अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट, महंगाई और रोजमर्रा की बढ़ती लागत ने रिपब्लिकन पार्टी के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। कई ऐसे चुनावी क्षेत्रों में भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार मजबूत चुनौती दे रहे हैं, जिन्हें पहले रिपब्लिकन पार्टी का सुरक्षित गढ़ माना जाता था। चुनाव से पहले आए कई सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट्स को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़त मिलती दिखाई गई है।
इस चुनाव को ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। अमेरिकी मतदाता सिर्फ अपने स्थानीय सांसदों और प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं करेंगे, बल्कि उनके वोट को राष्ट्रपति की नीतियों पर जनता की राय के रूप में भी देखा जा रहा है। महंगाई, पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतें, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, इमिग्रेशन और विदेश नीति जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
हालांकि सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त का संकेत मिल रहा है, लेकिन इससे चुनाव का अंतिम नतीजा तय नहीं माना जा सकता। अमेरिका में अलग-अलग राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों के समीकरण अलग होते हैं। मतदान प्रतिशत, स्थानीय उम्मीदवारों की लोकप्रियता और आखिरी समय में मतदाताओं का रुख परिणाम बदल सकता है।
क्या है अमेरिका का मिडटर्म चुनाव?
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है। राष्ट्रपति चुनाव के दो साल बाद होने वाले मध्यावधि चुनाव को मिडटर्म इलेक्शन कहा जाता है। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों के लिए चुनाव होते हैं।
अमेरिकी कांग्रेस के दो सदन हैं—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर हर दो साल में चुनाव होता है। वहीं सीनेट की कुल 100 सीटों में से लगभग एक-तिहाई सीटों पर एक चुनाव चक्र में मतदान कराया जाता है। इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नर, स्थानीय प्रतिनिधियों और अन्य पदों के लिए भी चुनाव होते हैं।
मिडटर्म चुनाव इसलिए अहम होता है क्योंकि इससे पता चलता है कि राष्ट्रपति की पार्टी को जनता का कितना समर्थन मिल रहा है। अगर राष्ट्रपति की पार्टी कांग्रेस में बहुमत खो देती है, तो सरकार के लिए नए कानून पास कराना और अपनी नीतियों को लागू करना मुश्किल हो सकता है।
2026 के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के सामने हाउस और सीनेट में अपनी स्थिति बनाए रखने की चुनौती है। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में अपनी ताकत बढ़ाकर ट्रम्प प्रशासन की नीतियों पर अधिक प्रभावी निगरानी रखना चाहती है।
रिपब्लिकन के मजबूत इलाकों में डेमोक्रेट्स की चुनौती
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी उन इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवारों को पहले मजबूत माना जाता था। कई रिपब्लिकन-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला पहले की तुलना में ज्यादा कड़ा हो गया है।
2 नवंबर को सामने आए चुनावी विश्लेषणों के अनुसार, रिपब्लिकन पार्टी को कोलोराडो, फ्लोरिडा, इंडियाना, मिनेसोटा, ओहायो और विस्कॉन्सिन जैसे राज्यों के कुछ क्षेत्रों में चुनौती मिल रही है। इन इलाकों में मतदाताओं की नाराजगी, स्थानीय मुद्दे और ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं
यहां यह समझना जरूरी है कि किसी राज्य को रिपब्लिकन या डेमोक्रेटिक समर्थक कहने का अर्थ यह नहीं है कि वहां हर सीट पर उसी पार्टी की जीत तय है। अमेरिका में कई निर्वाचन क्षेत्रों का राजनीतिक रुझान राज्य के औसत से अलग होता है। उम्मीदवार की छवि, स्थानीय अर्थव्यवस्था और मतदाताओं की भागीदारी भी नतीजे तय करती है।
डेमोक्रेट्स की कोशिश है कि वे रिपब्लिकन पार्टी के उन उम्मीदवारों को चुनौती दें, जो ट्रम्प की नीतियों के साथ मजबूती से खड़े हैं। वहीं रिपब्लिकन उम्मीदवार अपने समर्थकों को यह समझाने में जुटे हैं कि स्थानीय चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ उनके क्षेत्र के विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट से रिपब्लिकन को नुकसान
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता में आई गिरावट इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक है। कई सर्वेक्षणों में उनके कामकाज को लेकर असंतोष बढ़ता दिखाई दिया है।
अक्टूबर में किए गए प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वेक्षण में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 30% दर्ज की गई, जबकि 68% लोगों ने उनके कामकाज को अस्वीकार किया। यह उनके दूसरे कार्यकाल की सबसे कम रेटिंग बताई गई। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में मतदाता कांग्रेस के लिए अपना वोट देते समय ट्रम्प को ध्यान में रख रहे हैं।
रॉयटर्स और इप्सोस के 26 अक्टूबर को पूरे हुए सर्वेक्षण में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 32% बताई गई। यह पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर से थोड़ा ऊपर थी, लेकिन फिर भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति को दिखाती है। इसी सर्वेक्षण में कांग्रेस के लिए सामान्य मतदान पसंद के सवाल पर डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को रिपब्लिकन उम्मीदवारों से आगे दिखाया गया।
राष्ट्रपति की लोकप्रियता का असर उनकी पार्टी के उम्मीदवारों पर भी पड़ सकता है। कई मतदाता अपने क्षेत्र के उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि से ज्यादा राष्ट्रीय सरकार के प्रदर्शन को देखकर वोट देने का फैसला करते हैं। यदि मतदाता राष्ट्रपति की नीतियों से नाराज हैं, तो वे कांग्रेस में विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दे सकते हैं।
हालांकि सभी रिपब्लिकन मतदाता ट्रम्प से नाराज नहीं हैं। उनके समर्थकों का एक मजबूत आधार अब भी मौजूद है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि लोकप्रियता में गिरावट के कारण रिपब्लिकन पार्टी की हार निश्चित हो गई है। चुनावी नतीजे मतदान और सीट-दर-सीट मुकाबले पर निर्भर करेंगे।
महंगाई बनी चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा
2026 के मिडटर्म चुनाव में महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल हैं। अमेरिका में आम परिवारों के लिए किराने का सामान, पेट्रोल, बिजली, घर खरीदना और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं।
मतदाता यह जानना चाहते हैं कि सरकार उनकी रोजमर्रा की आर्थिक समस्याओं को कम करने के लिए क्या कर रही है। अर्थव्यवस्था के बड़े आंकड़े अच्छे दिखाई देने के बावजूद अगर परिवारों को हर महीने ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, तो उसका असर सरकार के प्रति उनकी राय पर पड़ता है।
2 नवंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी उपभोक्ता महंगाई और रोजमर्रा की लागत को लेकर निराश हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि जनवरी 2025 से उपभोक्ता कीमतों और औसत प्रति घंटे की कमाई में लगभग 5.5% की बढ़ोतरी हुई है। यानी औसत कमाई में हुई वृद्धि कीमतों में बढ़ोतरी के लगभग बराबर रही, जिससे कई कामगारों की वास्तविक क्रय शक्ति में खास सुधार नहीं हुआ।
घर खरीदना भी कई परिवारों के लिए मुश्किल बना हुआ है। मॉर्गेज यानी होम लोन की ब्याज दरें 7% से ऊपर रहने और घरों की सीमित उपलब्धता के कारण नए घर खरीदने की लागत बढ़ी हुई है। ऐसे में युवा परिवार और पहली बार घर खरीदने वाले लोग आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
महंगाई का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर लगभग हर परिवार पर पड़ता है। किसी व्यक्ति की आय बढ़ भी जाए, लेकिन यदि किराना, ईंधन, किराया और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें उससे तेजी से बढ़ती हैं, तो उसके पास बचत के लिए कम पैसा बचता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी इस नाराजगी को चुनावी मुद्दा बना रही है। पार्टी का तर्क है कि रिपब्लिकन सरकार आम नागरिकों की आर्थिक परेशानियों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दे रही। वहीं रिपब्लिकन उम्मीदवार अर्थव्यवस्था, टैक्स, ऊर्जा और रोजगार से जुड़ी अपनी नीतियों का बचाव कर रहे हैं।
पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतों ने बढ़ाई परेशानी
अमेरिका में पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतें भी चुनावी चर्चा में हैं। वाहन पर निर्भर रहने वाले परिवारों के लिए ईंधन की कीमत में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी महीने के बजट को प्रभावित कर सकती है।
हाल के महीनों में ईंधन की लागत पर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर भी देखने को मिला है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष तथा उससे जुड़े भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। इससे पेट्रोल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी है।
रिपोर्टों के अनुसार, मतदाता ट्रम्प प्रशासन की विदेश नीति और ईरान से जुड़े संघर्ष को भी आर्थिक दबाव से जोड़कर देख रहे हैं। महंगा ईंधन परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ा सकता है। इसका असर खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह चुनौती है कि वह मतदाताओं को भरोसा दिलाए कि उसकी नीतियां लंबे समय में ऊर्जा की लागत कम करने और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद करेंगी। दूसरी तरफ डेमोक्रेट्स महंगे ईंधन और जीवनयापन की लागत को सरकार के खिलाफ एक बड़े मुद्दे के रूप में उठा रहे हैं।
सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट्स को कितनी बढ़त?
चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। हालांकि अलग-अलग सर्वेक्षणों के आंकड़े अलग हो सकते हैं, क्योंकि उनकी तारीख, नमूना और सवाल पूछने का तरीका अलग होता है।
| सर्वेक्षण | मुख्य नतीजा |
|---|---|
| प्यू रिसर्च सेंटर, अक्टूबर | ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 30% |
| रॉयटर्स-इप्सोस, 26 अक्टूबर | कांग्रेस के सामान्य मतदान पसंद में डेमोक्रेट्स आगे |
| NPR/PBS-मारिस्ट, अक्टूबर | संभावित मतदाताओं में डेमोक्रेट्स 52%, रिपब्लिकन 44% |
| AARP, 43 प्रतिस्पर्धी क्षेत्र | डेमोक्रेट्स 49%, रिपब्लिकन 46% |
NPR/PBS-मारिस्ट के अक्टूबर सर्वेक्षण में संभावित मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 44% समर्थन मिला। इस सर्वेक्षण में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग संभावित मतदाताओं के बीच 40% बताई गई।
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AARP के सर्वेक्षण में 43 प्रतिस्पर्धी कांग्रेस क्षेत्रों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 49% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 46% समर्थन मिला। यह सर्वेक्षण इसलिए अहम है क्योंकि इनमें कुछ ऐसे क्षेत्र भी शामिल थे, जहां 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने जीत दर्ज की थी।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि डेमोक्रेट्स को कई मुकाबलों में अवसर मिल रहा है। लेकिन राष्ट्रीय सर्वेक्षण और वास्तविक सीटों का परिणाम एक जैसा होना जरूरी नहीं है। अमेरिका में कांग्रेस की सीटें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से तय होती हैं। इसलिए किसी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा वोट मिलने के बावजूद सभी राज्यों में जीत मिलना निश्चित नहीं होता।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर क्यों टिकी हैं नजरें?
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत हासिल करना डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बड़ा लक्ष्य है। इस सदन में सभी 435 सीटों पर चुनाव होता है। बहुमत मिलने पर डेमोक्रेट्स को कानून बनाने की प्रक्रिया, बजट और सरकारी कामकाज की निगरानी में अधिक ताकत मिल सकती है।
रिपब्लिकन पार्टी के लिए हाउस में बहुमत बचाना जरूरी है। अगर पार्टी यहां अपनी सीटें खो देती है, तो ट्रम्प प्रशासन को विपक्ष के साथ बातचीत और समझौता करना पड़ सकता है। बजट, टैक्स, सरकारी खर्च और अन्य बड़े विधायी फैसलों पर राजनीतिक टकराव बढ़ सकता है।
चुनावी विश्लेषणों में डेमोक्रेट्स को हाउस में बहुमत हासिल करने का अच्छा अवसर बताया जा रहा है। 2 नवंबर के चुनावी विश्लेषण में बताया गया कि डेमोक्रेट्स को हाउस में बहुमत हासिल करने के लिए सीमित संख्या में सीटों का शुद्ध लाभ चाहिए। इस वजह से कुछ रिपब्लिकन-बहुल सीटें भी मुकाबले के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गई हैं।
अगर डेमोक्रेट्स हाउस में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो वे ट्रम्प प्रशासन के फैसलों की जांच और सुनवाई के जरिए सरकार पर दबाव बढ़ा सकते हैं। हालांकि कानून पास करने के लिए सीनेट और राष्ट्रपति की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।
सीनेट का मुकाबला भी रहेगा अहम
सीनेट अमेरिकी कांग्रेस का दूसरा सदन है। इसमें कुल 100 सदस्य होते हैं और हर चुनाव में लगभग एक-तिहाई सीटों पर मतदान होता है। सीनेट में बहुमत का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि यहां कई बड़े सरकारी और संवैधानिक फैसलों पर मतदान होता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए सीनेट में बहुमत हासिल करना हाउस की तुलना में अधिक कठिन चुनौती माना जा रहा है। इसके पीछे अलग-अलग राज्यों के चुनावी समीकरण और उम्मीदवारों की स्थिति है।
सीनेट चुनाव में हर राज्य का महत्व अलग होता है। किसी राज्य में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक पार्टी को बड़ी जीत मिल सकती है, लेकिन सीनेट के चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार की लोकप्रियता के कारण परिणाम बदल सकता है।
रिपब्लिकन पार्टी को उम्मीद है कि उसके मजबूत राज्यों में पार्टी का आधार उसे सीनेट में फायदा पहुंचाएगा। वहीं डेमोक्रेट्स उन सीटों पर ध्यान दे रहे हैं, जहां मतदाताओं की नाराजगी और उम्मीदवारों की लोकप्रियता उनके पक्ष में जा सकती है।
डेमोक्रेट्स के सामने भी चुनौतियां कम नहीं
सर्वेक्षणों में बढ़त के बावजूद डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चुनाव आसान नहीं है। पार्टी को मतदाताओं के सामने सिर्फ ट्रम्प सरकार की आलोचना करने के बजाय अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियों का स्पष्ट विकल्प भी रखना होगा।
महंगाई से परेशान मतदाता यह जानना चाहते हैं कि डेमोक्रेट्स सत्ता में आने पर कीमतें कम करने, घर खरीदना आसान बनाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए क्या करेंगे। यदि पार्टी इन सवालों का भरोसेमंद जवाब नहीं दे पाती, तो उसकी चुनावी बढ़त कमजोर हो सकती है।
इसके अलावा डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर भी कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। कुछ उम्मीदवार मध्यमार्गी मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि कुछ उम्मीदवार अधिक प्रगतिशील नीतियों का समर्थन कर रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में मतदाताओं की जरूरतें भी अलग हैं।
पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह ट्रम्प विरोधी वोटों को वास्तविक मतदान में बदल सके। सर्वेक्षण में समर्थन जताना और मतदान केंद्र तक पहुंचना दो अलग बातें हैं। अगर डेमोक्रेटिक समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालते हैं, तो पार्टी को फायदा हो सकता है।
रिपब्लिकन पार्टी की रणनीति क्या है?
रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार अपने समर्थकों को मतदान के लिए प्रेरित करने में जुटे हैं। पार्टी का मुख्य आधार अब भी ट्रम्प के समर्थक, रूढ़िवादी मतदाता और कई ग्रामीण तथा छोटे शहरों के क्षेत्र हैं।
रिपब्लिकन उम्मीदवार इमिग्रेशन, सीमा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, टैक्स में कटौती और ऊर्जा उत्पादन जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं। पार्टी का तर्क है कि उसकी नीतियां अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और देश की सुरक्षा बढ़ाने के लिए जरूरी हैं।
रिपब्लिकन उम्मीदवारों के सामने एक कठिन संतुलन भी है। उन्हें ट्रम्प के समर्थकों का भरोसा बनाए रखना है, लेकिन उन स्वतंत्र और मध्यमार्गी मतदाताओं को भी आकर्षित करना है, जो महंगाई और सरकार के प्रदर्शन से नाराज हैं।
कुछ उम्मीदवार ट्रम्प प्रशासन के साथ अपनी नजदीकी को चुनावी ताकत मानते हैं, जबकि कुछ स्थानीय मुद्दों पर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव में यह रणनीति कितनी सफल होगी, इसका फैसला मतदाता करेंगे।
युवा और स्वतंत्र मतदाताओं की भूमिका
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में युवा और स्वतंत्र मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। स्वतंत्र मतदाता किसी एक पार्टी से स्थायी रूप से जुड़े नहीं होते। वे उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखकर अपना वोट तय कर सकते हैं।
युवा मतदाताओं के लिए रोजगार, शिक्षा का खर्च, स्वास्थ्य सेवाएं, घर खरीदने की क्षमता और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम हैं। यदि युवा मतदाता बड़ी संख्या में मतदान करते हैं, तो कई करीबी मुकाबलों का परिणाम प्रभावित हो सकता है।
प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक समर्थकों के बीच चुनाव को लेकर अधिक उत्साह दिखाई दिया। सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक समर्थक रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में मतदान के लिए अधिक प्रेरित बताए गए।
हालांकि चुनाव में उत्साह का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा, जब मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचेंगे। इसलिए दोनों पार्टियों के लिए आखिरी समय तक अपने समर्थकों को संगठित करना जरूरी है।
विदेश नीति और ईरान संघर्ष का असर
2026 के चुनाव में विदेश नीति भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर सामने आई है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा उससे जुड़े सैन्य घटनाक्रम ने मतदाताओं की चिंताओं को बढ़ाया है।
विदेश नीति का असर सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता। युद्ध या तनाव के कारण तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, सरकारी खर्च पर दबाव आ सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। इन सभी परिस्थितियों का असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ सकता है।
रिपब्लिकन प्रशासन के समर्थक राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी हितों की रक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं। वहीं आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि विदेश नीति के फैसलों का आर्थिक बोझ आम परिवारों पर क्यों पड़ रहा है।
मतदाताओं के लिए यह तय करना आसान नहीं है कि विदेश नीति के मामले में कौन-सी पार्टी बेहतर विकल्प दे सकती है। लेकिन चुनावी बहस में यह मुद्दा महंगाई और आर्थिक दबाव के साथ जुड़ गया है।
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