पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई, जबकि पिछले एक सप्ताह के दौरान इसमें लगभग 16% की तेजी दर्ज की गई है। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेज उछाल ने भारत समेत दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत में महंगाई बढ़ सकती है, रुपये पर दबाव आ सकता है और विदेशी निवेश (FII) का प्रवाह भी प्रभावित हो सकता है।
वैश्विक तेल बाजार में अचानक आई तेजी का सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव है। ईरान और अमेरिका के बीच हाल के घटनाक्रम के बाद निवेशकों को आशंका है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी संभावना के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी से खरीदारी देखने को मिली।
ब्रेंट क्रूड दुनिया में कच्चे तेल की कीमत तय करने वाला प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है। जब इसकी कीमत बढ़ती है, तो इसका असर लगभग सभी तेल आयातक देशों पर पड़ता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 90 डॉलर या उससे ऊपर बना रहता है, तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, विमान ईंधन और परिवहन लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इससे वस्तुओं की ढुलाई महंगी होगी और रोजमर्रा की कई चीजों के दाम बढ़ने की संभावना बनेगी।
भारत में महंगाई (Inflation) पर इसका सबसे बड़ा असर खाद्य पदार्थों, परिवहन और औद्योगिक उत्पादों की लागत के रूप में दिखाई दे सकता है। जब ईंधन महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ जाता है, जिससे फल, सब्जियां, दूध, अनाज और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मुद्रास्फीति नियंत्रण रणनीति के लिए भी चुनौती बन सकती है। यदि महंगाई बढ़ती है तो ब्याज दरों को लेकर भी नई रणनीति बनानी पड़ सकती है।
रुपये पर भी इसका असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। जब भारत अधिक महंगा कच्चा तेल खरीदता है, तो डॉलर की मांग बढ़ती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है। डॉलर की बढ़ती मांग के कारण भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है।
रुपये में कमजोरी आने से आयात और महंगे हो जाते हैं। इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, मेडिकल उपकरण और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। वहीं विदेशी शिक्षा और विदेश यात्रा करने वाले लोगों की लागत भी बढ़ सकती है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के व्यवहार पर भी इस स्थिति का असर देखने को मिल सकता है। वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर कई निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। यदि ऐसा होता है तो भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
शेयर बाजार के विश्लेषकों के अनुसार, तेल की कीमत बढ़ने का सबसे अधिक प्रभाव उन कंपनियों पर पड़ सकता है जिनकी ईंधन लागत अधिक होती है। एयरलाइंस, परिवहन कंपनियां, लॉजिस्टिक्स सेक्टर और कुछ विनिर्माण उद्योगों पर अतिरिक्त लागत का दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर तेल एवं गैस क्षेत्र की कुछ कंपनियों को इसका लाभ भी मिल सकता है।
पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में स्थित है। यदि यहां संघर्ष बढ़ता है या समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर व्यापक असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार की बाधा आती है, तो तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
भारत सरकार और तेल विपणन कंपनियां लगातार वैश्विक बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो घरेलू ईंधन कीमतों को लेकर भी नई रणनीति अपनानी पड़ सकती है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत ने हाल के वर्षों में अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास किया है। रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों से आयात बढ़ाकर आपूर्ति को संतुलित करने की कोशिश की गई है। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है।
हालांकि, वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने की स्थिति में सभी आयातकों को अधिक भुगतान करना पड़ता है। इसलिए यदि ब्रेंट क्रूड लगातार ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर भी दबाव बढ़ सकता है।
निवेश विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में शेयर बाजार में अस्थिरता सामान्य होती है। निवेशकों को घबराकर निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक निवेश रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक घटनाओं का असर अक्सर अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के रूप में दिखाई देता है।
घरेलू उद्योगों के लिए भी ऊर्जा लागत एक महत्वपूर्ण कारक है। बिजली उत्पादन, सीमेंट, स्टील, केमिकल और परिवहन क्षेत्र में लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च में वृद्धि हो सकती है। इसका असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
भारत सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की गति भी बनी रहे। यदि तेल की कीमतें अधिक समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं, तो राजकोषीय प्रबंधन और ऊर्जा नीति दोनों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
वैश्विक विशेषज्ञों का मानना है कि तेल बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिका-ईरान तनाव, ओपेक+ देशों की उत्पादन नीति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी। यदि तनाव कम होता है, तो कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है। वहीं संघर्ष बढ़ने की स्थिति में कीमतों में और तेजी संभव है।
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाए। सरकार और तेल कंपनियां परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक कदम उठा सकती हैं, ताकि घरेलू बाजार पर प्रभाव को सीमित रखा जा सके।
कुल मिलाकर, ब्रेंट क्रूड का 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचना केवल ऊर्जा बाजार की खबर नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की महंगाई, रुपये की मजबूती, विदेशी निवेश, शेयर बाजार और आम लोगों के दैनिक खर्च से भी है। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और वैश्विक तेल बाजार की चाल भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
