भारत की अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में देश में स्टार्टअप, शेयर बाजार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और औद्योगिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। इसी दौरान देश में अरबपतियों (Billionaires) की संख्या में भी तेजी से इजाफा हुआ है। हाल ही में संसद में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार भारत में अब 576 अरबपति हैं और पिछले लगभग पांच वर्षों में उनकी संख्या करीब चार गुना बढ़ गई है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके पास इन अरबपतियों की कुल संपत्ति का कोई आधिकारिक केंद्रीकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि अरबपतियों की संख्या बढ़ने के बावजूद सरकार किसी व्यक्ति की कुल वैश्विक संपत्ति का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखती। दूसरी ओर सरकार ने यह भी दावा किया कि पिछले वर्षों में देश में गरीबी और बेरोजगारी से जुड़े कई प्रमुख संकेतकों में सुधार देखने को मिला है।
यह जानकारी सामने आने के बाद आर्थिक असमानता, संपत्ति वितरण और रोजगार जैसे मुद्दों पर नई बहस शुरू हो गई है।
भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ने के पीछे कई आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में शेयर बाजार में आई तेजी, नई कंपनियों की लिस्टिंग, स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, डिजिटल टेक्नोलॉजी कंपनियों का विकास और पारिवारिक उद्योगों की संपत्ति में वृद्धि ने बड़ी भूमिका निभाई है।
कई उद्योगपतियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा उनकी सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों से जुड़ा होता है। जब शेयर बाजार में तेजी आती है तो उनकी कुल नेटवर्थ भी बढ़ जाती है। इसी कारण किसी वर्ष में अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जबकि बाजार में गिरावट आने पर यह संख्या कम भी हो सकती है।
सरकार ने संसद में यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल आयकर, जीएसटी और अन्य वैधानिक कर प्रणालियों के माध्यम से वित्तीय जानकारी प्राप्त करती है। लेकिन किसी व्यक्ति की कुल वैश्विक संपत्ति का अलग डेटाबेस सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह बताना संभव नहीं है कि सभी भारतीय अरबपतियों के पास कुल कितनी संपत्ति है।
यही कारण है कि अक्सर अरबपतियों की संपत्ति से जुड़े आंकड़े निजी रिसर्च एजेंसियों, वैश्विक बिजनेस मैगजीन और वेल्थ ट्रैकिंग संस्थाओं की रिपोर्टों में सामने आते हैं। ये संस्थाएं सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर, निवेश, निजी कंपनियों के अनुमानित मूल्यांकन और अन्य सार्वजनिक वित्तीय जानकारी के आधार पर नेटवर्थ का अनुमान लगाती हैं।
सरकारी जवाब में एक और महत्वपूर्ण बात कही गई। सरकार ने दावा किया कि देश में गरीबी कम हुई है और रोजगार से जुड़े कई संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया गया है। इसके समर्थन में विभिन्न सरकारी सर्वेक्षणों और आर्थिक रिपोर्टों का उल्लेख किया गया।
हालांकि गरीबी और बेरोजगारी जैसे विषयों पर अलग-अलग संस्थाएं अलग-अलग पद्धतियों का उपयोग करती हैं। इसलिए इनके आंकड़ों में अंतर देखने को मिल सकता है। उदाहरण के लिए कुछ संस्थाएं उपभोग (Consumption) के आधार पर गरीबी का आकलन करती हैं, जबकि कुछ आय (Income) या बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) को आधार मानती हैं।
इसी प्रकार रोजगार के आंकड़े भी विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। इसलिए किसी भी आंकड़े को समझते समय उसकी पद्धति और स्रोत को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ना अपने आप में सकारात्मक या नकारात्मक संकेत नहीं माना जा सकता। इसका सही आकलन इस बात से होता है कि क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के अन्य वर्गों तक भी पहुंच रहा है।
यदि निवेश बढ़ता है, नई कंपनियां स्थापित होती हैं और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं तो संपत्ति निर्माण का व्यापक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। वहीं यदि संपत्ति कुछ सीमित लोगों तक ही केंद्रित रह जाए और आय असमानता तेजी से बढ़े तो यह नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
भारत पिछले कुछ वर्षों में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है। यूनिकॉर्न कंपनियों की संख्या बढ़ी है और टेक्नोलॉजी, फिनटेक, ई-कॉमर्स, हेल्थटेक तथा मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश हुए हैं।
इन्हीं क्षेत्रों में कई नए उद्यमियों की संपत्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कई कंपनियों के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद उनके संस्थापकों की नेटवर्थ में अचानक बड़ा इजाफा देखने को मिला।
शेयर बाजार की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। किसी उद्योगपति की नेटवर्थ का बड़ा हिस्सा उसके शेयरों के बाजार मूल्य पर आधारित होता है। यदि कंपनी के शेयरों में तेजी आती है तो उसकी अनुमानित संपत्ति भी बढ़ जाती है। वहीं बाजार में गिरावट आने पर नेटवर्थ कम हो सकती है।
इसलिए अरबपतियों की संख्या स्थायी नहीं होती। यह बाजार की परिस्थितियों और निवेश के मूल्यांकन के साथ बदलती रहती है।
सरकार के पास कुल संपत्ति का आधिकारिक रिकॉर्ड न होने का एक कारण यह भी है कि भारतीय नागरिकों की संपत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं होती। कई उद्योगपतियों के निवेश विदेशी कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय फंड, निजी निवेश, ट्रस्ट और अन्य परिसंपत्तियों में भी होते हैं। इन सभी का केंद्रीकृत सरकारी रिकॉर्ड तैयार करना व्यवहारिक रूप से जटिल माना जाता है।
आर्थिक नीति विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का मुख्य फोकस कर अनुपालन, निवेश, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों पर होता है। व्यक्तिगत नेटवर्थ का अनुमान लगाना उसकी नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
संसद में दिए गए जवाब के बाद विपक्षी दलों ने आर्थिक असमानता का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि यदि अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है तो यह भी देखना चाहिए कि आम नागरिकों की आय, रोजगार और जीवन स्तर में समान गति से सुधार हुआ है या नहीं।
दूसरी ओर सरकार का कहना है कि गरीबी कम करने, सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने, बुनियादी ढांचे में निवेश और रोजगार सृजन के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं।
पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना, डिजिटल भुगतान प्रणाली और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश जैसी योजनाओं का उल्लेख सरकार अक्सर अपने विकास मॉडल के उदाहरण के रूप में करती रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। बड़े उद्योग समूहों के साथ-साथ मध्यम और छोटे उद्योग भी आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यदि निजी निवेश बढ़ता है तो नए रोजगार और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होने की संभावना रहती है।
हालांकि रोजगार की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी रोजगार की संख्या। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रोजगार उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आय, कौशल और उत्पादकता में सुधार भी आवश्यक है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की आर्थिक परिस्थितियों में भी अंतर देखने को मिलता है। कृषि, सेवा क्षेत्र और विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार की प्रकृति अलग-अलग होती है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण करते समय क्षेत्रीय विविधताओं को भी समझना जरूरी होता है।
भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेजी से विस्तार हुआ है। यूपीआई भुगतान, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन सेवाएं और डिजिटल स्टार्टअप ने नए व्यापार मॉडल विकसित किए हैं। इससे कई नए उद्यमियों को सफलता मिली है और कुछ मामलों में उनकी संपत्ति में तेज वृद्धि हुई है।
विदेशी निवेशकों की बढ़ती रुचि भी भारतीय कंपनियों के मूल्यांकन में वृद्धि का एक कारण रही है। जब किसी स्टार्टअप में बड़ा निवेश होता है तो उसका मूल्यांकन बढ़ जाता है और संस्थापकों की अनुमानित नेटवर्थ भी बढ़ सकती है।
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नेटवर्थ और नकद आय (Cash Income) अलग-अलग अवधारणाएं हैं। किसी व्यक्ति की अनुमानित संपत्ति का बड़ा हिस्सा शेयरों या अन्य परिसंपत्तियों में हो सकता है, जिसे तुरंत नकद में परिवर्तित करना संभव नहीं होता।
यही कारण है कि अरबपतियों की सूची में शामिल लोगों की संपत्ति समय-समय पर बदलती रहती है।
भारत वैश्विक स्तर पर भी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर सकारात्मक अनुमान व्यक्त करती रही हैं। मजबूत घरेलू बाजार, युवा आबादी, डिजिटल परिवर्तन और बुनियादी ढांचे में निवेश को इसकी प्रमुख वजह माना जाता है।
सरकार का दावा है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ गरीबी में भी कमी आई है। बहुआयामी गरीबी से जुड़े विभिन्न अध्ययनों में भी पिछले वर्षों में सुधार के संकेत मिले हैं। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि गरीबी, रोजगार और आय असमानता जैसे विषयों का आकलन कई अलग-अलग मानकों से किया जाता है, इसलिए किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले विभिन्न स्रोतों और पद्धतियों का अध्ययन आवश्यक है।
आर्थिक असमानता पर चर्चा केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में यह बहस होती रही है कि आर्थिक विकास के लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस प्रकार पहुंच रहे हैं। कई देशों में संपत्ति कर, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक निवेश जैसे विषय इसी संदर्भ में चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
भारत में भी संसद और नीति मंचों पर समय-समय पर इन मुद्दों पर चर्चा होती रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आर्थिक विकास के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं तो उसका लाभ व्यापक समाज तक पहुंच सकता है। दूसरी ओर यदि विकास का लाभ सीमित वर्ग तक केंद्रित रहे तो असमानता बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि आर्थिक प्रगति का सही आकलन किन मानकों से किया जाना चाहिए।
क्या केवल अरबपतियों की संख्या बढ़ना आर्थिक मजबूती का संकेत है?
क्या गरीबी और बेरोजगारी में कमी के सरकारी दावों का स्वतंत्र आंकड़ों से भी समर्थन मिलता है?
क्या आर्थिक विकास का लाभ ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से पहुंच रहा है?
ये ऐसे सवाल हैं जिन पर आने वाले समय में भी चर्चा जारी रहने की संभावना है।
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार देश में अरबपतियों की संख्या बढ़कर 576 हो गई है। सरकार का कहना है कि उसके पास उनकी कुल संपत्ति का कोई केंद्रीकृत आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। साथ ही सरकार ने गरीबी और बेरोजगारी से जुड़े कई संकेतकों में सुधार का दावा भी दोहराया है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा का वास्तविक आकलन केवल जीडीपी वृद्धि या अरबपतियों की संख्या से नहीं बल्कि रोजगार, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में होने वाले व्यापक सुधार से किया जाएगा।
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http://India 576 billionaires economy and wealth discussion in Parliament
