हर साल लाखों छात्र इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कई छात्र अपने भविष्य की पूरी योजना JEE जैसी परीक्षाओं के परिणाम से जोड़ लेते हैं। ऐसे में परीक्षा में सफलता नहीं मिलने पर उन्हें लगता है कि करियर का रास्ता बंद हो गया है। लेकिन कुलदीप राठौड़ की कहानी दिखाती है कि जीवन में आगे बढ़ने के रास्ते एक से ज्यादा हो सकते हैं।
कुलदीप ने JEE एडवांस्ड की तैयारी के लिए एक साल का ड्रॉप लिया था, लेकिन वह परीक्षा क्लियर नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखने और कारोबार के क्षेत्र में कुछ नया करने का रास्ता चुना। सितंबर 2023 में उन्हें IIT मद्रास के BS डिग्री प्रोग्राम इन डेटा साइंस के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम के ऑनलाइन और लचीले फॉर्मेट ने उन्हें पढ़ाई के साथ बिजनेस पर काम करने का अवसर दिया।
कुलदीप ने अपने को-फाउंडर शिवांश के साथ मई 2024 में पुणे में Zodok नाम से फैशन क्विक-कॉमर्स स्टार्टअप शुरू किया। यह कारोबार ग्राहकों तक फैशन से जुड़े उत्पाद तेजी से पहुंचाने पर केंद्रित था। शुरुआत में टीम छोटी थी और संस्थापकों ने वेबसाइट बनाने से लेकर डिलीवरी की व्यवस्था तक कई काम खुद संभाले। धीरे-धीरे Zodok रोज 100 से ज्यादा ऑर्डर और 10 हजार से अधिक यूजर्स तक पहुंचा।
बाद में Zodok का अधिग्रहण KNOT ने कर लिया। इस अनुभव के बाद कुलदीप ने मैन्युफैक्चरिंग, उत्पादों की सोर्सिंग और सप्लाई चेन को करीब से समझा। अब उनका नया स्टार्टअप SamanNow छोटे शहरों में रोजमर्रा के सामान की तेज और किफायती डिलीवरी पर काम कर रहा है। कंपनी ने हाल ही में 11 लाख डॉलर यानी लगभग ₹10.4 करोड़ की प्री-सीड फंडिंग जुटाई है।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए: ₹10.4 करोड़ की रकम कंपनी की फंडिंग है, न कि प्रमाणित सालाना टर्नओवर या मुनाफा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह निवेश SamanNow के कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए जुटाया गया है।
JEE एडवांस्ड में सफलता नहीं मिली, तो बदला रास्ता
कुलदीप राठौड़ ने JEE की तैयारी के लिए एक साल का ड्रॉप लिया था। इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी में समय और मेहनत लगाने के बावजूद वह JEE एडवांस्ड क्लियर नहीं कर सके। कई छात्रों के लिए ऐसी स्थिति निराशाजनक हो सकती है, खासकर तब जब परिवार और आसपास के लोग किसी एक परीक्षा को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना मानते हों।
कुलदीप ने इस नतीजे को अपने करियर का अंतिम फैसला नहीं माना। उन्होंने दूसरे शैक्षणिक विकल्पों और व्यावहारिक अनुभव के रास्ते तलाशने शुरू किए। सितंबर 2023 में उन्हें IIT मद्रास के BS डिग्री प्रोग्राम इन डेटा साइंस के बारे में जानकारी मिली। यह ऑनलाइन डिग्री प्रोग्राम उन विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी हो सकता है जो पढ़ाई के साथ अन्य काम करना चाहते हैं।
इस प्रोग्राम की लचीली व्यवस्था ने कुलदीप को पढ़ाई जारी रखते हुए कारोबार की संभावनाएं तलाशने का मौका दिया। उन्होंने फैशन, क्विक कॉमर्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने का अनुभव जुटाया।
उनकी कहानी का मुख्य संदेश यह नहीं है कि पढ़ाई या प्रवेश परीक्षाएं जरूरी नहीं हैं। बल्कि यह है कि एक परीक्षा में असफल होने के बाद भी विद्यार्थी अपने कौशल, रुचि और परिस्थितियों के मुताबिक दूसरे रास्ते चुन सकते हैं। किसी भी नए रास्ते पर मेहनत, सीखने और जोखिम को समझने की जरूरत बनी रहती है।
ऑनलाइन पढ़ाई के साथ बिजनेस करने का मौका
IIT मद्रास के BS डिग्री प्रोग्राम ने कुलदीप को पढ़ाई और उद्यमिता के बीच संतुलन बनाने का अवसर दिया। पारंपरिक कॉलेज की तुलना में ऑनलाइन पढ़ाई का फॉर्मेट समय के इस्तेमाल में अधिक लचीलापन दे सकता है, हालांकि पढ़ाई में अनुशासन और नियमित मेहनत फिर भी जरूरी होती है।
कुलदीप ने इस दौरान सिर्फ बिजनेस आइडिया सोचने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ग्राहकों की जरूरत, उत्पादों की उपलब्धता, डिलीवरी, सप्लाई चेन और कारोबार के संचालन जैसे विषयों को समझने की कोशिश की। बिजनेस शुरू करने वाले व्यक्ति के लिए यह व्यावहारिक जानकारी बहुत अहम होती है।
किसी भी कारोबार में केवल अच्छा आइडिया होना पर्याप्त नहीं है। ग्राहक तक सही उत्पाद पहुंचाना, उसकी कीमत तय करना, समय पर डिलीवरी करना और खर्च नियंत्रित रखना भी जरूरी है। कुलदीप के शुरुआती अनुभव ने उन्हें इन चुनौतियों को वास्तविक परिस्थितियों में समझने का मौका दिया।
Zodok की शुरुआत: फैशन की तेज डिलीवरी का आइडिया
मई 2024 में कुलदीप और उनके को-फाउंडर शिवांश ने पुणे में Zodok नाम से फैशन क्विक-कॉमर्स स्टार्टअप शुरू किया। इसका विचार फैशन से जुड़े उत्पादों को ग्राहकों तक तेजी से पहुंचाने का था। उस समय क्विक कॉमर्स का मॉडल मुख्य रूप से रोजमर्रा की जरूरतों और किराना सामान की तेज डिलीवरी के लिए जाना जा रहा था।
Zodok की टीम ने फैशन उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री और तेजी से ऑर्डर पूरा करने की व्यवस्था विकसित करने पर काम किया। संस्थापकों ने एक किराए का फ्लैट लिया, वेबसाइट बनाई और डिलीवरी से जुड़े संचालन को समझने के लिए खुद भी मेहनत की।
शुरुआती चरण में स्टार्टअप के पास बड़े कारोबार जैसी सुविधाएं नहीं थीं। छोटी टीम को वेबसाइट, ऑर्डर, उत्पादों की उपलब्धता और डिलीवरी के बीच तालमेल बैठाना पड़ता था। ऐसे दौर में संस्थापकों को ग्राहकों की प्रतिक्रिया से सीखना और बार-बार अपने तरीके में सुधार करना पड़ता है।
Zodok का अनुभव कुलदीप के लिए इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहा कि उन्होंने बिजनेस मॉडल को जमीन पर लागू होते देखा। किसी उत्पाद को ऑनलाइन दिखाने और वास्तविक ग्राहक तक सही समय पर पहुंचाने के बीच कई प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना ही क्विक-कॉमर्स बिजनेस की बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
पहले कारोबार में रोज 100 से ज्यादा ऑर्डर
रिपोर्टों के मुताबिक, Zodok ने धीरे-धीरे रोज 100 से ज्यादा ऑर्डर संभालने की क्षमता हासिल की और उसके यूजर्स की संख्या 10 हजार से अधिक हो गई। शुरुआती स्टार्टअप के लिए यह इस बात का संकेत था कि उसके उत्पादों और डिलीवरी मॉडल को ग्राहक मिल रहे थे।
हालांकि, रोज 100 ऑर्डर का आंकड़ा अपने आप में मुनाफे का प्रमाण नहीं होता। किसी क्विक-कॉमर्स कारोबार में प्रति ऑर्डर मिलने वाली कमाई, उत्पाद की लागत, पैकेजिंग, डिलीवरी और मार्केटिंग पर होने वाला खर्च भी महत्वपूर्ण है। अगर प्रत्येक ऑर्डर को पूरा करने में खर्च ज्यादा हो, तो बिक्री बढ़ने के बावजूद कारोबार पर वित्तीय दबाव रह सकता है।
फिर भी शुरुआती स्तर पर ग्राहकों की मांग समझना और ऑर्डर की प्रक्रिया को संभालना महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है। इससे संस्थापकों को यह पता चल सकता है कि कौन-से उत्पाद ज्यादा बिक रहे हैं, ग्राहक कितनी तेजी से डिलीवरी चाहते हैं और संचालन में कहां सुधार की जरूरत है।
Zodok के अनुभव ने कुलदीप और उनकी टीम को ग्राहक की जरूरत और कारोबार के संचालन के बीच संबंध समझने का अवसर दिया। यही अनुभव आगे उनके दूसरे व्यावसायिक कदमों में काम आया।
Zodok का अधिग्रहण और KNOT में नया अनुभव
Zodok को बाद में KNOT ने अधिग्रहित कर लिया। किसी स्टार्टअप का अधिग्रहण होने का मतलब है कि दूसरी कंपनी तय शर्तों के तहत उस कारोबार को खरीदती या अपने साथ जोड़ती है। लेकिन अधिग्रहण को संस्थापकों की व्यक्तिगत कमाई या कंपनी के मुनाफे के बराबर नहीं माना जा सकता। सौदे की रकम और अन्य शर्तें सार्वजनिक न हों, तो उनके बारे में अनुमान लगाना सही नहीं है।
इस अधिग्रहण के बाद कुलदीप ने KNOT में Entrepreneur-in-Residence के रूप में काम किया। इस भूमिका में उन्हें संस्थापक कार्यालय के साथ काम करने और कारोबार के नए अवसरों को समझने का अनुभव मिला।
यहां उनका ध्यान सिर्फ ऑनलाइन बिक्री तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग, छोटे और मध्यम उद्यमों, उत्पादों की सोर्सिंग और सप्लाई नेटवर्क के बारे में व्यावहारिक जानकारी जुटाई। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि उत्पाद किस तरह बनते हैं, उनकी लागत कैसे तय होती है और निर्माता से ग्राहक तक पहुंचने में किन प्रक्रियाओं की जरूरत होती है।
क्विक कॉमर्स में डिलीवरी की गति महत्वपूर्ण है, लेकिन उत्पादों की खरीद लागत और उपलब्धता भी उतनी ही अहम हैं। यदि कंपनी भरोसेमंद आपूर्तिकर्ताओं से सही कीमत पर उत्पाद प्राप्त कर सके, तो वह ग्राहकों को बेहतर मूल्य देने की कोशिश कर सकती है।
100 से ज्यादा निर्माताओं के साथ सप्लाई नेटवर्क
कुलदीप के पेशेवर प्रोफाइल से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, KNOT में काम करते समय उन्होंने सूरत, दिल्ली-NCR और चीन सहित अलग-अलग क्षेत्रों में सप्लाई नेटवर्क विकसित करने में योगदान दिया। इस दौरान 100 से ज्यादा निर्माताओं के साथ संपर्क बनाने का अनुभव भी बताया गया है।
उन्होंने दो प्राइवेट-लेबल उत्पाद श्रेणियों को लॉन्च करने में मदद की, जिनकी बिक्री के लिए उपलब्ध स्टॉक का लगभग 90 प्रतिशत बिकने की जानकारी उनके प्रोफाइल में दी गई। इस तरह के आंकड़े को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि sell-through rate और कंपनी का कुल मुनाफा अलग-अलग मापदंड हैं। किसी उत्पाद का बड़ा हिस्सा बिक जाना अच्छी मांग का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप लाभ की मात्रा तय नहीं होती।
प्राइवेट लेबल का मतलब है कि किसी कंपनी के नाम या ब्रांड के तहत उत्पाद बेचा जाता है, जबकि उसका निर्माण किसी बाहरी निर्माता द्वारा किया जा सकता है। इस मॉडल में कंपनी उत्पाद की डिजाइन, गुणवत्ता, पैकेजिंग और बिक्री रणनीति पर ध्यान देती है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग का काम किसी भागीदार के जरिए हो सकता है।
कुलदीप के लिए इस अनुभव का महत्व यह था कि उन्होंने उत्पादों की सोर्सिंग और आपूर्ति को कारोबार की रणनीति का हिस्सा बनाकर देखना सीखा। SamanNow के मॉडल में भी किफायती कीमत पर रोजमर्रा का सामान उपलब्ध कराने के लिए ऐसी समझ उपयोगी हो सकती है।
SamanNow क्या करता है?
SamanNow कुलदीप राठौड़ का नया क्विक-कॉमर्स स्टार्टअप है। इसका उद्देश्य टियर-2 और टियर-3 शहरों में रोजमर्रा के उत्पादों की सुविधाजनक और किफायती डिलीवरी उपलब्ध कराना है। कंपनी का मॉडल लगभग 60 मिनट के भीतर सामान पहुंचाने पर केंद्रित बताया गया है।
भारत में क्विक-कॉमर्स का विस्तार बड़े शहरों में तेजी से हुआ है, लेकिन छोटे शहरों में ग्राहकों की जरूरतें, ऑर्डर का आकार, उत्पादों की उपलब्धता और डिलीवरी की लागत अलग हो सकती है। SamanNow ऐसे बाजारों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
इस मॉडल में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ तेज डिलीवरी देना नहीं है। कंपनी को यह भी देखना होगा कि ग्राहक को सामान उचित कीमत पर मिले और हर ऑर्डर को पूरा करने का खर्च नियंत्रण में रहे। छोटे शहरों में मांग का घनत्व बड़े महानगरों से अलग हो सकता है, इसलिए इन इलाकों के लिए अलग संचालन रणनीति की जरूरत पड़ सकती है।
कुलदीप के पहले स्टार्टअप से मिले अनुभव और KNOT में सप्लाई नेटवर्क पर किए गए काम से उन्हें इन चुनौतियों को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, SamanNow की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ग्राहकों की मांग, लागत, डिलीवरी और कारोबार के विस्तार के बीच कितना अच्छा संतुलन बना पाता है।
SamanNow ने जुटाए 11 लाख डॉलर
SamanNow ने हाल में 1.1 मिलियन डॉलर की प्री-सीड फंडिंग जुटाई। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग ₹10.4 करोड़ होती है, हालांकि वास्तविक रुपया मूल्य विनिमय दर के अनुसार बदल सकता है। इस फंडिंग राउंड में Antler, Titan Capital और All In Capital जैसे निवेशकों के नाम सामने आए हैं।
प्री-सीड फंडिंग आम तौर पर स्टार्टअप के शुरुआती चरण में दी जाने वाली पूंजी होती है। इसका इस्तेमाल कारोबार का शुरुआती ढांचा बनाने, उत्पाद और तकनीक विकसित करने, टीम तैयार करने, बाजार की मांग जांचने या संचालन बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। वास्तविक इस्तेमाल कंपनी की योजना और निवेश समझौते पर निर्भर करता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ₹10.4 करोड़ फंडिंग जुटाना और ₹10 करोड़ का सालाना कारोबार करना दो अलग बातें हैं। फंडिंग निवेशकों से मिली पूंजी है, जबकि टर्नओवर किसी अवधि में हुई बिक्री का कुल मूल्य होता है। मुनाफा निकालने के लिए कारोबार की आय से खर्च घटाने पड़ते हैं।
SamanNow के मामले में उपलब्ध रिपोर्टें फंडिंग की पुष्टि करती हैं, लेकिन इससे कंपनी का सालाना टर्नओवर या मुनाफा अपने आप साबित नहीं होता। इसलिए इस उपलब्धि को फंडिंग और विस्तार की दिशा में एक अहम पड़ाव के रूप में देखना अधिक सही है।
छोटे शहरों में क्विक कॉमर्स की चुनौती
छोटे शहरों में तेज डिलीवरी का कारोबार शुरू करने के लिए कंपनी को स्थानीय मांग और उत्पादों की उपलब्धता समझनी पड़ती है। हर शहर में एक जैसे उत्पाद नहीं बिकते और ग्राहकों की खरीदारी की आदतें भी अलग हो सकती हैं। इसलिए कंपनी को यह तय करना होगा कि किन उत्पादों को स्टॉक में रखा जाए और किन इलाकों में डिलीवरी सेवा शुरू की जाए।
तेज डिलीवरी के लिए स्टॉक को ग्राहक के करीब रखना पड़ सकता है। इससे डिलीवरी का समय घट सकता है, लेकिन गोदाम, कर्मचारी और इन्वेंट्री पर खर्च बढ़ सकता है। दूसरी ओर, बहुत कम स्टॉक रखने पर ऑर्डर पूरा करने में देरी हो सकती है या ग्राहक को पसंद का उत्पाद उपलब्ध नहीं होगा।
SamanNow का वैल्यू-फर्स्ट मॉडल इन चुनौतियों के बीच कीमत और सुविधा का संतुलन बनाने पर निर्भर करेगा। यदि कंपनी बेहतर सोर्सिंग के जरिए लागत कम कर पाती है, तो वह ग्राहकों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उत्पाद देने की कोशिश कर सकती है। लेकिन इस मॉडल को बड़े स्तर पर सफल बनाने के लिए मजबूत संचालन और लगातार ग्राहक मांग जरूरी होगी।
छात्रों और युवा उद्यमियों के लिए क्या सीख?
कुलदीप की यात्रा से सबसे पहली सीख यह है कि किसी एक परीक्षा का परिणाम व्यक्ति की पूरी क्षमता तय नहीं करता। JEE एडवांस्ड में सफलता नहीं मिलने के बाद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और दूसरे रास्तों पर काम किया। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी या अकादमिक शिक्षा महत्वहीन है, बल्कि यह कि असफलता के बाद विकल्प तलाशना भी जरूरी है।
दूसरी सीख व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी है। Zodok में उन्होंने ग्राहक और डिलीवरी की चुनौतियां समझीं, जबकि KNOT में मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई नेटवर्क का अनुभव मिला। इन अलग-अलग अनुभवों ने उनके अगले बिजनेस आइडिया को आकार देने में मदद की।
तीसरी सीख यह है कि बिजनेस शुरू करने से पहले बाजार को समझना जरूरी है। किसी उत्पाद की मांग, ग्राहक की जरूरत, लागत और डिलीवरी की व्यवस्था को समझे बिना केवल आइडिया के आधार पर बड़ा कारोबार बनाना मुश्किल होता है।
चौथी सीख यह है कि फंडिंग और सफलता को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। निवेश जुटाना स्टार्टअप के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती है, लेकिन आगे कंपनी को ग्राहकों की जरूरत पूरी करनी होती है, लागत संभालनी होती है और टिकाऊ कारोबार बनाना होता है।


