिभावक लगातार नए भवन की मांग कर रहे हैं। जब सरकारी व्यवस्था में देरी होती है तो कई जगह ग्रामीण स्वयं अस्थायी कक्षा बनाने के लिए आगे आते हैं। झारखंड के सिमडेगा में भी ग्रामीणों ने जर्जर स्कूल भवन के कारण बांस और तिरपाल से अस्थायी कक्षा तैयार की थी। वहां भी छत से पानी टपकने और भवन के कभी भी गिरने की आशंका को लेकर ग्रामीण चिंतित थे।

लेकिन समुदाय की पहल को स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। ग्रामीण तिरपाल खरीद सकते हैं, बांस जुटा सकते हैं और अस्थायी शेड बना सकते हैं, लेकिन स्कूल भवन का structural design, foundation, RCC construction, बिजली, शौचालय, पेयजल और अन्य सुविधाएं सरकारी स्तर पर ही व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

स्कूल भवनों की सुरक्षा के लिए नियमित निरीक्षण की व्यवस्था भी जरूरी है। जिस भवन में बच्चे रोज बैठते हैं, उसकी स्थिति का आकलन केवल तब नहीं होना चाहिए जब कोई वीडियो वायरल हो जाए। अगर किसी भवन को जर्जर घोषित किया जाता है तो बच्चों को वहां से तत्काल सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने और नए भवन या वैकल्पिक कक्ष की व्यवस्था करने की प्रक्रिया पहले से तय होनी चाहिए।

वायरल वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट ने अक्सर ऐसी समस्याओं को तेजी से सामने लाने में मदद की है। जब स्थानीय स्तर पर किसी समस्या की ओर ध्यान नहीं जाता, तब वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बनता है। लेकिन किसी बच्चे की सुरक्षा के लिए समस्या का वायरल होना जरूरी नहीं होना चाहिए। स्कूल में पढ़ने वाले हर बच्चे को सुरक्षित भवन मिलना उसका बुनियादी अधिकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

यहां एक और सवाल है—क्या सिर्फ नया भवन बना देने से समस्या खत्म हो जाएगी? इसका जवाब भी पूरी तरह हां नहीं है। नया भवन बनने के बाद उसके रखरखाव की व्यवस्था जरूरी होगी। छत की waterproofing, drainage, electrical safety, दीवारों की condition और परिसर की सुरक्षा की नियमित जांच करनी होगी। वरना कुछ साल बाद वही भवन फिर जर्जर स्थिति में पहुंच सकता है।

स्कूल भवन के आसपास बारिश के पानी की निकासी भी महत्वपूर्ण है। अगर पानी लगातार भवन के आसपास जमा रहता है तो नींव पर असर पड़ सकता है। इसलिए नए स्कूल भवन के design में drainage system को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।

बच्चों की पढ़ाई के लिए अस्थायी तिरपाल भले ही तत्काल संकट से बचाने का एक तरीका हो, लेकिन इसे लंबे समय तक चलाना शिक्षा व्यवस्था की मजबूरी को दिखाता है। तिरपाल हवा, बारिश और धूप से पूरी तरह सुरक्षा नहीं देता। तेज बारिश में पानी अंदर आ सकता है और तेज हवा में पूरा अस्थायी ढांचा प्रभावित हो सकता है।

बारिश के दौरान बिजली के उपकरण और खुले तार भी अतिरिक्त खतरा पैदा कर सकते हैं। इसलिए जब तक नया भवन नहीं बनता, वैकल्पिक कक्षा ऐसी जगह होनी चाहिए जहां बच्चों को बिजली, पानी, यातायात और अन्य संभावित जोखिमों से बचाया जा सके।

मंडला के तलैयाटोला स्कूल का मामला इसी वजह से प्रशासन के लिए एक तत्काल प्राथमिकता का विषय होना चाहिए। स्कूल भवन जर्जर घोषित है, बच्चे बाहर पढ़ रहे हैं और बारिश में परेशानी बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में स्थायी भवन निर्माण की प्रक्रिया में तेजी लाना जरूरी है।

माता-पिता की चिंता को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह भरोसा भी चाहिए कि स्कूल पहुंचने के बाद बच्चे सुरक्षित रहेंगे। शिक्षा केवल किताब और शिक्षक तक सीमित नहीं है। सुरक्षित वातावरण, स्वच्छ पानी, शौचालय, बैठने की जगह और मौसम से सुरक्षा भी स्कूल शिक्षा का जरूरी हिस्सा हैं।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को केवल इसलिए कम सुविधा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वे ग्रामीण या दूरदराज इलाके से आते हैं। खासकर प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए सुरक्षित भवन और बुनियादी सुविधाएं बहुत जरूरी हैं। छोटी उम्र के बच्चे खुद किसी जोखिम का आकलन नहीं कर सकते। इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन पर अधिक होती है।

अगर किसी जर्जर भवन को लेकर पहले ही शिकायतें आ चुकी हैं तो उसे रिकॉर्ड में रखकर कार्रवाई की समयसीमा तय होनी चाहिए। किस अधिकारी ने निरीक्षण किया, क्या रिपोर्ट आई, नए भवन के लिए प्रस्ताव कब भेजा गया, बजट कब मंजूर हुआ और निर्माण कब शुरू होगा—इन सभी चरणों की निगरानी होनी चाहिए। इससे जवाबदेही तय की जा सकती है।

तलैयाटोला के बच्चों की तस्वीर एक बड़े सवाल के साथ सामने आती है। एक तरफ देश में डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास और आधुनिक स्कूलों की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ बच्चे आज भी तिरपाल के नीचे बैठकर बारिश से बचते हुए पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों तस्वीरों के बीच का अंतर बताता है कि शिक्षा के क्षेत्र में सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि बुनियादी स्कूल भवनों पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है।

बच्चों के पास पढ़ने की इच्छा है। शिक्षक उन्हें पढ़ाने के लिए तैयार हैं। अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं। कमी अगर कहीं है तो सुरक्षित और स्थायी infrastructure की है। ऐसे में समाधान भी स्पष्ट है—जर्जर भवन को खाली कराकर बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था की जाए, नए स्कूल भवन की प्रक्रिया को तेज किया जाए और निर्माण पूरा होने तक बच्चों की पढ़ाई मौसम से प्रभावित न हो, इसकी व्यवस्था की जाए।

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