दुनियाभर में बैक्टीरिया के बाद अब फंगल संक्रमण (Fungal Infection) भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। वर्षों से जिन एंटीफंगल दवाओं का इस्तेमाल फंगल इंफेक्शन के इलाज में किया जाता रहा है, अब कई मामलों में उनका असर पहले जैसा नहीं रह गया है। इस स्थिति को एंटीफंगल रेजिस्टेंस (Antifungal Resistance) कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस बढ़ती समस्या को लेकर चिंता जताई है और चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में सामान्य फंगल संक्रमण का इलाज भी कठिन हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीफंगल रेजिस्टेंस तब विकसित होता है, जब फंगस समय के साथ दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। इसका मतलब है कि पहले जिन दवाओं से संक्रमण आसानी से ठीक हो जाता था, वे अब कुछ मरीजों में अपेक्षित परिणाम नहीं देतीं। इसका असर विशेष रूप से उन लोगों पर अधिक पड़ सकता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कमजोर होती है, जैसे कैंसर का इलाज करा रहे मरीज, अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) करा चुके लोग, लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वाले मरीज, मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित व्यक्ति और गंभीर रूप से बीमार मरीज।
फंगस हमारे आसपास प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं। मिट्टी, हवा, पौधों, पानी और यहां तक कि मानव शरीर की त्वचा पर भी कई प्रकार के फंगस पाए जाते हैं। अधिकांश फंगस नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही फंगस संक्रमण का कारण बन सकते हैं। त्वचा, नाखून, मुंह, फेफड़े और शरीर के अन्य अंगों में फंगल संक्रमण विकसित हो सकता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में ब्लैक फंगस (म्यूकोर्माइकोसिस) के मामलों ने लोगों का ध्यान फंगल संक्रमण की गंभीरता की ओर खींचा था। हालांकि ब्लैक फंगस और सामान्य फंगल संक्रमण अलग-अलग प्रकार के होते हैं, लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों में फंगल संक्रमण जानलेवा भी हो सकता है।
WHO का कहना है कि दुनिया भर में फंगल रोगजनकों की निगरानी, नई दवाओं के विकास और बेहतर जांच सुविधाओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। कई देशों में आधुनिक डायग्नोस्टिक सुविधाओं की कमी के कारण फंगल संक्रमण की सही पहचान में देरी हो जाती है। जब तक सही संक्रमण की पुष्टि होती है, तब तक बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
एंटीफंगल रेजिस्टेंस बढ़ने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं का उपयोग, इलाज का कोर्स बीच में छोड़ देना, कृषि क्षेत्र में कुछ एंटीफंगल रसायनों का अत्यधिक उपयोग तथा अस्पतालों में लंबे समय तक गंभीर मरीजों का इलाज शामिल हो सकता है। इन सभी कारणों से कुछ प्रकार के फंगस दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर खुजली, लाल चकत्ते या त्वचा की समस्या फंगल संक्रमण नहीं होती। कई बार एलर्जी, एक्जिमा या अन्य त्वचा रोगों के लक्षण मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसलिए स्वयं दवा खरीदकर उपचार शुरू करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ या योग्य चिकित्सक से जांच कराना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
फंगल संक्रमण के सामान्य लक्षण संक्रमण के स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। त्वचा पर होने वाले संक्रमण में खुजली, लाल चकत्ते, गोल निशान, जलन और त्वचा का छिलना दिखाई दे सकता है। नाखूनों में संक्रमण होने पर नाखून मोटे, पीले या भंगुर हो सकते हैं। मुंह में संक्रमण होने पर सफेद परत, दर्द या निगलने में परेशानी हो सकती है। वहीं फेफड़ों में गंभीर फंगल संक्रमण होने पर लगातार खांसी, बुखार और सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं।
कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में संक्रमण तेजी से फैल सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों को किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
डॉक्टरों का कहना है कि एंटीफंगल दवाओं का उपयोग हमेशा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। यदि डॉक्टर ने सात या चौदह दिन का कोर्स दिया है तो लक्षण कम होने के बाद भी दवा बीच में बंद नहीं करनी चाहिए। कई लोग खुजली कम होते ही दवा छोड़ देते हैं, जिससे संक्रमण पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाता और दोबारा लौट सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सही निदान (Diagnosis) के बिना एंटीफंगल दवा शुरू करना उचित नहीं है। कुछ मामलों में डॉक्टर त्वचा की जांच, माइक्रोस्कोपी, कल्चर या अन्य प्रयोगशाला जांच की सलाह दे सकते हैं ताकि संक्रमण के वास्तविक कारण की पुष्टि हो सके।
फंगल संक्रमण की रोकथाम में व्यक्तिगत स्वच्छता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शरीर को साफ और सूखा रखना, विशेष रूप से त्वचा की सिलवटों वाले हिस्सों को, संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। पसीने वाले कपड़े लंबे समय तक पहनकर नहीं रखने चाहिए और रोजाना साफ कपड़े पहनने चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति को बार-बार फंगल संक्रमण हो रहा है तो डॉक्टर मधुमेह जैसी छिपी हुई स्वास्थ्य समस्याओं की जांच कराने की सलाह भी दे सकते हैं, क्योंकि अनियंत्रित ब्लड शुगर फंगल संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकती है।
WHO और विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर फंगल संक्रमण से बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियां उपयोगी मानी जाती हैं:
- बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीफंगल दवाओं का उपयोग न करें।

- डॉक्टर द्वारा बताए गए पूरे दवा कोर्स को पूरा करें।
- त्वचा को साफ और सूखा रखें, विशेष रूप से पसीने वाले हिस्सों को।
- रोजाना साफ और सूती कपड़े पहनें तथा गीले कपड़े तुरंत बदलें।
- तौलिया, कपड़े, जूते या व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं दूसरों के साथ साझा न करें।
- सार्वजनिक जिम, स्विमिंग पूल और चेंजिंग रूम में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
- डायबिटीज के मरीज अपने ब्लड शुगर को नियंत्रित रखें।
- बार-बार संक्रमण होने पर स्वयं दवा लेने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से जांच कराएं।
- स्टेरॉयड युक्त क्रीम का उपयोग केवल डॉक्टर की सलाह पर करें, क्योंकि कई बार इनके गलत उपयोग से संक्रमण छिप जाता है और बाद में अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
- संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम से प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने का प्रयास करें।
- यदि संक्रमण लंबे समय तक ठीक न हो या तेजी से फैलने लगे तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें।
- अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों या कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों की देखभाल में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन करें।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि एंटीफंगल रेजिस्टेंस केवल किसी एक देश की समस्या नहीं है। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय यात्रा, वैश्विक व्यापार और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारक भी फंगल रोगजनकों के प्रसार को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इस चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर अनुसंधान और सहयोग की आवश्यकता है।
नई एंटीफंगल दवाओं का विकास अपेक्षाकृत धीमा माना जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि फंगस और मानव कोशिकाओं में कुछ जैविक समानताएं होती हैं, जिससे ऐसी दवाएं विकसित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है जो फंगस को प्रभावी रूप से नष्ट करें और मानव शरीर पर न्यूनतम दुष्प्रभाव डालें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में बेहतर जांच तकनीक, नई दवाओं का विकास, संक्रमण की समय पर पहचान और दवाओं का जिम्मेदारी से उपयोग इस समस्या से निपटने की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियां होंगी।
भारत जैसे गर्म और आर्द्र जलवायु वाले देशों में त्वचा संबंधी फंगल संक्रमण अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलते हैं। ऐसे मौसम में अधिक पसीना आने के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए गर्मियों और बरसात के मौसम में व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
यह भी याद रखना जरूरी है कि सभी फंगल संक्रमण गंभीर नहीं होते। अधिकांश सामान्य त्वचा संक्रमण समय पर सही उपचार मिलने पर ठीक हो जाते हैं। लेकिन यदि संक्रमण बार-बार हो रहा हो, तेजी से फैल रहा हो, कई दवाओं के बाद भी ठीक न हो या रोगी की प्रतिरक्षा कमजोर हो, तो विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना आवश्यक है।
डॉक्टरों का मानना है कि इंटरनेट या सोशल मीडिया पर देखी गई सलाह के आधार पर दवा शुरू करना सुरक्षित नहीं है। प्रत्येक मरीज की स्थिति अलग होती है और सही उपचार का निर्णय केवल योग्य चिकित्सक ही कर सकता है।
WHO की चिंता इस बात को रेखांकित करती है कि एंटीफंगल रेजिस्टेंस आने वाले वर्षों में वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि समय रहते जागरूकता, वैज्ञानिक अनुसंधान और जिम्मेदारी से दवाओं के उपयोग पर ध्यान दिया जाए तो इस खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
आम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि किसी भी प्रकार के फंगल संक्रमण को हल्के में न लें, स्वयं दवा लेने से बचें और डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का पूरा पालन करें। सही समय पर सही इलाज और अच्छी व्यक्तिगत स्वच्छता फंगल संक्रमण से बचाव के सबसे प्रभावी उपायों में शामिल हैं।
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